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''बदल रहा है शिक्षा का मानदंड''

Posted On: 29 Sep, 2015 Others में

sangeeta singh bhavnaJust another Jagranjunction Blogs weblog

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हमारे देश भारत में आजादी के बाद विश्वविद्यालयी शिक्षा स्वरूप में आश्चर्यात्मक बदलाव हुआ है | इस बदलाव ने शिक्षा के क्षेत्र में भारत को विकसित विकसित देशों के टक्कर में लाकर खड़ा कर दिया है | ध्यान देने वाली बात तो यह है कि शिक्षा और विकास के इस बढ़े स्तर में निजी संस्थान पहले के विश्वविद्यालयों की तरह सिर्फ प्रशासनिक जिम्मेदारियों तक ही सीमित नहीं है,यहाँ उनका संबंध समय के साथ बदले सामाजिक सरोकारों,मूल्यों और शिक्षा की नई जरूरतों और नीतियों से भी है | भारत का नालंदा विश्वविद्यालय विश्व का सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय था,जिसमें दूर-देश से बच्चे पढ़ने आते थे| फिर समय के परदे  पर तस्वीर बदली | ब्रिटिश राज भारत में आया और शिक्षा पद्धति पश्चिमी रंग में रंग गई | शिक्षा के इस पश्चिमीकरण और भारत में यूनिवर्सिटी सिस्टम का श्रेय ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर चार्ल्स वुड को जाता है | उन्होने ‘यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन ‘ की तर्ज पर एक प्रणाली बनाई जिसके अनुसार एक विश्वविद्यालय आस-पास के क्षेत्रों के बिभिन्न कालेजों को मान्यता देगा,कोर्स-किताबें आदि तय करेगा ,परीक्षाओं का संचालन करेगा और फिर डिग्री देगा| इसके परिणामस्वरूप 1857 में कलकता,मुंबई और मद्रास यूनिवर्सिटी अस्तित्व में आई | 1881 में पंजाब यूनिवर्सिटी के बनने तक इन्हीं संस्थानो ने भारतीयों को ‘इलाहाबाद यूनिवर्सिटी’ मिली | आजादी के बाद शिक्षा के क्षेत्र की ज़िम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकारों ने ले ली और धीरे-धीरे इसमें निजी क्षेत्रों का आना भी शुरू हुआ है |भारत में उच्च शिक्षा में बिभिन्न क्षेत्रों जैसे टेक्नोलोजी,मेडिसिन,प्रबंधन,इंजीनियरिंग,फार्मेसी ,होटल मनेजमेंट जैसे कई डिग्री कोर्स दिये | देखा जाए तो शिक्षा के क्षेत्र में आए बदलावों में सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है | विश्वविद्यालयी शिक्षा की जरूरत सिर्फ समाज को बेहतर अर्थव्यवस्था देने नहीं बल्कि सामान्य रहन-सहन के स्तर को भी बेहतर बनाने के लिए भी है | स्कूलों से निकले ढेरों बच्चे विश्वविद्यालय के खुले माहौल में पनपना सीखते हैं|जगह-जगह से आए ये युवा एक-दूसरे के साथ साम्य बिठाना सीखकर समाजिकता की पहली पायदान चढ़ते हैं | कालेज की शिक्षा उन्हें उनके विस्तार की संभावनाएं तलाशने का मौका देती है,जो बातें किताबें नहीं सीखा पाती, दुनियादारी के उस सबक को सीखने का अवसर देती है | ये माहौल उन्हें आने वाले कल के लिए बेहतर तैयार करता है |

संगीता सिंह ‘भावना’

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