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हे गौरक्षकों, मेरी रक्षा करो।

Posted On: 26 Jul, 2018 Uncategorized में

Sandeep Sumanसमाज,शिक्षा और राजनीति पर निष्पक्ष और बेवाक दृष्टिकोण।

Sandeep Suman

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मैं भूरी, आज जब मैं कचड़े के ढ़ेर में पड़े प्लास्टिक को खाने का प्रयास कर रही थी, तभी मेरी नजर एक अख़बार पर पड़ी मैंने देखा की तुम हमारी रक्षा और सुरक्षा को लेकर इतना कर्मठ हो की तुमने हमारे खातिर अपने ही प्रजाति के एक अंग की जीवनलीला को समाप्त कर दिया। मेरी भूख से लड़खड़ाती पांव में मानो बिजली सी कौंध गई, मुझे एहसास हुआ की चलो कोई तो है जो हमारे लिए मरने-मारने पर उतारू है, हमारी सुरक्षा और सुविधाओं के लिए कर्मठ है, ये सोच कर मैं निकल पर इस तलाश में की कही तुम मिलोगे और मुझे भोजन ग्रहण करोगे ताकि मैं इस बेस्वाद जहरीली प्लास्टिक से निजात पा सकूँ।
सुबह से शाम पर मैंने पूरा शहर छान मारा पुत्र किन्तु तुम कही नहीं मिले, आख़िरकार हार कर फिर उसी कचड़े के ढ़ेर पर बैठ मैं तुम्हारे द्वारे फेंकी गयी हरी-हरी प्लास्टिक को हरी घास समाज चबाने का प्रयास करने लगी। तभी वहाँ उजली का आगमन हुआ मेरा उतरा चेहरा देख उसने मुझसे कारण पूछा तो मैं फफक पड़ी, मैं उसे पूरी कहानी बतलायी, तो वो मुस्कुरा कर मुझे जो बतलायी मैं हैरान रह गई।
उस दिन मुझे ज्ञात हुआ की इस देश में मैं और उजली अकेली नहीं जो आवारे है, पुरे देश में करीबन 59 लाख गौ बहनों का कोई नहीं, अर्थात इतनी गायें जितनी अफगानिस्तान और वियतनाम में पाली भी नहीं जाती उतने हम आवारे घूम रहे है वो भी तब जब तुम जैसे बेटे मेरी रक्षा के लिए अपने ही प्रजाति के अंश को समाप्त करने पे तुले हो। पशुओं के लिए चरागाहों की उपलब्धता केवल 0.9 प्रति एकड़ है, जबकि अमेरिका जैसी देशों में जहाँ मुझे सिर्फ व्यवसाय का साधन माना जाता है, माँ का दर्जा हासिल नहीं वहाँ 12 एकड़ प्रति पशु चारागाह है। हमारी चरागाहों को भूमाफियाओं ने हड़प लिया है पुत्र, कृपया तुम उसे आजाद कराओ। गरीबो की हत्या करने से कुछ हासिल नहीं होगा पुत्र, अपनी माँ को उसका हक़ दिलवाओ। आखिर कब तक हम सड़को पर प्लस्टिक के भरोसे जीवित रहेगे, दर-दर की ठोकरें खाते रहेगे।
सुना है तुम जिसे अपना राष्ट्रपिता मानते हो, वो भी हमारे हत्या के विरोधी थे, किन्तु उन्होंने कभी हिंसा के बल पर हमारी रक्षा को जायज नहीं ठहराया। हमें भी हिंसा नहीं अपना चारागाह चाहिए। मेरे सर पर हत्या का कंलक मत मढ़ो, मैंने अपने दूध से हर किसी को बिना जाति-धर्म का भेद किये सींचा है अर्थात हर मनुष्य मेरी संतान के सामान है, मेरे सर पर संतान हत्या का कंलक मत लगने दो। सैकड़ो वर्ष पहले फिरंगियों में मेरा इस्तेमाल मेरे ही बच्चो की बीच फुट डालने को किया था, याद करो सन 1921 का वो नेहरू जी का भाषण जिसमे उन्होंने ऐसे गतिविधियों से हिंदुओं को सतर्क रहने और मुसलमानों को सहियोग करने को कहा था ताकि मेरे दोनों बच्चो हिन्दू और मुसलमानों के मध्य कोई मनमुटाव नहीं आ सके। कसाई तो फिर भी रहम करके एक बार में मेरी ईहलीला समाप्त कर देता है, किन्तु तुम देख, जान और समझ कर भी इस प्लास्टिक कचड़े के सहारे मुझे तिलतिल कर मरने के लिए छोड़ देते हो, मेरे गौरक्षकों मेरी रक्षा करो, मेरे नाम पर संतान हत्या का कंलक ना लगने दो। मैं तो सर्वदा यही चाहूंगी, चाहे कल मुझे फिर कचड़े से ही क्यों ना पेट भड़ना पड़े, मेरे सभी बच्चे चाहे वो किसी भी जाति या धर्म का हो आपस में मेल-मिलाप से रहे। मेरे लिए हिंसा नहीं अहिंसा के मार्ग से मेरी रक्षा करे।

संदीप सुमन

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