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राजनीति और रामनीति में भिन्नता

Posted On: 9 Dec, 2013 Others में

मेरा नज़रियादिशा से दशा तक

सनिल मिश्रा

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इस लेख के अंतर्गत मैंने आधुनिक और प्राचीन राजनीति मे अंतर  स्पष्ट करने का प्रयास किया है क्योंकि दुनियाँ मे भारत को सबसे बड़ा लोकतन्त्र कहा जाता है परंतु क्या वास्तव मे अभी भी वो स्वस्थ लोकतन्त्र बचा है जिसको प्रेरणा स्रोत मे भारत आज़ादी की तरफ अग्रसर हुआ था जहां जनता के अधिकारों पर राजनीति हावी हो वहाँ लोकतन्त्र कैसे हो सकता है !

अगर हम तुलना करना चाहें और ये जानना चाहें कि श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम किस आधार पर कहा जाता है इसकी विवेचना कई धर्म ग्रन्थों मे भिन्न भिन्न रूप से दर्शायी गयी है  मैंने उन सभी के कुछ अंशों को अपने लेख मे समाहित करने की कोशिश की है इसके फलस्वरूप हमने पाया है  कि जब श्री राम राजा नहीं थे तब से ही वह जनता के बीच जाकर उनके सुख दुख समझते थे उसके उपरान्त महाराज दशरथ से उन समस्याओं पर विचार विमर्श करते थे राजा न होते हुये भी दसरथ ने उन्हें वो सारे अधिकार दे रखे थे जो कि एक राजा के पास होते हैं राम सुबह ब्रह्म मुहूर्त मे जागकर प्रजा के समक्ष जाते थे और ये कार्य वो नियमित रूप से बिना किसी वाधा के पूर्ण किया करते थे यही कारण है कि श्री राम को उनके फैसलों की वजह से प्रजा मे बहुत ही लोकप्रिय बना दिया था जिससे कि लोग उनसे बहुत ही प्रेम करते थे !

जब राम वन के लिए प्रस्थान करते हैं तो प्रजा उनके रास्ते में आकर खड़ी हो जाती है और उनके चाहने वाले उन्हें रोकने की बहुत चेष्टा करते हैं और कहते हैं कि हम सब आपके साथ हैं आप कहें तो हम कल आपको राजा बना सकते हैं और हमें ये भी पता है कि इसके लिए महाराज दशरथ भी मना नहीं करेंगे क्योंकि वह ह्रदय से तो ये ही चाहते हैं कि हमारे उपरान्त राम ही राज्यभार संभालें ,

तो श्रीराम ने इसका बहुत ही सुंदर उत्तर दिया है और बोले हैं कि आप सभी ने हमारा बहुत सहयोग किया है इसलिए में आप सभी  का बहुत आभारी हूँ परंतु मेरा पिता की आज्ञा के साथ साथ वन जाने का और भी कारण है फिर प्रजा  ने पूछा अच्छा दूसरा कारण क्या है?  तो राम बोले कि दूसरों के अधिकारों के लिए लड़ना और दूसरों के अधिकारों की रक्षा करना ये दुनियाँ का सबसे बड़ा न्याय है और में ये चाहता हूँ कि अपने जीवन में कुछ न्याय कर सकूँ क्योंकि जब ईश्वर ने मुझे ये मौका दिया है तो में ह्रदय से इसे निभाना चाहता हूँ और साथ ही साथ में चाहता हूँ कि मुझे लोग न्याय के पक्ष में खड़ा देखें और न्याय के लिए संघर्ष करता हुआ देखें और लड़ता हुआ देखें , फिर कुछ लोगों ने पूछा कि आप तो वन गवन करने जा रहे हैं हम चाहते हैं कि आप अयोध्या में रहकर ही अपना लक्ष्य की ओर अग्रसर हों श्री राम फिर बोलते है कि देखिये वन में ऋषि मुनि यज्ञ एवं तपस्या हेतु आते है परंतु राक्षस प्रजाति के कुछ लोग उनकी साधना में विघ्न उत्पन्न करते हैं और जब में वन गवन करूंगा तो निश्चित ही मेरा सामना उन राक्षसों से होगा और मेरे हाथों अगर उन राक्षसों का अंत होता है तो उन तमाम ऋषि मुनियों के अधिकारों की रक्षा होगी और जब में संघर्ष करूंगा तभी आदर्श की स्थापना कर सकूँगा !

एक व्यक्ति फिर बोलता है कि अगर आपको न्याय और सत्य मार्ग पर ही चलना है तो क्यों न ये कार्य राजगद्दी पर बैठ कर कीजिये , राम फिर बोलते हैं कि देखिये अयोध्या में रहकर अगर में साशन करूंगा तो वो साशन सुख और सुविधाओं से भरा होगा और जब राजा सुख और सुविधाओं में डूबा हुआ हो तो प्रजा के कष्ट का अनुभव नहीं कर सकता है इसके विपरीत जब राजा उन्हीं कष्टों में डूबता है जिनमें प्रजा डूबी हुई है तभी उसको पता लग सकता है कि समस्या कितनी गंभीर है अगर मुझे प्रजा की समस्याएँ  समझनी हैं तो उन्हीं की तरह और उन्हीं के वीच रहना होगा जिससे उनकी समस्याओं का निवारण निस्वार्थ किया जाना संभव हो सकेगा अब यहाँ समझने वाली बात ये है की अगर राम चाहते तो सारी सुख सुविधाएं अपने साथ वन ले जा सकते थे परंतु नहीं इसका सीधा अर्थ है कि उनके मन में कोई बहुत ही बड़ा संकल्प था!

वन में जो भी घटनाएँ हुईं उन सब से हम अधिकतर लोग परिचित हैं इधर भरत को राजगद्दी सौंप दी गयी परंतु भरत का प्रजा के साथ कोई सीधा संपर्क नहीं रहा था क्योंकि भरत का अधिकतर जीवन उनके ननिहाल में व्यतीत हुआ था !

एक दिन भरत जब राम से मिलने हेतु वन में पहुंचे तो श्रीराम ने उन्हें अपने सीने से लगा लिया और भरत ने उनसे आग्रह किया कि आप घर चलिये और राज्य संभालिए तो राम ने बहुत ही मुश्किल से भरत को समझाया तब भरत माने है फिर बोले कि में ठीक से राज्य नहीं संभाल पा रहा हूँ या तो आप साथ चलिये या फिर मेरा मार्ग दर्शक बनें !

कालिदास रचित रघुवंशम के आधार पर राम ने भरत से कुछ प्रश्न किए हैंजिनकी संख्या पचास से भी अधिक है  कुछ प्रश्नों का वर्णन में कर सकूँगा क्योंकि लेख काफी बड़ा हो जाएगा!

पहला प्रश्न- क्या तुम ब्राह्मणों, गुरुओं और पुरोहितों को उतना ही सम्मान देते हो जितना कि में देता था ?

भरत बोले को गुरुओं का तो ठीक है परंतु पुरोहितों का राज्य से क्या संबंध है तो राम बोले कि जिस राज्य के पुरोहित राजा के हाथों सम्मानित नहीं होते हैं वो राज्य कभी ऊंचाई पर नहीं पहुँच सकता है वो डूब जाता है आगे बोलते हैं कि जो पुरोहित हैं वो राज्य के लोगों का जिंदा रहने का आधार हैं क्योंकि पुरोहित जहां पूजा कराते हैं जिसे यजमान कहा जाता है और पुरोहित जी बोलते हैं कि हवन सामग्री लाइये, 5 घड़े लाइये, कलावा लाइये और 5 किलोग्राम घी लाइये जिससे कि सोचो कितने लोगों को काम मिलता है कुम्हार को काम मिलता है कलबा से सूत काटने वाले को काम मिलता है और घी से ग्वालों को काम मिलता है पुरोहित तो राज्य विस्तार करते हैं इसलिए उनका सम्मान करना अति आवश्यक है !

दूसरा प्रश्न – तुम्हारे राज्य में जो भी लोग कार्यरत हैं क्या उन्हें समय से वेतन मिलता है ?

तो भरत ने कहा कि कभी कभी बिलंभ भी हो जाता है श्रीराम फिर बोले कि जिन व्यक्तियों को तुमने पगार पर रखा है उन्हें अगर तुम समय से पगार नहीं दोगे तो उनकी बफदारी डिगने में तनिक भी देरी नहीं होगी!

तीसरा प्रश्न- तुम जिस व्यक्ति से सलाह लेते हो उसकी आर्थिक जीविका तुमसे तो नहीं चलती है?

भरत बोले कि इसमें बुराई क्या है तो श्रीराम फिर उन्हें समझाते हुये बोले कि भरत जिसे तुमने पगार पर रखा हो वो तुम्हें हमेशा वो ही सलाह देगा जो तुम्हें अच्छी लगे अर्थात सलाह उसी व्यक्ति से लेना जो पूर्ण रूप से स्वयं में स्वतत्र हो!

चौथा प्रश्न- तुम प्रजा के सुझाव मानते हो कि नहीं?

तो भरत ने कहा कि हाँ पर कभी कभी नहीं  भी मानता हूँ तो श्रीराम बोले कि जब तुम प्रजा की बात सुनोगे तभी ही प्रजातन्त्र स्थापित होगा !

पाँचवाँ प्रश्न- ब्राह्मण और पुरोहित जो पैसों के लिए काम करते है उन्हें राज्य से निकाला कि नहीं?

भरत बोले नहीं तो श्रीराम फिर बोले क्योंकि जो ब्राह्मण और पुरोहित पैसों के लिए कार्य करते हैं उन्हें निस्काषित नहीं किया तो एक दिन वो तुम्हें ही निस्काषित कर देंगे !

बहुत सारे प्रश्न किए थे श्रीराम ने परंतु हमने कुछ ही आपके सामने रख पाये हैं क्योंकि लेख बहुत ज्यादा बड़ा होता जा रहा है और इसमें आगे फिर लिखने का प्रयत्न अवश्य ही करूंगा क्योंकि श्री राम ने जो एक आदर्श राजा के गुड बतलाए हैं उनकी व्याख्या में नहीं कर पाया हूँ !

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