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भारत माँ का वो लाडला जो आज खो गया

Posted On: 17 Aug, 2018 Uncategorized में

Sandeep Sumanसमाज,शिक्षा और राजनीति पर निष्पक्ष और बेवाक दृष्टिकोण।

Sandeep Suman

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एक सपना था जो अधूरा रह गया, एक गीत था जो गूंगा हो गया, एक लौ थी जो अनंत में विलीन हो गई। सपना था एक ऐसे संसार का जो भय और भूख से रहित होगा, गीत था एक ऐसे महाकाव्य का जिसमें गीता की गूंज और गुलाब की गंध, लौ थी एक ऐसे दीपक की जो रात भर जलता रहा, हर अंधेरे में, आज निर्वाण को प्राप्त हो गया। भारत माँ आज शोकमग्न है- उसका लाडला आज कही खो गया। मानवता आज खिन्न है- उसका रक्षक जाने क्यों सो गया। दलितों का सहारा आज कही छूट गया। जन-जन के आँखों का तारा कही टूट गया, न जाने क्यों पालन करता आज हमसे इतना रूठ गया, अँधेरे में सबसे तेज़ चमकने वाला तारा ना जाने आज क्यों टूट गया।
महर्षि बाल्मीकि ने रामायण में भगवान राम के सम्बन्ध में कहा था कि वे असंभवो के समन्वय थे। अटल जी के जीवन को देखे तो महाकवि की कथन की आपको झलक मिलेगी। वे शांति के पुजारी थे, किन्तु क्रांति के अग्रदूत भी थे, वे अहिंसा के उपासक तो थे, किन्तु स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा के लिए हर हथियार से लड़ने को सामर्थ्य थे। वे व्यक्तिगत स्वाधीनता के समर्थक थे, किन्तु आर्थिक समानता लाने के लिए कटिबध्य थे। उन्हीने कभी किसी से समझौता का भय नहीं खाया, लेकिन कभी किसी से भयभीत होकर समझौता भी नहीं किया। चीन हो या पाकिस्तान उन्होंने अपनी इसी नीति का सामंजस्य दिखलाया, उनकी नीति में उदारता तो थी, किन्तु दृढ़ता भी थी, किन्तु दुर्भाग्य है कि उनकी उदारता को दुर्बलता समझा गया, जिसका जवाब उन्होंने अपने दृढ़ता से दिया।
अटल जी चाहे प्रधानमंत्री के पद पर रहे हो या नेता प्रतिपक्ष; बेशक देशः की बात हो या क्रंतिकारियो की या फिर उनकी अपनी ही कविताओं की, नपी-तुली और बेवाक टिपण्णी करने में वे कभी अपने कदम पीछे नहीं खींचते थे। भारत को लेकर उनकी स्पष्ठ दृष्टि थी की उनका भारत ऐसा हो जो भूख, भय, निरक्षता और अभाव से मुक्त हो। परमाणु संपन्न देशो की संभावित नाराजगी से विचलित हुए बिना उन्होंने अग्नि-2 और परमाणु प्रशिक्षण का देश की सुरक्षा के लिए साहसी कदम उठाया, जिसने देश के सुरक्षा को एक नई और दीर्घकालीन मजबूती प्रदान की।
संसद में उनका अभाव कभी नहीं भरेगा। शायद ही तीन मूर्ति को उन जैसा व्यक्तित्व देखने का सुख हासिल हो। वह जिंदादिली, विरोधी को भी साथ लेकर चलने की नीति, वह भावना, वह सज्जनता, वह मानवता शायद ही निकट भविष्य में देखने को मिले। मतभेद होते हुए भी उनके महान आदर्शो के प्रति, उनकी प्रमाणिकता के प्रति, उनकी देशभक्ति के प्रति, उनके अटूट साहस और धैर्य के प्रति हमारे ह्रदय में आदर, के अतिरिक्त और कुछ नहीं अटल जी का जाना देश की राजनीति के एक सुनहरे दौर का अंत होने जैसा है। ऐसा दौर, जिसमे राजनीतिक मतभेद को मनभेद में बदलने नहीं दिया गया।

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