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हिमा दास की जाति नहीं कामयाबी को सर्च कीजिए।

Posted On: 23 Jul, 2018 Uncategorized में

Sandeep Sumanसमाज,शिक्षा और राजनीति पर निष्पक्ष और बेवाक दृष्टिकोण।

Sandeep Suman

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एक देश जो इस बात की झूठी तस्सली लिए जी रहा है कि देश में कन्या भ्रूण हत्या लगभग समाप्त हो गई है, किन्तु जीवन के हर पहलु में उन्हें दबाया जाता है, उसके सपनो और पसंद की हत्या की जाती हो। ऐसे देश में एक 18 वर्ष की लड़की एक बेहद ही संघर्षपूर्ण जीवन और समाज की बंदिशो को तोड़ते हुए, देश के हर नागरिक को गर्व से छाती चौरी करने का मौका प्रदान करती है, तो तुरंत उसके कामयाबी को दरकिनार करते हुए पितृप्रधान मानसिकता वाले समाज उसकी कामयाबी को अपनी जाति व्यवस्था की गन्दी तराजू में तौलने को बेताब हो उठते है।
फिनलैंड में आयोजित विश्व जूनियर एथेलेटिक्स चैंपियनशिप में 400 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने 51.46 सेकंड का शानदार समय निकालते हुए यह स्वर्णिम सफलता हासिल की, इतना ही नहीं हिमा ट्रैक प्रतियोगिता में भारत के लिए अंतराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाली पहली एथलीट बन गई। इससे पहले भी वो कामनवेल्थ गेम की 400 मीटर स्पर्धा में छठे स्थान पर रही थी। गुवाहाटी में हुई अंतरराज्य प्रतियोगियता में भी स्वर्ण पदक हासिल की थी। असम के ढिंग जिले की रहने वाली हिमा के पिता एक गरीब किसान है। बचपन से आजतक उनका जीवन संघर्षपूर्ण रहा, बिना किसी सुविधाओं के विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए हिमा ने ये मुकाम हासिल की ।
आप उनके विश्व जूनियर एथेलेटिक्स चैंपियनशिप की वेडियो देखेगें तो आपको उनकी मेहनत, लगन और धैर्य का परिचय प्राप्त होगा, किस प्रकार उन्होंने सफलता का झंडा गाड़ देश के मान सम्मान को बढ़ाया इतना ही नहीं पदक प्राप्त करने के उपरांत का वो वेडियो जिसमे राष्ट्रगान के वक़्त उनके आँखों में आंशु है किसी को भी भावुक कर देगा, और ऐसे लोगो को भी सन्देश दे जाता है कि जो अपनी राजनीति की आर में राष्ट्रगान को अपमानित करते और गाने से मना करते है। राष्ट्रगान की महत्ता वही जानते है जो राष्ट्रवाद का सिर्फ ढोंग नहीं करते वल्कि देश के खातिर कुछ कर गुजरने की चाह रखते है।
किन्तु हिमा के जितने के बाद जिस देश वासियों को उसके मेहनत और कामयाबी की चर्चे करनी चाहिए थी, अपने बच्चो को उनसे प्रेरित होने की सलाह देनी चाहिए थी, वो गूगल पर हिमा की जाति तलाश रहे थे, और ऐसा पहली दफा नहीं हुआ, 2016 ओलिम्पिक दौरान भी पीवी सिंधू की जाति तलाशी जा रही थी। यह हमारे समाज की मानसिकता और उसमें घुली जाति के जहर को दर्शाता है। जाति व्यवस्था का विवाह और धार्मिक कर्मकांडो में आज भी बोलबाला है। मंदिरोंमें आय दिन दलितों के साथ भेदभाव की खबरें आते रहते है,देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ जगन्नाथ मंदिर के पंडो ने अभद्रता की उन्हें गर्वगृह तक जाने से रोका गया। ऐसी घटनाएं ना केवल शर्मनाक अपितु देश और समाज के माथे पर कलंक है। हालांकि समय और समाज और परिस्थिति में परिवर्तन हुआ है किंतु आज भी समाज में कई सूधार होने बाकि है, अगर हम किसी की कामयाबी से प्रेरणा ना लेकर उसकी जाति को प्रमुखता देते है तो समाज के आगे नहीं वाली पीछे की और धकेलेगा, बेहतर होगा की हम हिमा दास जैसे व्यक्तिव से प्रेरित हो, उनके कामयाबी को सर्च करे ना की उसके जाति को।

संदीप सुमन
sandeepsuman311@gmail.com

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