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प्रकृति के दोहन पर टिकी विकास की समझ को पुनर्विचार की जरुरत

Posted On: 31 May, 2018 Uncategorized में

Sandeep Sumanसमाज,शिक्षा और राजनीति पर निष्पक्ष और बेवाक दृष्टिकोण।

Sandeep Suman

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उत्तर भारत के अनेक राज्यों में आये आंधी-तूफान ने जान-माल को काफी नुकसान पहुँचाया। दो-तीन मई को पांच राज्यो में आए तूफान से 134 लोगों की मौत हो गई और 400 से अधिक लोग घायल हो गए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 39 लोगो के मारे जाने के अनुमान है, राहत एवं बचाओ के कार्य भी युद्ध स्तर पे किये जा रहे है। लेकिन सवाल उठता है आखिर किस हद तक हम क्षतिपूर्ति से जलवायु परिवर्तन जैसे गम्भीर समस्या को नजरअंदाज कर पाएंगे ? और क्या इसे कर पाना संभव भी है ?

 

 

मौसम बदलाव की गति इतनी तीव्र हो चुकी है वैज्ञानिक पूर्वानुमान भी सही नहीं ठहरता, कर्नाटक और शिमला का उदाहरण ले तो मानसून से पूर्व बेमौसम बारिश ने कर्नाटक में इस तरह की परेशानी उत्पन्न की, की वह एडीआरएफ की टीमों को रहत एवं बचाओ कार्य में लगाना पड़ा। शिमला जिसे अंग्रेजी शासन के दौरान ‘ग्रीष्मकालीन राजधानी’ का दर्जा प्राप्त था और ग्रीष्म काल में पर्यटकों के लिए पसंदीदा जगहों में से एक है, आज स्थानीय लोग पर्यटकों ना आने की गुहार लगा रहे है। शिमला में गर्मी अपने रिकॉर्ड स्तर पर है, पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहह है। कई पर्यावरणविद और स्वमसेवक संस्थाएं काफी वक़्त से शिमला में हो रहे अवैध निर्माण और विकास के नाम पर पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ पर सवाल उठाते आ रहे है। किंतु इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। पर्यटन सेवा और बुनियादी ढांचे के नाम पर जल संसाधनो के साथ खिलवाड़ किया जाता रहा है, जिसका नतीजा आज सबके समक्ष है।

 

कई शोधों में भी चेतावनी दी गई है कि भारत के कई इलाकों में महाराष्ट्र के लातूर जैसी नौबत आ सकती है, 2050 तक भारत के एक तिहाई शहर जल-संकट की चपेट में होंगे। धरती के औसत तापमान में वृद्धि से सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से तथा जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि का सीधा और परोक्ष सम्बन्ध हमारे अनियंत्रित जीवाश्म ईंधन के दोहन से पर टिकी हमारी गैरजिम्मेदाराना समझ से है। तेजी से बढ़ती धरती की तापमान, ओलावृष्टि, बाढ़ और सूखे जैसे आपदा हमें बार-बार आगाह कर रही है कि गैरजिम्मेदाराना रूप से विकास कार्यो के नाम पर प्रकृति का दोहन मनुष्यों के लिए तो मंहगा साबित होगा ही साथ ही साथ उन जीवों को भी इसका ख़ामियाजा भुगतना होगा, जिनका इनमें कोई हाथ नहीं। पर्यावरण के प्रति सामाजिक और राजनीतिक दोनों सोच में परिवर्तन का समय आ गया है, ईंधन में दाम बढ़ोतरी के खिलाफ सिर्फ सड़कों पर आने से कुछ नहीं होगा, आने वाली पीढ़ियों को हम कैसा भविष्य देना चाहते है ये हमे तय करना होगा, विकास के नाम पर पर्यावरण के बेलगाम दोहन के प्रति सभी को जागरूक होने ओर करने के जरुरत है ।

 

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