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जाति और वर्ग

Posted On: 25 Jul, 2016 Others में

सत्यानाशी Just another weblog

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जाति और वर्ग

(कांचा इलैया की पुस्तक “मैं हिन्दू क्यों नहीं हूं” के संदर्भ में)

ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार कि वर्ग एक ठोस वैश्विक यथार्थ है, जाति एक ठोस भारतीय-एशियाई सच्चाई है, जो मनु आधारित वर्ण-व्यवस्था की उपज है. यह वर्ण-व्यवस्था बहुसंख्यक मेहनतकशों के श्रम को हड़पने की और इससे पैदा अतिरिक्त मूल्य और मुनाफे को उच्चवर्णीय अल्पसंख्यक समुदाय की सेवा और ऐशो-आराम के लिए लगाती है. इस प्रकार यह शोषण की संस्कृति पर आधारित व्यवस्था है.

जातिवाद के गहरे निहितार्थ हैं और सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-राजनैतिक आयाम. यदि सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू को छोड़ दिया जायें, तो आज जातिवाद का स्वरुप शुद्ध ब्राह्मणवाद तक सीमित नहीं रह गया है, जैसा कि इलैया मानते हैं.

वर्ग भेद के भी गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-राजनैतिक आयाम हैं. आदिम साम्यवाद की व्यवस्था से गुजरने के बाद से ही मानव सभ्यता का चरित्र वर्गीय हो जाता है, लेकिन पूंजीवाद में इसका स्वरुप व शोषण खुलकर सामने आ जाता है.

हम एक शोषणमुक्त समाज की स्थापना करना चाहते हैं, तो यह वर्गहीन समाज में ही संभव है. वर्गहीन समाज के लिए यह जरूरी है कि जाति-आधारित शोषण का भी वह खात्मा करें. इस मायने में वर्गहीन समाज का सामाजिक स्वरुप जातिहीन समाज की ओर बढ़ना ही है. लेकिन इसके उलट, एक जातिहीन समाज क्या वास्तव में एक वर्गहीन समाज होता है? या एक जातिहीन समाज क्या वास्तव में वर्गीय शोषण का खात्मा कर देता है? यूरोप का इतिहास देखे या समकालीन यूरोपीय पूंजीवाद पर नजर डालें, जहां ‘वर्ण व्यवस्था और जातिवाद’ की ठोस भारतीय-एशियाई संरचना लागू नहीं की जा सकती, वहां भी शोषण पर आधारित दूसरे सामाजिक-सांस्कृतिक कारक काम करते हैं. स्पष्ट है कि जातिहीन समाज वर्गहीन समाज नहीं हैं. इसलिए यह कहना कि भारतीय संदर्भ में जाति ने वर्ग का स्थान ले लिया है, पूरी तरह से सही नहीं है. वास्तव में जातिवाद, भारतीय संदर्भ में शोषण पर आधारित व्यवस्था को बनाये रखने की एक ठोस वर्गीय सच्चाई है. इसीलिए जातिवाद के खिलाफ संघर्ष को शोषणमुक्त समाज की स्थापना के लिए वर्गीय संघर्षों से जुड़ना चाहिए.

भारतीय संविधान ‘अनुसूचित जातियों’ की बात करता है. राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गांधीजी ने इस समुदाय को ‘हरिजन’ के रूप में चिन्हित किया था. वर्तमान राजनैतिक आंदोलनों में यह समुदाय ‘दलित’ के रूप में अभिव्यक्त हो रहा है. कांचा इलैया इन अनुसूचित जातियों को पिछड़ी जातियों के साथ मिलाकर निर्मित इस विशाल समुदाय को ‘दलित बहुजन’ कहकर संबोधित करते हैं. ऐसी ही सोशल इंजीनियरिंग कांशीराम ने ‘बहुजन’ के नाम पर की. नाम आप कुछ भी दे दें, वास्तव में लक्षित समुदाय स्पष्ट है, जिसे वर्तमान प्रचलित अर्थों में ‘दलित’ माना जाता है. इस ‘दलित’ समुदाय का अस्तित्व ‘अनुसूचित जातियों’ के बाहर भी है और सामाजिक रूप से कथित पिछड़ों के साथ उनका कोई साम्य भी नहीं है. ये वे दलित हैं, जो आरक्षण की व्यवस्था के बावजूद राजनैतिक-सांस्कृतिक स्तर पर बहुत पिछड़े हुए तो हैं ही, सामाजिक और आर्थिक शोषण के भी शिकार हैं और समाज श्रेणी में उनका स्थान पिछड़े वर्गों से भी नीचे हैं.

कांचा इलैया ने दलितों के सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर जीवन का यथार्थवादी चित्रण किया है. उनका निष्कर्ष एकदम सही है कि दलितों की संस्कृति ‘श्रम पर आधारित’ संस्कृति है. उनके दैनिक क्रियाकलापों, सामाजिक आचार-विचार-प्रथाओं, विश्वासों, मान्यताओं, रहन-सहन के तरीकों से वे इसे स्थापित करते हैं. दलितों के इस चित्रण से किसी को इंकार नहीं है. लेकिन जब वे इन आधारों को राजनैतिक-आंदोलनात्मक स्तर पर प्रक्षेपित करते हैं, तो बड़े विचित्र निष्कर्ष देते हैं.

मसलन, ‘भूमिका’ में वे कहते हैं –” एक समयावधि में ब्राह्मणवादी जातियां जातिहीन और वर्गहीन हो जायेंगी, तब हम एक समतावादी भारत की स्थापना करेंगे.” लेकिन ब्राह्मणवादी जातियों के जातिहीन व वर्गहीन होने की क्या प्रक्रिया होगी, इस पर वे चुप्पी लगा जाते हैं. ऐसा इसलिए कि वे समूचे दलित समुदाय को आर्थिक स्तर पर शोषित वर्ग के समकक्ष मान लेते हैं. क्या केवल ब्राह्मणवादी जातियों को ही जातिहीन और वर्गहीन होने की जरूरत है, दलितों को नहीं? पूरी पुस्तक में वे इस बात का विस्तार से उल्लेख करते हैं कि दलित बहुजनों में भी किस तरह सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर ब्राह्मणवाद ने घुसपैठ कर ली है — न केवल दैनिक क्रियाकलापों में, बल्कि वैचारिक स्तर पर भी. वास्तव में तो समतावादी भारत की स्थापना की प्रक्रिया में ही जातिवाद और ब्राह्मणवाद से सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर, तो राजनैतिक-आर्थिक स्तर पर वर्गीय शोषण से लड़ने की जरूरत होगी. उन्होंने सविस्तार इसका उल्लेख किया है कि किस प्रकार हिन्दूवाद ‘सहयोजन’ और ‘बहिष्करण’ के सिद्धांत पर काम करता है और जातियों को अपने में मिलाने हेतु घुसपैठ करता है. उन्होंने विस्तार से बताया है कि किस प्रकार नवक्षत्रियों के रूप में शूद्र उच्च जातियों का उभार हो रहा है और वे खुद को आक्रामक ढंग से हिन्दुत्व से जोड़ रहे हैं. वे कहते हैं, “कई दलित बहुजनों ने अपना संस्कृतिकरण करने के काफी प्रयास किये हैं. उन्होंने अपने वास्तविक नामों को ब्राह्मणवादी नामों में परिवर्तित कर लिया है. मुथैया मूर्ति बन गये हैं और गोपियाह गोपाल कृष्णन. …ऐसे अनेकों दलित बहुजन अफसर, राजनेता, अकादमीशियन और डॉक्टर हैं, जिन्होंने हिन्दुओं से भी ज्यादा हिन्दू होने की कोशिश की है.” (पेज 63)

वास्तव में स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान ही भारत के एक आधुनिक राष्ट्र में तब्दील होने की प्रक्रिया शुरू हुई थी. इसी समय साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष विकसित हुए, राष्ट्रवादी चेतना का उभार सामने आया, जातिविरोधी आंदोलन विकसित हुए और ब्राह्मणवाद विरोधी आंदोलन के रूप में उसने अपना आकार ग्रहण किया. राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा — जिसका नेतृत्व गांधीजी और कांग्रेस करते थे — का मुख्य निशाना साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद ही था, उसने जातिवाद व इसे पैदा करने वाले सामाजिक-आर्थिक कारकों पर कभी गंभीरता से चोट करने की कोशिश नहीं की. गांधीजी ने तो स्वयं को वर्ण व्यवस्था को मानने वाले सनातनी हिन्दू के रूप में अपने को घोषित किया. यही कारण है कि –“(कांग्रेस) पार्टी के अंदर एक ऊंची जाति के हिन्दू और गैर-हिन्दू दलित बहुजन के बीच अंतर बना रहा. …इसका कारण यही था कि हिन्दू नेता धार्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर दलित बहुजनों के साथ लगातार किसी ‘दूसरे’ जैसा व्यवहार करते रहे. …पार्टी की उपरली पांतों में उनकी प्रतिष्ठा बहुत ही कम बन पाई.” (पेज 55)

महाराष्ट्र में जातिवाद विरोधी आंदोलन की धारा ज्योतिबा फुले के नेतृत्व में विकसित हुई और इसने ब्राह्मणवादी सर्वोच्चता को चुनौती दी. उन्होंने पूर्ण समानता की, दलित और स्त्री-शिक्षा की, विधवा विवाह की और नौकरशाही के दमन की मांग की. विचारधारात्मक रूप से यह कार्यक्रम गांधीवादी कार्यक्रम से बहुत आगे था, लेकिन ज्योतिबा की मृत्यु के बाद इस आंदोलन का चरित्र ख़त्म हो गया. बाद में कोल्हापुर के महाराज शाहू ने इसकी कमान संभाली और उन्होंने मांग की कि हमें भी ‘क्षत्रिय’ माना जायें. इस प्रकार शाहू महाराज खुद हिन्दुत्व के जाल में फंस गए. पेरियार ने भी जातिवाद के खिलाफ संघर्ष किया, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. असल में जात-पात विरोधी आंदोलन हमेशा साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलन और कृषि क्रांति के लिए संघर्ष से कटा रहा.

कांचा इलैया अपनी पुस्तक में इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि हिन्दूवाद ने समग्र रूप से जो सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक संरचना बनाई है, वह किस कदर हिंसा पर आधारित है. इसके लिये वे हिन्दू देवी-देवताओं का उदाहरण देते हैं, जो कभी भी जनसमुदाय की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति नहीं देते, बल्कि विजेता बनकर हिंसा को न्यायसंगत ही ठहराते हैं. इस प्रकार हिन्दू धर्म में हिंसा एक सकारात्मक लोकाचार के रूप में ही स्थापित है और इसीलिए आधुनिक लोकतंत्र से उसका कोई लेना-देना नहीं है. वे कहते हैं –“ब्राह्मणवादी संस्कृति एक हिंसक और वर्चस्ववादी संस्कृति रही है. उसने दलित बहुजन उत्पादन ढांचों, संस्कृति, अर्थतंत्र और उसके सकारात्मक राजनीतिक ढांचों को बर्बाद किया है. …उपनिवेशविरोधी संघर्ष को चलाते हुए ब्राह्मणवादी नेताओं और विचारकों ने जातिविरोधी समतावादी विचारधारा का निर्माण करने के लिए कोई कोशिश नहीं की. . इसके उलट उन्होंने बर्बर हिन्दू संस्कृति को बढा-चढ़ाकर पेश किया. …इसके लिए उन्होंने एक नई विचारधारा की रचना की. यह विचारधारा थी — ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद. इसको खड़ा करने के लिए उन्होंने ऊंची जातियों के वर्चस्व की पुनर्रचना की. इसके लिए उन्होंने मंडलविरोधी विचारधाराओं, अयोध्या आधारित राम संबंधी नारों और संघ परिवार के ‘अखंड भारत’ और ‘अल्पसंख्यक तुष्टिकरण’ के सिद्धांत का प्रयोग किया.” (पेज 104-105). यह ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद संघी गिरोह का ‘हिन्दू राष्ट्र’ ही है. राष्ट्रवाद के नाम पर आज जितनी भी बहस चलाई जा रही है, वह वास्तव में ऊंची जातियों के वर्चस्व को बनाए रखने के लिए तथा दलित-अल्पसंख्यकों के दमन पर ही आधारित है.

अम्बेडकर जैसा तीखा प्रहार जातिवाद पर फुले के बाद किसी ने नहीं किया. उन्होंने कांग्रेस के पाखंड का भी भंडाफोड़ किया. जातिवादी भेदभाव से मुक्त होने के लिए धर्मांतरण का भी रास्ता अपनाया. भारतीय संविधान भी उन्होंने ही बनाया, लेकिन दलितों की स्थिति में परिवर्तन लाने में वे नाकामयाब ही रहे. इससे स्पष्ट है कि जातिवाद के खिलाफ लड़ाई को जाति-संघर्ष से नहीं, बल्कि वर्ग-संघर्ष से ही जोड़ना होगा. भारतीय संदर्भ में जाति और वर्ग किस तरह से घुले हुए हैं, कांचा इलैया इसे इस तरह रेखांकित करते हैं, ” एक अमीर माला या मडिग्ग और एक संपत्तिवान ऊंची जाति के व्यक्ति के बीच का संबंध कुछ-कुछ एक ऊंची जाति के गरीब व्यक्ति और एक गरीब दलित बहुजन के बीच के संबंध जैसा ही था. ऊंची जाति का एक गरीब आदमी हमेशा अपने-आपको ऊंची श्रेणी का ही मानता है. इसी प्रकार ऊंची जाति का अमीर आदमी भी अपने-आपको हमेशा ऊंचा ही मानता है. संपत्ति होने से एक वर्ग विशेष में आ जाने के बावजूद दलित बहुजनों की सामाजिक प्रतिष्ठा में कोई बदलाव नहीं आता है. अमीर वर्ग के भीतर भी जाति की भिन्नता बनी रहती है.” (पेज 55)

वामपंथ ही है, जिसने आज़ादी के आंदोलन के दौरान और उसके बाद लगातार इस बात पर जोर दिया है कि वास्तविक कृषि क्रांति के बिना दलितों की और शोषितों की मुक्ति संभव नहीं है. जहां वामपंथ जातिवाद के खिलाफ लड़ाई को वर्ग-संघर्ष से जोड़ने पर बल देता है, वहीँ कांचा इलैया भारतीय समाज के समतावादी भविष्य की स्थापना के लिए समग्र समाज के दलितीकरण पर जोर देते हैं. यह कोई वर्गीय समाधान नहीं है और शोषणमुक्त समाज की स्थापना के लिए कोई आश्वस्ति भी नहीं है. आखिर एक समतावादी समाज को शोषणमुक्त समाज भी होना ही चाहिए.

(लेखक की टिप्पणी — बतौर एक पाठक ही)

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