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रोकना होगा हमें नैतिक मुल्यों के पतन को

Posted On: 29 Dec, 2015 Others में

saurabh dohare v

रोकना होगा हमें नैतिक मुल्यों के पतन को

बॉक्स….. ब्याज पर आधारित पूंजीवाद ने सभी नैतिक मूल्यों को रौंदते हुए अवसरवाद और शोषण के कल्चर को बढ़ावा दिया है। उपभोक्तावाद और ब्याज के माध्यम से धन बढ़ाते जाने की होड़ ग़रीब मनुष्य के कमज़ोर शरीर से ख़ून की आख़िरी बूंद तक निचोड़ लेना चाहती है। वंचितों की संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि हो रही है………..

समाज-निर्माण के बहुत से क्षेत्र हैं। वे अलग-थलग नहीं बल्कि एक-दूसरे से संलग्न और संबंधित हैं। उनमें आध्यात्मिक क्षेत्र, नैतिक क्षेत्र, सामाजिक क्षेत्र के महत्व के अनुकूल कुछ बयाँ करने की कोशिश की है l आज मानव समाज अनैतिकता में आकंठ तक डूबा हुआ है तथा काम, क्रोध, मद. मोह लोभ, अहंकार सहित अनेकानेक बुराइयों में संलिप्त होकर आसुरी बिपत्तियों का साधक बन गया है। देश की बर्तमान स्थिति को देखकर चिंता, पीड़ा और अंतर्वेदना होती है. प्राचीन युग में लोगों का बिस्वास था की सर्वव्यापी, अंतर्यामी परमात्मा सदा-सर्वदा सर्वत्र विद्यमान है। तथा हमारे प्रत्येक अच्छे-बुरे समस्त कार्यों को परिभाषित करता रहता है। हम एकांत में भी यदि कोई पाप करते है अथवा मन में पाप भावना रखते है तो वह भी परमात्मा को दृष्टिगोचर होता रहता है। फलस्वरूप परमात्मा द्वारा दिए जाने वाले कठोर दंड के भय से लोग बुरा कर्म करने से डरते थे l समाज में रहने वाला हर प्राणी फिर चाहें वो किसी भी जाति या किसी भी धर्म का ही क्यूँ न हो उसकी ईश्वरीय शक्ति के प्रति आस्था अवश्य होती है ठीक उस छोटे बच्चे की तरह जो अपनी माँ की छत्रछाया में पलता है उसको लगता है कि माँ मेरे हर कष्ट को दूर करेगी l समाज का हर प्राणी उस ईश्वरीय शक्ति से डरता है कहते हैं कि ईश्वर हमारे मन की श्रधा है, हमारे मन का विस्वास है ईश्वर हमें इस दुनियां में भेजता है दींन दुखियों की सेवा करने के लिए और साथ ही सौगात में एक ऐसा परिवार देता है जिसमें पिता का प्यार, माँ का दुलार, बहिन का विस्वाश, भाई का एक मधुर रिश्ता समाया होता है ईश्वर हमें अपने जीवन में बालपन की उम्र से सिखाना शरू कराता है ईश्वर परिवार की उस भट्टी में हमें धीमे-धीमे तपन देकर निर्मल करता है जिसमें इर्ष्या, नफरत, झगड़ा, तेरा-मेरा जैसे सांसारिक स्वभाव पिघल कर मलिन हो जाते हैं, ताकि मनुष्य का स्वभाव इस भट्टी की तपन से निखर कर परिवार और समाज के प्रति प्रेमी स्वभाव का बन सके | ईश्वर ने मनुष्य के आत्मिक परिवार को शारीरिक परिवार के सम्बन्धों से इसलिए जोड़ा है जिससे मनुष्य परिवार के जरिये प्रेम से परिपूर्ण आत्मिक स्वभाव में ढलकर देश और दुनिया का कल्याण कर सके | मनुष्य को प्रेम के विपरीत अर्थ घृणा को त्याग कर ह्रदय में प्रेम और विस्वाश का वास कराना चाहिए. सच्चा प्रेम वही है जो कभी बढ़ता या घटता नहीं है। मान देनेवाले के प्रति राग नहीं होता, न ही अपमान करनेवाले के प्रति द्वेष होता है। ऐसे प्रेम से दुनिया निर्दोष दिखाई देती है। यह प्रेम मनुष्य के रूप में भगवान का अनुभव करवाता है | आज के आधुनिक युग में मनुष्य में न तो प्रेम है और न ही लगन, लेकिन सच तो ये है कि बिना प्रेम और लगन के किसी तरह का साहस भी पैदा नहीं होता मनुष्य ने अपनी मूर्खता और अज्ञानता के कारण, मुक्ति को बंधन बना लिया और स्वर्ग को नर्क बना लिया क्योंकि बदलते आधुनिकता के परिवेश में ढलकर मनुष्य एक अन्जानी और संस्कार रहित राह पर चलते-चलते न सत्य को पा पाया और न असत्य को छोड पाया और हम सभ्य मानव से दानव बन गये l
ये सत्य है कि मनुष्य ही क्या प्राणिमात्र के जीवन की सफलता उसके कर्मो पर निर्भर है l मनुष्य के संकल्प, साहस, ज्ञान तथा कर्म, मनुष्य के आचरण पर निर्भर करते हैं l जब तक व्यक्ति अपने आपको जाने ना, तब तक उसे अपनी क्षमता का आभास नहीं हो सकता l जो व्यक्ति स्वयं की शक्तियों को पहचान लेता है, उसे जीवन-दर्शन के तत्व का ज्ञान हो जाता है l अगर मनुष्य इन ज्ञानेन्द्रियों को मन के अधीन कर ले तो व्यक्ति का जीवन और इस देश का भविष्य सुधर जाएगा क्यूंकि मन के अधीन ज्ञानेंद्रियां होती हैं, और मन बुद्धि के, बुद्धि का आत्मा से संबंध होता है l  जो बुद्धि को संयमित रहने के लिए प्रेरित करती है l ये आत्मा ही परमात्मा का अंश होती है l
शास्त्रों के अनुसार– बुद्ध, महावीर स्वामी, कृष्ण, राम आदि l मानव शिशु के रूप में इस धरती पर जन्म लेकर बालक की भांति माँ की गोद में खेलकर, अपनी आत्मा को विकसित कर महात्मा और परमात्मा तक हो गए l जीवन- दर्शन का मूल तत्व कर्मो से विमुख होकर तपस्या करने को नहीं कहता, बल्कि अपने कर्तव्य-पालन को ही सर्वोपरि मानता है l आत्मा ईश्वर का अंश है, सर्वशक्तिमान है, और ईश्वर सर्वशक्तिमान है, सबके शरीर के अंदर विद्यमान है, तो उसका अंश, जीव शक्ति संपन्न क्यों न होगा l ईश्वर किसी को सबल या निर्बल होने का वरदान नहीं देता ! उसके लिए सभी एक समान हैं l ईश्वर ने सभी को अपना अंश (आत्मा) दी है, जो स्वत: शक्ति संपन्न है तो फिर क्यूँ नहीं हम सब इसका उपयोग सही कार्यों में नही करते l हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि ईश्वर केवल  हमारी मानसिक कल्पना है वह केवल हमारे ख्यालों में रहता है,
सत्य के धरातल से वह नदारत है। ईश्वर हमेशा ही विवादित विषय रहा है धार्मिक लोग ईश्वर को तर्क से परे रखे हुए हैं मानो तो पत्थर नहीं तो देव, लेकिन हमें अनैतिकता से विरक्ति के लिये ईश्वर कल्पना ही पर्याप्त है। हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या सामाजिक जीवन में बढ़ रही अनैतिकता और देशभक्ति की भावना का अभाव । सारी समस्याओं के मूल में यही है। नैतिकता से ही अच्छे इंसान, परिवार, समाज और राष्ट्र का निर्माण होता है। समाज में नैतिकता होगी तो उस समाज के अध्यापक, लेखक, चिंतक, डॉक्टर, इंजीनियर और यहां तक कि राजनेता भी नैतिकतावादी होंगे जो एक स्वस्थ्य समाज और राष्ट्र का निर्माण करेंगे। हमे अच्छे संस्कारों को अपनाना होगा। लोगों के अनैतिक बनने और समाज में अनैतिकता के वृद्धि के कारणों की खोज कर उसका निवारण करना होगा। देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां बदलनी होगी। क्यूंकि नैतिकता और आत्मानुशासन ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को समृद्धशाली और स्वाभिमानी बनाते हैं। इन तत्त्वों के बिना समाज और राष्ट्र का जीवन अधूरा है। लेकिन हम मनुष्य नेकी की जगह अहंकार में जीने के आदी हो गये हैं। दिन-रात अनैतिक कार्य करने के लिए अपने को झोंक दिया है। अनैतिकता आज हमारे जीवन में इस प्रकार से घुल-मिल गयी है- मानो हमारे जीवन के लिए संजीवनी हो। आज के आधुनिक मानव ने सबकुछ पाने के लिए अपनी नैतिकता और देश की जनभावना, ईश्वरीय विश्वास को बली बेदी पर चढ़ा दिया है। अनैतिकता की सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढते हुए पूरी मनुष्यता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। आज का मनुष्य भौतिक समृद्धि के ऐसे ताने-बाने मन में बुनने लगता हैं कि उसमें लेश मात्रा भी नैतिकता के अंश नहीं होते। जिसे देखकर उसका बच्चा बड़ा होकर फिर उसी रास्ते चल पड़ता हैं। जिन्हें नैतिकता और आत्मानुशासन के पाठ पढ़ाने चाहिए वो स्वयं दिशा-भ्रमित होकर अनैतिक आचरण को अपने जीवन की सफलता मान बैठे हैं। ऐसे में मनुष्य की अपने परिवार के प्रति भूमिका ही सवालों के घेरे में है। और ऊपर से ये निजी कारपोरेटी कल्चर है जिसने ऊपर से नीचे की सारी व्यवस्था को अनैतिक बनाकर नष्ट-भ्रष्ट कर रखा है। टारगेट पूरा करने के बदले में जिस प्रकार से भी हो कम्पनी का कार्य सम्पन्न होना चाहिए। यही इनकी संस्कृति है जिसने हमारी नई पीढ़ी को एक साफ्टवेयर में तब्दील कर दिया है। साफ्टवेयर के कारण पेट को अन्न तो मिलने लगा है लेकिन आत्मा मार दी गयी है। और जिसमें आत्मा नहीं, उसमें फिर नैतिकता के भाव कैसे आयेंगे और कैसे टिके रहेंगे? आज हम एक विचित्र दौर से गुजर रहे हैं जब मूल्यों को एक विकृत स्वरूप दे दिया गया है आज मनुष्य स्वयं पर कम से कम बंधन चाहता है मनुष्य अपना जीवन अपनी मर्जी से अपनी शर्तों पर जीना चाहता है | व्यक्ति की आजादी ही आज आधुनिकता की परिभाषा भी बन गई है l आधुनिकता के चक्कर में आदमी ने अपनी परिभाषाओं को लचीला तो बना लिया लेकिन वो समझ न पाया। और परिणाम में इस तरह के हादसे होने लगे। समाज की मौलिक इकाई, ‘परिवार’ बिखर रहा है। रिश्तों का महत्व मिटता जा रहा है, पारिवारिक बंधन कमज़ोर हो रहे हैं, वृद्धाश्रम का कल्चर तेज़ी से पांव पसार रहा है l बूढ़े माता-पिता, जिनकी सेवा कभी सौभाग्य का प्रतीक थी, अब उनका अस्तित्व असह्य होता जा रहा है। संवेदनहीनता की हद तो यह है कि अब ममता जैसी भावना के लिए भी जगह नहीं रही। दुधमुंहे बच्चे के पालन-पोषण का दायित्व बाज़ार को सौंपा जा रहा है। विधवाओं के लिए भी अब परिवार में जगह नहीं, वे विधवा आश्रमों में शरण लेने को विवश हैं, जिनमें से कुछ में सुव्यवस्थित देह-व्यापार की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। नैतिक मूल्यों के ह्रास ने आज समाज को मानवता के स्तर से बहुत नीचे गिरा दिया है। भ्रष्टाचार, घपले-घोटाले, रिश्वत और क़ानूनहीनता मानव-जीवन के प्रत्येक विभाग में रच-बस गयी है। झूठ, धोखाधड़ी, मिलावट, कालाबाज़ारी आदि बुराइयों ने समाज में जो बिगाड़ पैदा किया है, मानवता उसके नीचे कराह रही है। आर्थिक स्तर पर आज चारों ओर लूट-खसोट मची हुई है, हमारे देश में इन्सानों की बड़ी तादाद ग़रीबी के गर्त में गिरती जा रही है। ब्याज पर आधारित पूंजीवाद ने सभी नैतिक मूल्यों को रौंदते हुए अवसरवाद और शोषण के कल्चर को बढ़ावा दिया है। उपभोक्तावाद और ब्याज के माध्यम से धन बढ़ाते जाने की होड़ ग़रीब मनुष्य के कमज़ोर शरीर से ख़ून की आख़िरी बूंद तक निचोड़ लेना चाहती है। वंचितों की संख्या में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि हो रही है.
गंभीरता और निष्ठा के साथ ग़ौर करने से यह विश्वास करने के सिवाय कोई और विकल्प नहीं रह जाता कि समाज को क्षति, आघात व टूट-फूट से बचाने और मज़बूत बुनियादों पर समाज का निर्माण करने के लिए हमें कम उम्र से ही बच्चों को नैतिक शिक्षा देनी शुरू कर देनी चाहिए | माता-पिता को चाहिए कि वो अपने बच्चों से लगातार इस विषय पर बातें करते रहे | उसे उसकी व्यक्तिगत आजादी तो दे पर साथ ही साथ उसे उसकी आजादी की सीमा भी बताए | समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारियों का उन्हें अहसास कराए | विद्यालयों की भूमिका ऐसे में और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है | बच्चें अपना लंबा समय विद्यालयों में बिताते हैं | उन्हें विद्यालयों में नैतिक शिक्षा देनी जरूरी है | शिक्षक को चाहिए को वह विद्यार्थिओं को प्रतिदिन परिवार, समाज और देश के प्रति उनकी जिम्मेदारियों को बताता रहे | उन्हें समझाए कि एक व्यक्ति के रूप में संविधान ने उन्हें पूरी आजादी दी है किंतु वे सामाजिक उत्तरदायित्वों से बंधे हैं | शिक्षकों द्वारा दी हुई नैतिक शिक्षा बच्चों के चरित्र को मजबूत बनाती है | ये कटू सत्य है कि आज राष्ट्र की आत्मा तड़प रही है नैतिक मानव के लिए।  नैतिक मूल्यों का विस्तार व्यक्ति से विश्व तक, जीवन के सभी क्षेत्रों में होता है. व्यक्तिपरिवार, समुदाय, समाज, राष्ट्र से मानवता तक नैतिक मूल्यों की यात्रा होती है. नैतिक मूल्यों के महत्त्व को व्यक्ति समाज राष्ट्र व विश्व की दृष्टियों से देखा समझा जा सकता है ऐसे हालातों में समाज के जिम्मेदार नागरिकों का उत्तरदायित्व बढ़ जाता है |

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