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महाराज भर्तृहरि का वैराग्य शतकम्-1

Posted On: 1 Dec, 2014 Others में

social issuधरती की गोद

sanjay kumar garg

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rishi1.jpgवैराग्य शतकम् में भर्तृहरि ने कारुण्य और निराकुलता के साथ संसार की नश्वरता और वैराग्य की आवश्यकता पर बल दिया है। संसार एक विचित्र पहेली है-कही वीणा का सुमधुर संगीत है, कही सुन्दर रमणीयाँ दिख पड़ती है तो कहीं कुष्ठ पीडि़त शरीरों के बहते घाव तो, कही प्रिय के खोने पर बिलखते स्वजन, अतः पता नहीं, यह संसार अमृतमय है या विषमय, वरदान है या अभिशाप। आओ देखें वैराग्य शतकम् में भर्तृहरि क्या कहते हैं-

भर्तृहरि लिखते हैं कि-‘‘बुद्धिमान लोग ईर्ष्या ग्रस्त हैं, राजा अथवा धनी लोग धन के मद में मत्त हैं, अन्य लोग अज्ञान से दबे हुये हैं अतः सुभाषित (उत्तम काव्य) शरीर में ही जीर्ण हो जाते हैं।‘‘।। 2।।

भर्तृहरि लिखते हैं कि मैंने ‘‘धन प्राप्ति की आशा से (गड़ा हुआ धन मिलेगा) भूमि को खोदा, मैनसिल आदि पर्वत की अनेक धातुओं को स्वर्ण-प्राप्ति की इच्छा से फूंक डाला, मोतियों की प्राप्ति की आशा से समुद्रों को मथ डाला, बड़े प्रयत्न से राजा आदि श्रीमानों को भी संतुष्ट किया, सिद्धिदायक मन्त्राराधन में तत्पर होकर श्मशान में भी कितनी ही रात्रियां व्यतीत की परन्तु मुझे कानी कौड़ी की भी प्राप्ति नहीं हुई। हे तृष्णा! अब तो तू मेरा पिण्ड छोड़ दे।‘‘।। 4।।

भर्तृहरि कहते हैं इतने पर भी मुझे संतुष्टी नहीं मिली-‘‘अनेक प्रकार के जल, वृक्ष, पर्वतादि दुर्ग के कारण दुर्गमनीय देशों-स्थानों का भ्रमण किया, परन्तु कुछ भी फल नहीं पाया, जाति और कुल का अभिमान छोड़कर श्रीमानों की सेवा की परन्तु सब व्यर्थ, अपने मान-सम्मान को तिलांजलि देकर दूसरों के घर पर लोभवश कव्वे के समान भोजन करता रहा, इतने पर भी, पाप कर्म में प्रवृत्त करने वाली तृष्णे! तू संतुष्ट नहीं हुयी।‘‘।। 5।।

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भर्तृहरि आगे लिखते हैं-‘‘सूर्य के उदय और अस्त होने के साथ-साथ प्रतिदिन आयु भी घटती जाती है। बहुत ये देय-गेय संबंधी कार्याे से (जीवनोपाय के उद्योगों से) समय के व्यतीत होने का ज्ञान नहीं होता। जन्म, जरा, कष्ट, और मृत्यु को देखकर भी मनुष्य को भय उत्पन्न नहीं होता इससे ज्ञात होता है कि सारा जगत मोहरूपी मदिरा का पान करके मतवाला हो रहा है।‘‘।। 7।।

भर्तृहरि लिखते हैं कि जीने की इच्छा अब तक समाप्त नहीं हुई है-‘‘सांसारिक विषयों की वासना समाप्त हो गयी, लोगों में पहले जो आदर मान और सम्मान था वह भी कम हो गया। समव्यस्क प्राणों के समान प्रिय मित्र भी दुरवस्था भोगने से पूर्व ही स्वर्ग सिधार गये, हम भी लकड़ी के सहारे धीरे-धीरे उठ पाते हैं, दृष्टि क्षीण हो गयी है फिर भी ज्ञानहीन शरीर मरने की बात सुनकर चौंक पड़ता है अर्थात इतना सब के बाद भी जीने की इच्छा बनी हुई है।‘‘।। 9।।

भर्तृहरि आगे लिखते हैं-‘‘खाने के लिये वृक्षों के फल पर्याप्त हैं, प्यास मिटाने के लिये झरनों का स्वादिष्ट जल भी भरपूर है, सोने के लिये विशाल पृथ्वी है और तन ढकने के लिये वल्कल वस्त्र भी बहुत उपलब्ध हैं-ऐसी दशा में अभी-अभी प्राप्त धन रूपी मदिरा के पान से जिनकी सारी इन्द्रियां भ्रान्त हो रही हैं, ऐसे दुष्ट जनों की अनादरपूर्वक बातें सुनने को मेरा उत्साह नहीं है।‘‘।। 20।।

भर्तृहरि कहते हैं कि हमें राजसभा में कौन पूछता है-‘‘हम न तो नट हैं जो भिन्न-भिन्न प्रकार का वेष धारण कर विचित्र ढ़ंग से नृत्य करते हैं और न विट हैं जो पर-स्त्रियों के लम्पट होते हैं, न गायक हैं, न असभ्यों की अश्लीलतापूर्ण बातचीत करने में प्रसिद्ध हैं और न स्तनों के भार से कुछ झुके अंगों वाली स्त्रियां ही हैं फिर राज सभा में हमें पूछता ही कौन है? अर्थात राजसभा में उपरोक्त की ही पूछ होती है।‘‘।। 25।।

निम्न अवस्थाओं के बाद व्यक्ति को जंगल मेें निवास करने की सलाह भर्तृहरि देते हैं-‘‘मान-सम्मान प्रतिष्ठा के कम होने पर, धन के नष्ट होेने पर, याचक के निराश होकर निरर्थक लौट जाने पर, स्त्री-पुरूष और संबंधियों के परलोक सिधार जाने पर, सेवक-वर्ग के चले जाने पर और शनै-शनै यौवन के ढल जाने पर बुद्धिमानों को यही उचित है कि वे गंगा के जल से पवित्र पत्थर वाले गिरीन्द्र हिमालय की गुहा के आस-पास किसी कुंज में निवास करें अर्थात समाज से नाता तोेड़कर आत्मअनुसंधान करें।‘‘।। 29।।

भर्तृहरि लिखते हैं कि वैराग्य ही निर्भय है-‘‘विषय-भोगोें को भोगने में रोग का भय, वंश में आचार भ्रष्टता, जाति-विच्छेद अथवा संतान-विच्छेद का भय है, धन की समृद्धि में राजा द्वारा छीने जाने का भय है, मौन रहने पर दीनता का, बल में शत्रुओं का, रूप-सौन्दर्य मे वृद्धावस्था, शास्त्र में शुष्कवाद का अथवा प्रतिवाद द्वारा पराजित होने का, गुण में दुष्टों द्वारा व्यर्थ निन्दा का, शरीर को काल का भय हैै। इस प्रकार पृथ्वी पर सभी वस्तुयें भय से युक्त हैं केवल एक वैराग्य ही निर्भय है।‘‘।। 32।।

काल को नमस्कार करते हुये भर्तृहरि लिखते हैं- ‘‘यह रमणीक नगरी, वह चक्रवती सम्राट, उसके मांडलिक राजाओं का समूह, तथा प्रसिद्ध विद्धानों की सभा, चन्द्रमा की चन्द्रिका के समान सुन्दर मुख वाली ललनाएं, उद्दंड राजपुत्रों का समूह, स्तुति करने वाले बन्दीगण, बन्दीजनों के द्वारा कथन की गयी उत्तम-उत्तम कथाएं-जिसके कारण ये सब वस्तुयें स्मृति-मात्र रह गयी हैं, इस सब का संहार करने वाले काल को बारम्बार नमस्कार है।‘‘।। 33।।
thanks from googleभर्तृहरि संसार की ‘नश्वरता‘ के बारे में लिखते हैं-‘‘जिस स्थान पर अथवा घर में अनेक प्राणी थे, वहां आज एक ही शेष रहा है। किसी स्थान पर जहां पहले एक था, फिर अनेक हुये और अन्त में एक भी नहीं रहा। ऐसा प्रतीत होता है कि दिन-रात रूपी पासों से काल-रूपी जुआरी संसार रूपी चौपड़ में प्राणियों को गोट बनाकर कालों के साथ खेल खेल रहा है अर्थात काल इच्छानुसार प्राणियों को नचा रहा है।‘‘ ।। 35।।

भर्तृहरि कहते हैं इस ‘अल्पकालीन‘ जीवन में हम क्या करें? ‘‘हम लोग तप करते हुए वैराग्यपूर्वक गंगा के तट पर रहें? अथवा सौभाग्यसुशीलता आदि गुणों से अलंकृत सुन्दर भार्या का सांसारिक धर्म से अनुसरण करें? या शास्त्रों के समूह का अर्थ ह्दयगंम करें? या काव्यमृत का अस्वादन करेें? कुछ समझ नहीं आता कि इस अल्पकालीन जीवन में हम क्या करें?‘‘।। 36।।

भर्तृहरि जी आगे जीवन की समानता बताते हुये कहते हैं-‘‘हमारे लिये देवों के देव महादेव ही एकमात्र उपास्य देव है, गंगा ही एकमात्र सेवनीय नदी है, पर्वतोें की गुुफायें ही सुन्दर घर हैं, दिशाएं ही भव्य वस्त्र हैं, काल ही मित्र है और निर्भयता एवं अदीनता ही हमारा व्रत है और क्या कहें नाना प्रकार की सुख-सुविधा पहुंचाने के काण वट-वृक्ष ही हमारी प्रिय भार्या है।‘‘ ।। 39।।

महाराजा भर्तृहरि जी ने ‘संसार‘ को ‘नदी‘ के समान बताकर कितनी सुन्दर उपमाएंँ दी हैं-‘‘इस संसार में आशा नामक एक नदी है। यह नदी मनोरथ (खान-पान विहार आदि इच्छा रूपी) जल से परिपूर्ण है। इसमें तृष्णा (अप्राप्त वस्तुओं की प्राप्ति रूपी इच्छा) की तरंगे उठ रही है। अभीष्ट पदार्थो के प्रति राग और द्वेषरूपी मगरमच्छों से ये भरी हुयी हैं। तर्क-वितर्क रूपी जल-पक्षियों से आकीर्ण हैं। धैर्य रूपी वृक्षों को यह उखाड़ फेंकने वाली हैं। इस नदी में अज्ञान-वृत्ति-दर्प-दम्भ रूपी भंवर पड़ रहे हैं, यह पार करने में अत्यंत दुस्तर है। चिन्ता रूपी ऊंचे-ऊचे इसके तट हैं। इसे पार करना अत्यंत कठिन है, परन्तु शुद्धान्तकरणः योगी इस नदी को पारकर ब्रह्मानन्द में मग्न होकर आनन्दित होते हैं।‘‘

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