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कहां गया गूलर का पेड़

Posted On: 26 Jun, 2012 Others में

जिंदगीसबसे जुड़ी, फिर भी कुछ अलग

Dr. Sanjiv Mishra, Jagran

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यह सच है गूलर के उस पेड़ के नीचे खड़े होकर तमाम बार मीठे गूलर खाए थे मैंने। सामने तालाब में बरगद की डाल से कूदते साथियों को देखने के साथ छपाक की आवाज भी तो सुनी थी। पर उस दिन, वहां न तो गूलर का पेड़ दिखा, न तालाब में पानी कि छपाक सुन सकूं। था तो बस इतना कि मैं अपने साथ गयी युवाओं की उस उत्साही टीम को उस गूलर के पेड़ और तालाब के बारे में बता पा रहा था। उन्हें बताने के साथ ही तमाम पुरानी स्मृतियों से भी जुड़ता चला गया। घर के पिछवाड़े के उस मोहल्ले में मेरा ही नहीं पूरे गांव का जाना आना कुछ ज्यादा ही होता था। वहां गांव का अकेला मिठउवा कुआं जो था। मिठउआ मतलब, जिसका पानी मीठा था। वह मिठास कहीं न कहीं उस मोहल्ले को विशिष्टता के भाव से जोड़ती थी। इसीलिए तो स्कूल जाते समय कुएं के सामने रहने वाले बड़े लल्ला पानी हमाए कुआं मां लेन अइहौ जैसी बातें कर हमें चिढ़ाते थे। पर बड़े लल्ला भी तो उस गूलर को नहीं बचा सके।
और आज, जब इन युवाओं ने ग्राम्य मंथन कर कुछ अलग करने की बात कही तो मुझे याद आ गया वो गूलर, वो तालाब और वो छपाक। यूथ एलायंस की पहल पर देश-दुनिया से इकट्ठा ये युवा गांव पहुंचे तो गंगादीन नेवादा ही नहीं, तिश्ती व पलिया के लोग भी खासे चौंके थे। उन्हें लग रहा था कि ये सब बस यूं ही आए होंगे। पर यह क्या बस सात दिन बीते और इन युवाओं ने उनके सामने समाधान रख दिये। चेन्नई के आसपास तमाम गांवों में क्रांति का बीज बोने वाले रामास्वामी इलैंगो से बात कर तो मैं भी खासा उत्साहित हुआ। उन्हें अपने मिठउआ कुएं का पानी पिलाया तो बोले, पता है…एक छोटी सी किट से बच्चा भी पानी की गुणवत्ता समझ सकता है। मेरे मन में उम्मीदें जगीं, अब हम कुछ और भी कर सकेंगे, ताकि स्कूल जाते समय अब कोई और बड़े लल्ला अपने मिठउआ कुएं का ताना न मार सके। पलिया में मास्साब भी उतने ही उत्साहित हुए। मैंने पहली बार उन्हें अंग्रेजी बोलते और समझते देखा था। मैं भी तो वर्षों बाद पहुंचा था उनके पास। पलिया की टीम खासी उत्साहित भी थी। गांव वालों की आंखों में उम्मीद की हर रोशनी उनके उत्साह को बढ़ा रही थी। तिश्ती भले ही बड़ा गांव था किन्तु युवाओं की टोलियों ने गांव वालों को मोह सा लिया था। उनके मन में किताबों के सपने जगे और वे हर हाल में कुछ और अधिक पढ़ने का संकल्प लेते नजर आए। सभी गांवों में इन युवक-युवतियों से जुड़ाव का जोश देखते ही बन रहा था। तमाम बातों और समाधानों के साथ युवक-युवतियों में उन्हें अपना स्वर्णिम भविष्य जो दिख रहा था। सच में आग दोनों तरफ लगी है। गांव वाले कुछ पाने को उत्सुक हैं और ये युवा कुछ कर गुजरना चाहते हैं। सबने लौट कर गांव आने का वादा भी किया है। तो क्या फिर मैं चख सकूंगा गूलर के कुछ पके-मीठे फल। क्या मेरी तलैया में फिर होगा पानी। क्या लबालब भरे तालाब में फिर होगी छपाक सी आवाज।
मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं… इस उम्मीद के साथ कि हमने बदलाव का सारथी बनने की जो शपथ ली है, उसे पूरा करेंगे और बदल देंगे… पहले ये तीन गांव, फिर पूरा देश।

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