blogid : 12043 postid : 1297469

नोटबंदी : काले धन पर प्रहार या जनता के खिलाफ युद्ध ??

Posted On: 4 Dec, 2016 Others में

सत्यानाशी Just another weblog

sanjay parate

24 Posts

5 Comments

इस देश की जनता देश-विदेश में जमा काले धन को निकालना चाहती है, ताकि उसका उपयोग देश के विकास के लिए किया जा सके. भाजपा ने आम जनता की इस भावना का दोहन करते हुए वादा किया था कि विदेशों में काले धन के रूप में जमा 375 लाख करोड़ रुपयेदेश में वापस लाएगी और हर परिवार के खाते में 15 लाख रूपये जमा करेगी. लेकिन चुनाव के बाद उसने इसे ‘जुमला’ बताया ! विदेश से काला धन तो वापस नहीं आया, लेकिन अब उसने काले धन के नाम पर 500 और 1000 रूपये के नोटों की नोटबंदी करके हर भारतीय को ‘कालाधन-धारक’ के रूप में कटघरे में खड़ा जरूर कर दिया है. इस ‘तुगलकी’ फैसले ने देश की आम जनता की बचत, उसकी रोजी-रोटी और देश की अर्थव्यवस्था पर कुठाराघात किया है और 80 से ज्यादा लोगों की बलि ले ली है.

नोटबंदी के दुष्परिणाम :

— भयंकर मुद्रा संकट पैदा हो गया है. इसके चलते करोड़ों मजदूर-किसानों-मछुआरों, छोटे व्यापारियों-दुकानदारों और नकद लेन-देन पर निर्भर लोगों की रोजी-रोटी ध्वस्त हो गई है. बड़े पैमाने पर लोगों की छंटनी हो रही है.

— खेती-किसानी का काम ठप्प हो गया है. न कटाई के लिए पैसे हैं और न बुआई हेतु खाद-बीज के लिए. मंडियों में पड़ा अनाज और सब्जियां सड़ रही हैं. सहकारी समितियों और बैंकों को नोट बदलने की इजाज़त न होने के कारण बैंकिंग गतिविधियां ठप्प हो गई है.

— आम जनता न तो जरूरत का सामान खरीद पा रही है और न ही अपना ईलाज या शादी-ब्याह करवा पा रही है. लोगों की अपनी ही जमा की निकासी पर रोक लगा दी गई है.

— इससे देश की अर्थव्यवस्था मंदी में फंस गई है और इससे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर में दो प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आएगी.

काला धन : वास्तविक तथ्य क्या है?

— रिज़र्व बैंक के अनुमान के अनुसार ही हमारे देश की सकल अर्थव्यवस्था 150 लाख करोड़ रुपयों की है और  हर साल इस जीडीपी का 25% काले धन के रूप में पैदा होता है – यानि 35-40 लाख करोड़ रूपये प्रतिवर्ष. पिछले 15 वर्षों में लगभग 500 लाख करोड़ रुपयों का काला धन पैदा हुआ है. लेकिन इसका बहुत छोटा हिस्सा ही देश में है और नोटों के रूप में तो बहुत ही कम. अतः 500 व 1000 के नोटों की नोटबंदी से काले धन पर कोई असर नहीं होगा, क्योंकि काला धन तो देश-विदेश में परिसंपत्तियों के रूप में जमा है.

— रिज़र्व बैंक के अनुसार ही, हमारे देश में केवल 16 लाख करोड रुपयों की मुद्रा प्रचलन में है और इसका 86% केवल 500 व 1000 के नोटों में है. इसमें से केवल एक लाख करोड़ रूपये के नोट ही काले धन के रूप में संचित है. इसके लिए 14 लाख करोड़ मूल्य के नोटों की नोटबंदी करके 130 करोड़ जनता को मुसीबत में डालना ‘तुगलकी’ फैसला ही है.

— 30 दिसम्बर तक नकद प्रवाह के जरिये स्थिति सामान्य हो जाने का दावा भी थोथा ही है. पिछले तीन सालों में रिज़र्व बैंक ने औसतन 42340 लाख नोट 500 रूपये के तथा 9490 लाख नोट 1000 रूपये के छापे हैं. लेकिन नोटबंदी के कारण 220330 नोट चलन के बाहर हो चुके हैं. अब इतने ही मूल्य के 500 व 2000 रूपये के 1.33 लाख नोट छापने, बैंकों तक पहुंचाने और आम जनता में वितरण करने में तीन साल से ज्यादा लगेंगे. तब तक नकदी का संकट हमारी अर्थव्यवस्था में बना रहेगा. इन नए नोटों को छापने और एटीएम मशीनों के ट्रे बदलने के लिए 25000 करोड़ रुपयों का अतिरिक्त खर्च आएगा, सो अलग.

काले धन के स्रोतों पर प्रहार नहीं :

— बड़े-बड़े पूंजीपतियों और कार्पोरेट घरानों ने बैंकों का 16 लाख करोड़ रुपयों से ज्यादा हड़प कर लिया है. वे ब्याज तो क्या, मूलधन भी देने को तैयार नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार इन ‘डकैतों’ के नाम सार्वजनिक करने को तैयार नहीं है. बल्कि उसने तो इसे बट्टे-खाते में डाल दिया है.

— निवेश के नाम पर काला धन ‘मारीशस रुट’ के जरिये भारत आ रहा है और इन पर कोई टैक्स भी देय नहीं है. काले धन के निवेश के इन चोर रास्तों को बंद करने के लिए सरकार तैयार नहीं है.

— विकीलीक्स और पनामा पेपर्स ने उन लोगों के नाम उजागर किये हैं, जिन्होंने विदेशी बैंकों में काला धन जमा करके रखा है. स्विस बैंकों ने 1200 भारतीयों के नाम उजागर किये हैं, जिनमें अंबानी, बिड़ला, डाबर, छाबरिया, डालमिया परिवार, जेट एयरवेज के नरेश गोयल, एस्सार ग्रुप के प्रणव गुप्ता, एस्कॉर्ट्स के नंदा, प्रणीत कौर, अनु टंडन, नारायण राणे का परिवार और स्मिता ठाकरे आदि के नाम शामिल हैं. लेकिन इनके काले धन को देश में लाने में सरकार अभी तक विफल रही है.

— आयकर विभाग के अनुसार, वर्ष 2013-14 में स्टॉक मार्केट का कुल टर्न-ओवर 32 लाख करोड़ रूपये था, जो वर्ष 2014-15 में बढ़कर 66 लाख करोड़ हो गया. इस तरह शेयर मार्केट में एक साल में ही 30 लाख करोड़ रुपयों के काले धन के निवेश का अनुमान है. आयकर विभाग के पास उन सभी लोगों के नाम हैं, जो कर चोरी के काले कामों में शामिल हैं. लेकिन आज तक इन लोगों पर हाथ नहीं डाला गया है.

— 45% कर चुकाकर काले धन को सफ़ेद करने की योजना पूरी तरह फ्लॉप साबित हुई है. इससे केवल 65000 करोड़ रूपये ही निकल पाए हैं.

— इससे स्पष्ट है कि सरकार के कर-राजस्व या ऋण वसूली में कोई बढ़ोतरी नहीं हो रही है. तो ऐसी नोटबंदी से फायदा क्या? इस नोटबंदी से आम जनता की संचित निधि ही बैंकों में जमा हुई है, जिस पर अब ब्याज दर घटाने की तैयारी की जा रही है. आम जनता के इन पैसों को फिर से उन्हीं धन कुबेरों को क़र्ज़ दिया जाएगा, जो पहले के क़र्ज़ हड़पकर बैंकों को दिवालियेपन की कगार में पहुंचाने के लिए जिम्मेदार है.

प्रमुख मांगें :

1. जब तक नए मुद्रा की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित नहीं की जाती, 500 और 1000 के पुराने नोटों को तमाम वैध लेन-देन में चलने दिया जाए.

2. सहकारी समितियों और बैंकों सहित तमाम सरकारी विभागों व सार्वजनिक उपक्रमों को पुराने नोटों को लेने का अधिकार दिया जाएं, ताकि सभी गरीब अपने नोट बिना किसी दिक्कत के बदल सके.

3. काले धन के वास्तविक स्रोतों पर प्रहार किये जाएं. बड़े बैंक डिफाल्टरों, कर-चोरों, काले धंधे में लगे लोगों, हवाला कारोबारियों, शेयर बाज़ार में काला धन लगाने वालों तथा भ्रष्टाचारियों के खिलाफ दृढ़तापूर्वक कार्यवाही की जाए.

4. रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता को बहाल किया जाए.

5. जनधन खातों में जमा राशि का उपयोग किसानों की क़र्ज़माफ़ी के लिए किया जाएं.

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग