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"काश ये चुनाव हर साल होते "

Posted On: 9 Apr, 2016 Politics में

भावों को शब्द रूप

satyavrat shukla

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“काश ये चुनाव हर साल होते ” जब मैं ये कह रहा हूँ तो बहुत से अर्थशास्त्री मेरी बुद्धिमत्ता पर प्रश्नचिन्ह लगा देंगे| शायद वो सही भी हो लेकिन हमको तो वो अर्थ शास्त्र  ही समझ  आता  है जो गरीब को रोटी और संतुष्टि दे सके |
बड़ी बड़ी और  सुविधाओं से परिपूर्ण गाड़ियों से चलने वाले सफेदपोश, पैसे की राजनीती करने वाले तथाकथित समाज सेवक ५ साल के लिए होने वाले चुनावों में जनता के बीच सिर्फ चुनाव के कुछ दिन पहले ही नज़र आते हैं |
गरीब , पिछड़े शोषित वर्ग को आज के  अम्बेडकर, लोहिया और जेपी तभी नजर आते हैं जब चुनाव आने वाले हों| चुनाव का मौसम सावन का मौसम है सब कुछ हरा भरा नजर आता है | गाँव के भुल्लू की लड़की की शादी हो या मुरली के लड़के का विद्यालय या महाविद्यालय में दाखिला सब कुछ हो ही जाता है, अगर उसको अपने मतदाता होने का मतलब समझ आचुका है तो |
शहरों में मजदूरी करने वाला या रिक्शा चलाने वाला जब शाम को नेता जी के चुनाव कार्यालय से खाने को पा जाता है तो उसकी मेहनत की कमाई उसके गैर चुनावी मौसम में पेट भरने के काम आजाती है |
आज कल टी शर्ट का ज़माना है अपने प्रचार के  लिए बहुत से नेता वो भी बाट देते हैं इसतरह से तन भी ढक जाता है रैली में भीड़ बढाने में सहयोग करने वालों और गरीब मतदाता का |
सरला की अम्मा जो रोज एक ही साडी पहन के लोगों के घर काम करने जाती थी चुनाव के मौसम में नेता जी के नुक्कड़ सभा में उपस्थित होकर दूसरी साडी पा जाये तो गलत क्या है | बच्चों का पेट भरने और पढ़ाई की व्यवस्था करने  के साथ साथ उसका मन भी तो करता ही होगा अपनी कुछ स्वाभाविक सी महिलाओं वाली इक्षाओं की पूर्ती का |
वर्षों की ठेकेदारी और जमाखोरी करके कमाए गए रुपये को आखिर कभी तो खुली हवा में आने का मौका मिलना ही चाहिए | दानवीर कर्ण की दानवीरता को चुनौती देने का मौका तो समाज के नेताओं को जल्दी जल्दी मिलना ही चाहिए |
लोकतंत्र का पर्व “चुनाव” ही ऐसा पर्व है जो अमीरों से ज्यादा गरीबों को ख़ुशी देता है , भविष्य उज्जवल होने की उम्मीद देता है | इस पर्व को सभी को हर्षोल्लास और जिम्मेदारी से मनाना चाहिए और अपने साथ साथ देश की उन्नति के लिए अल्प कालिक सुख सुविधाओं का उपभोग करते हुए सही व्यक्ति का चुनाव करना चाहिए जो उनके भविष्य को सुरक्षित और सुख सुविधा युक्त कर सके |

“काश ये चुनाव हर साल होते ” जब मैं ये कह रहा हूँ तो बहुत से अर्थशास्त्री मेरी बुद्धिमत्ता पर प्रश्नचिन्ह लगा देंगे| शायद वो सही भी हो लेकिन हमको तो वो अर्थ शास्त्र ही समझ आता है जो गरीब को रोटी और संतुष्टि दे सके |
बड़ी बड़ी और सुविधाओं से परिपूर्ण गाड़ियों से चलने वाले सफेदपोश, पैसे की राजनीती करने वाले तथाकथित समाज सेवक ५ साल के लिए होने वाले चुनावों में जनता के बीच सिर्फ चुनाव के कुछ दिन पहले ही नज़र आते हैं |
गरीब , पिछड़े शोषित वर्ग को आज के अम्बेडकर, लोहिया और जेपी तभी नजर आते हैं जब चुनाव आने वाले हों| चुनाव का मौसम सावन का मौसम है सब कुछ हरा भरा नजर आता है | गाँव के भुल्लू की लड़की की शादी हो या मुरली के लड़के का विद्यालय या महाविद्यालय में दाखिला सब कुछ हो ही जाता है, अगर उसको अपने मतदाता होने का मतलब समझ आचुका है तो |
शहरों में मजदूरी करने वाला या रिक्शा चलाने वाला जब शाम को नेता जी के चुनाव कार्यालय से खाने को पा जाता है तो उसकी मेहनत की कमाई उसके गैर चुनावी मौसम में पेट भरने के काम आजाती है |
आज कल टी शर्ट का ज़माना है अपने प्रचार के लिए बहुत से नेता वो भी बाट देते हैं इसतरह से तन भी ढक जाता है रैली में भीड़ बढाने में सहयोग करने वालों और गरीब मतदाता का |
सरला की अम्मा जो रोज एक ही साडी पहन के लोगों के घर काम करने जाती थी चुनाव के मौसम में नेता जी के नुक्कड़ सभा में उपस्थित होकर दूसरी साडी पा जाये तो गलत क्या है | बच्चों का पेट भरने और पढ़ाई की व्यवस्था करने के साथ साथ उसका मन भी तो करता ही होगा अपनी कुछ स्वाभाविक सी महिलाओं वाली इक्षाओं की पूर्ती का |
वर्षों की ठेकेदारी और जमाखोरी करके कमाए गए रुपये को आखिर कभी तो खुली हवा में आने का मौका मिलना ही चाहिए | दानवीर कर्ण की दानवीरता को चुनौती देने का मौका तो समाज के नेताओं को जल्दी जल्दी मिलना ही चाहिए |
लोकतंत्र का पर्व “चुनाव” ही ऐसा पर्व है जो अमीरों से ज्यादा गरीबों को ख़ुशी देता है , भविष्य उज्जवल होने की उम्मीद देता है | इस पर्व को सभी को हर्षोल्लास और जिम्मेदारी से मनाना चाहिए और अपने साथ साथ देश की उन्नति के लिए अल्प कालिक सुख सुविधाओं का उपभोग करते हुए सही व्यक्ति का चुनाव करना चाहिए जो उनके भविष्य को सुरक्षित और सुख सुविधा युक्त कर सके |

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