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ईवीएम का जिन्न

Posted On: 26 Jan, 2019 Politics में

संजीव शुक्ल ‘अतुल’कुछ मन की बातें

sanjeev shukla

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ये दावा कि EVM गलत है तो फ़िर उसे साबित क्यों नहीं करते। सिर्फ़ आरोप लगाने से आपकी हैसियत में कोई ख़ास इज़ाफ़ा नहीं होने वाला। आरोप चुनाव जीतने के हथकंडे तो हो सकते हैं,जैसा कि हर चुनावों में होता भी है, पर ये आरोप हमेशा नैय्या पर लगाएगें ऐसा संभव नहीं। क्योंकि अगर आप किसी पर आरोप लगाते हैं तो उसे साबित करने की जिम्मेदारी भी आपकी ही है। मिथ्या आरोप लगाकर आप किसी को बार-बार बेवकूफ़ नहीं बना सकते । पिछले चुनाव में वाड्रा पर तमाम आरोप लगाए गए, पर उन आरोपों की परिणति क्या रही?? अगर दोषी हैं तो उन्हें जेल क्यों नहीं भेजा गया उसके लिए किसके दिशा-निर्देशों की प्रतीक्षा की जा रही थी?? सत्ता मिलने के बाद गलबहियों का खेल

क्या सत्ता में रहने के बाद आप फिर से इन्हीं आरोपों को दुहरायेंगे, जबकि आप आरोपी व्यक्ति की जांच करवाकर उसे जेल भिजवा सकते थे।
निश्चित रूप से चुनाव निष्पक्ष होने ही चाहिये क्योंकि चुनाव लोकमत की अभिव्यक्ति के साधन हैं और इस पर आई हुई आंच लोकतंत्र के प्रति लोगों की आस्था को खण्डित कर देगी। पर ये नहीं चलेगा कि जहां हम जीतें वहां ठीक और जहां हारें वहां EVM गड़बड़। बाकी जगह यदि टेक्नोलॉजी को हाथोंहाथ लेने की होड़ है तो फ़िर चुनाव के मामले में बैलटपेपर के प्रति इतना आग्रह क्यों? आखिर यह प्रतिगामी रवैय्या क्यों ? यह तो ट्रेन के युग मे बैलगाड़ी से चलने वाली बात हुई

राजीव गांधी तकनीकी प्रगति के पक्षधर थे और अब उन्ही की पार्टी के नेता EVMके बजाय बैलेट पेपर से चुनाव करवाने का राग अलाप रहे है.अब इसे क्या कहें, प्रतिगामी मानसिकता या फिर सुविधावादी राजनीति की पक्षधरता। अपनी हार की असली वजहों को जानने के बजाय EVM में हार को तलाश करना दर्शाता है कि कांग्रेस अभी भी सकारात्मक राजनीति की इच्छुक नहीं है।
कांग्रेस को अपने ही दल के उन नेताओं पर गौर करना चाहिए जो दिग्भ्रमित पार्टी को सही दिशा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, अन्यथा पार्टी को अपने इतिहास पर गर्व करते-करते खुद ही इतिहास की विषयवस्तु बनते देर नही लगेगी!

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