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सादगी और सरलता का गहना है पूज्य महामंडलेशवर योगी यतींद्रानंद गिरी जी महाराज

Posted On: 4 Apr, 2015 Others में

यतीन्द्रनाथ गुरु जी महाराज

सादगी और सरलता का गहना है पूज्य महामंडलेशवर योगी यतींद्रानंद गिरी जी महाराज

saurabh doharee

स्वामी जी कहते हैं कि आज भारत मे वायरस के रूप मे एक नई प्रजाति पैदा हो गई है और ये दुनिया में केवल भारत मे ही है। इस प्रजाति का नाम है सेकुलर। हर कोई सेकुलर रोग से पीडित होता जा रहा है, इसको जाति, पंथ, सम्प्रदाय की बात करने पर गौरव होता है। हिन्दु सभ्यता, संस्कृति की बात करने से इसको तत्काल एलर्जी होती है। आज भारत को इसी सेकुलर नाम के वायरस से खतरा उत्पन्न हो गया है।…… शुरूआत अच्छी होती है तो हर बात अच्छी होती है, इसलिए एक नये दिन की शुरुआत आज मैं श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा के पूज्य महामंडलेशवर योगी यतींद्रानंद गिरी जी महाराज के नाम के साथ कर रहा हूं। किसी को भी इनके दर्शनों का सौभाग्य पाकर जो सुख की अनुभूति होती है, वह शब्दों में बयान नहीं की जा सकती। भगवान की मुझ पर अपार कृपा है जो मुझे इनके दर्शनों का, इनसे कण भर भी कुछ सीखने का अवसर मिला। श्री यतींद्रानंद जी महाराज का यहां रूड़की में नंद विहार में जीवन दीप आश्रम है जिसने एक जंगल को भी मंगल में तब्दील कर दिया है। आश्रम में लड़कियों की शिक्षा के लिए जोर-शोर से एक कालेज का निर्माण किया जा रहा है, जो हर दृष्टि से सराहनीय है। इसके अलावा हरिपुर कला, हरिद्वार और विकास नगर लखनऊ में भी योगी यतींद्रानंद जी महाराज के आश्रम हैं, जहां इंसान को सही मायने में इंसान बनने की दिशा में प्रेरित किया जाता है। वैसे तो सादगी और सरलता संतो का गहना होता है मगर जिस तरीके से श्री यतींद्रानंद जी महाराज इस गहने को आम जन मानस की भलाई के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, वह सभी के लिए अनुकरणीय है । बड़ी से बड़ी बात को भी बेहद ही सरल ढंग से प्रस्तुत कर देने की कला यतींद्रानंद जी महाराज पर ईश्वर की कृपा के साक्षात दर्शन कराती है। किसी गहरी समस्या के समाधान को बताने के बाद जो योगी यतींद्रा नंद जी के चेहरे पर मुस्कान आती है, उसे देखकर अपनी परेशानी के साथ आए शख्स के भीतर तक की पीड़ा का मानो हरण हो जाता है। जनकल्याण को समर्पित श्री यतींद्रानंद जी का इतनी भयंकर सर्दी में भी जनकल्याण के लिए हमेशा यात्रा पर रहना किसी को भी एक नयी संजीवनी दे सकता है। स्वामी जी जीवन का सार बताते हुए हिन्दू धर्म के विषय में जो व्याख्या देते हैं, वह निश्चित ही मन को गहरे तक छू लेने वाली होती है। वो कहते हैं कि जो सत्य है वह धर्म है और जो सदैव है अर्थात भूत, वर्तमान, भविष्य और तीनो काल से भी परे है वही सत्य है। महामंडलेश्वर श्रीपंच दशनाम जूना अखाडा, रुड़की, हरिद्वार के स्वामी योगी यतींद्रानंद गिरी जी महाराज कहते हैं कि भारत में जो सनातन हिंदू परंपरा है उसे अनादि-आदि काल से संतो ने सम्मान दिया है। साईं बाबा भी एक संत फकीर थे। ऐसे में उनको भी सम्मान देना हमारी परंपरा है। उन्होंने कहा कि सम्मान देने का मतलब ये नहीं होता कि किसी व्यक्ति का मंदिर बना दिया जाए। अब दुर्भाग्य ये है कि कुछ लोग मंदिर बनाना ही ज्यादा उचित और सम्मान जनक समझते हैं। इस बारे में सनातनधर्म की एक बड़ी सभा होनी चाहिए और उसमें सही निर्णय होना चाहिए। स्वामी जी के द्वारा कही हुई ये पंक्तिया सच्चाई के प्रति गहरा अर्थ प्रदर्शित करती है इसे जिसने समझ लिया उसने जिन्दगी का सार समझ लिया स्वामी जी कहते हैं कि ”एक दिन इन्सान ने भगवान से पूछा कि मेरे प्रेम और आपके प्रेम में क्या अंतर है? तो भगवान ने उत्तर दिया, पंछी हवा में उड़े वो मेरा प्रेम और पिंजरे में हो तो वो तेरा प्रेम।“ बहुत खूब सच को बयाँ किया है। यों तो सभी लोग इस नश्वर जगत में पैदा होते हैं, जीते हैं, और अन्त में मर जाते हैं, पर उन्हीं का जीना और मरना सार्थक मालूम होता है, जो देश, जाति और धर्म के लिए जीते और मरते हैं। वास्तव में ऐसे ही मनुष्य सच्चे वीर हैं और वे ही अमृत पीकर इस संसार में आते हैं, क्योंकि उनका अन्त हो जाने पर भी उनकी अमर कीर्ति, उनकी शहादत, जाति कभी नहीं भुलाती। वे अपना खून देकर जातीय वृक्ष की जड़ ऐसी सींच जाते हैं कि उसका कभी विनाश नहीं होता। वे स्वयं मरकर जाति को अमर कर जाते हैं। स्वामी जी वीरात्मा शहीदों में बालक हकीकत राय के साथ हुई एक सत्य घटना सुनाते हैं। आप भी पढि़ए कि …. वीरात्मा शहीदों में बालक हकीकत राय का भी नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। इस वीर बालक ने अपनी जान धर्म के लिए कुर्बान कर दी, पर धर्म हाथ से न जाने दिया। यह क्षत्रिय कुलभूषण सम्वत् विक्रमी 1790 में वागमल वंश में माता कौराल से जन्मा था। इस वीर बालक ने बाल्यकाल से ही धार्मिक शिक्षा खूब पायी थी। ग्यारह वर्ष की आयु में वह फारसी पढ़ने के लिए एक मौलवी के यहां गया। जब जिस जाति का राज्य होता है, तब वह जाति अपने धार्मिक सिद्धान्तों को ही सर्वोत्तम समझती है। उस समय इस अभागे देश भारत में गोभक्षी मुसलमानों का शासन था, जो अपने इस्लाम मत को ही सबसे अच्छा और मुक्तिदाता समझते थे। निरीह शान्तिप्रिय हिन्दू लोग जबर्दस्ती तलवार के बल से मुसलमान बनाये जाते थे और जो मुसलमान नहीं बनते थे, वे बड़ी ही निर्दयता के साथ मार डाले जाते थे। मुसलमान बनने वालों के लिए बड़े-बड़े प्रलोभन थे कि मरने के बाद बिहिश्त में हूर और गुलाम लोग आनन्द भोग के लिए मिलेंगे। इसके अतिरिक्त यह भी कि मुसलमान होने पर अच्छी-अच्छी सरकारी नौकरियां मिलेंगी। इन प्रलोभनों में भी जो हिन्दू नहीं फंसते, वे फिर मार डाले जाते थे। वीर बालक हकीकत राय के सामने भी यही समस्या उपस्थित थी। एक दिन मुसलमान बालकों से कुछ ऐसा ही मजहबी विवाद छिड़ गया, जिसमें उसे श्रीरामचन्द्रजी और श्रीकृष्ण जी का अपमान सुनना पड़ा। श्रीराम और श्रीकृष्ण के परमभक्त वीरवर हकीकत राय से वह निन्दा न सुनी गई और उसने भी साहसपूर्वक मुसलमानों को वैसा ही उत्तर दिया। उसी समय कई क्रूर मुल्ला लोग भी वहां आ गये। हकीकत राय के मुख से इस्लाम की निन्दा सुनकर वे बड़े क्रुद्ध हुए, यहां तक कि उसकी जान लेने के लिए उतारू हो गए। उस समय के न्यायाधीश (काजी) के सामने हकीकत राय का मामला पेश हुआ। काजी ने मौलवियों से परामर्श करके कहा कि ”इस लड़के हकीकत राय ने रसूल और कुरान की तौहीन की है, इसलिए अगर यह अपनी भूल के लिए पश्चाताप करके दीन इस्लाम कबूल कर ले, तो इसे माफी दी जा सकती है, नहीं तो शरीअत के मुताबिक इसके प्राण लिये जायेंगे।“ यह मामला सियालकोट में हुआ था। हकीकत राय ने अविचलित धैर्य से वह दण्ड-आज्ञा सुनी, पर उसके माथे पर शिकन तक नहीं पड़ी। उस समय उस वीर बालक की माता वहां रोती हुई पहुंची और उसे बहुत समझाया कि-हाय बेटा ! क्या तुझे इसी दिन के लिए पैदा किया था, कि तू कत्ल किया जाये? अरे बेटा ! तू माफी मांग ले और मुसलमान होकर ही जीवित रह जिससे मैं कभी-कभी तुझे देखकर अपनी आंखें तो ठंडी कर लूंगी। पर वह वीर बालक अमरत्व का बीज अपनी आत्मा में धारण किए हुए मृत्यु का प्याला पीने को तैयार था। उसने निर्भीकतापूर्वक कहा- अरी माता! मैं धर्म क्षेत्र में खड़ा हुआ। धर्म की उपासना ही सदा करता रहा हूं। तूने ही मुझे प्राचीन पवित्र ऋषियों-मुनियों की गाथाएं सुनाकर धर्म के लिए तैयार किया था। अब मैं उस पवित्र धर्म के मार्ग से कदापि विचलित न होऊंगा। मैं इस्लाम कदापि स्वीकार न करूंगा। धर्म के लिए एक प्राण क्या यदि ऐसे हजारों प्राण भी मुझे बलि चढ़ाने पड़ें, तो भी मैं खुशी से उसके लिए तैयार रहूंगा। इसके बाद मामला लाहौर के नवाब के सामने आया। नवाब ने हकीकत राय को बड़े-बड़े प्रलोभन दिए। हूर और गिलमा का दृश्य दिखाया, फिर तलवार का भय भी दिखाया, पर उस धीर-वीर-गंभीर बालक ने अपना व्रत न बदला। नवाब, काजी और मुल्ला सबने ही इस्लाम और कुरान के बड़े गुण-गान किये, पर वह बालक घृणा के साथ उनका उपहास करता रहा। माता ने बालक को बहुत समझाया, पर उस हठीले बालक ने एक न सुनी। वह मुसलमानों और मुल्लाओं को अपना गला दिखाता और कहता कि ”जल्दी इसे काट लो, जिसमें तुम्हारा दीन इस्लाम अधूरा न रह जाए।“ माता के साथ बालक के सम्बंधी और हिन्दू लोग सभी रो रहे थे, पर वीर हकीकत राय प्रसन्नचित्त खड़ा होकर जल्लाद के वार की प्रतीक्षा कर रहा था। अन्त में वह दुखदायी घड़ी भी आई, जब साक्षात् राक्षस की तरह भयानक जल्लाद अपनी तलवार उस बालक की कोमल गर्दन पर तौलने लगा। एक ही बार में उसका सिर कटकर गिर गया। सब तरफ त्राहि-त्राहि मच गई। उस निरपराध, अबोध बालक हकीकत राय को मारकर कट्टरवादियों ने अपने शासन का जनाजा तैयार करने में एक और कील ठोंकी। ”वाहे गुरु की फतह“ कहता हुआ, बालक हकीकत राय अपने धर्म पर कुर्बान हो गया। मुसलमानों का अत्याचारी शासन भी अब न रहा, और न उनकी इस्लामी शरीअत अब किसी अदालत में मानी जाती है, पर धर्म के लिए बलिदान होने वाले हकीकत राय का नाम अब तक विद्यमान है, और जब तक इस पृथ्वी तल पर हिन्दू जाति जीवित है, तब तक उस राम-कृष्ण के प्यारे भक्त हकीकत राय का भी नाम अमर रहेगा। बलिदान होने वाली वीरात्माएं जितनी संयमी और दृढ़ निश्चयी होती हैं, उतनी ही वे शुद्ध और पवित्र भी होती हैं। संयम और दृढ़ निश्चय के बिना आत्मिक शुद्धता और निर्मल पवित्रता नहीं आ सकती। सच्ची साधना भी तभी हो सकती है, इसलिए विवेकी और ज्ञानी पुरुष आत्मा की शुद्धता के लिए सदा आग्रह करते हैं। वही शुद्ध आत्मा वाला पुरुष सफल बलिदान कर सकता है, जिसने कभी संयम किया हो। देश, जाति और धर्म की पूर्ण सफलता तभी सिद्ध होगी, जब सहस्रों लक्ष्य संयमी आत्माएं हंसते-हंसते बलिदान के लिए तैयार हों। शहादत का प्याला पीना सभी के भाग्य में बदा है, यदि सब संयमी और दृढ़ विचार वाले हों। स्वामी जी कहते हैं कि अपनी मानसिकता हमेशा सकारात्मक बनाएं रखें, क्योंकि ऐसी सोच असफलता के माहौल में भी हमारे लिए तरक्की की सीढ़ी साबित होती है। ऐसे में गलती होने पर भी हताशा नहीं होती और हम नये सिरे से सफलता प्राप्त करने के लिए जुट जाते हैं। स्वामी जी बड़े ही सरल स्वभाव से ऐसी-ऐसी बातें कह जाते हैं जो जीवन के लिए विशेष महत्व रखती हैं वो कहते हैं कि ”जीवन की गति अबाध है क्योंकि काल चलता रहता है और वह भी अपनी नियत गति से। हर पल हर क्षण ये जीवन यात्रा भी निरन्तर गतिशील है जब तक पूर्णता को प्राप्त न हो। हंा मध्य मे कोई रूक तो सकता नही, किन्तु आलस्य, अज्ञान अथवा मोहादि भवंरजाल मे उलझकर जीवन यात्रा मे जीव पिछड़ जरूर जाता है और जो पिछड़ गया उसको ये यात्रा पूर्ण करनी बड़ी कठिन हो जाती है। कुछ भी हो यात्रा तो सभी को पूर्ण करनी ही होगी जीवन गतिशील है जिस दिन ये जान लिया की आखिर ये जीवन क्यों मिला, बस उस दिन ही ये जीवन सार्थक हो जायेगा।“ स्वामी जी के शब्दों में कि ”भारत की पहचान मानव सभ्यता.संस्कृति के विकास, त्याग, समर्पण की भावना, अध्यात्म, ऋषियों मुनियो की त्पस्या व ज्ञान से है और इसी के साथ यज्ञ हमारी संस्कृति है जैसी भी व्यवस्था मिले यज्ञ प्रतिदिन करना चाहिये, क्योंकि यज्ञ मानव व दैव के मध्य मार्ग बनाता है और यही मार्ग आगे परमात्मा की और अग्रसर होता है।“ ”तुम्हारे अन्दर एक आवाज है, तुम सुन सकते हो अगर चाहो तो। बस मौन की गहरी शान्ति चाहिये तुम्हारे अन्दर। वो आवाज है उस परमात्मा की जिसकी तुमको युगो-युगो से तलाश है। आओ चले मेरे साथ मिलकर यात्रा करते है उस गहन अन्तर तक जहां वो प्रकास व आवाज है।“ ”मन जल के समान होता है जल का अपना कोई रंग, रूप, आकार नही होता जिस रंग मे डालो वैसा रंग। जिस बर्तन मे डालो वैसा आकार बन जाता है मन भी ठीक उसी प्रकार होता है जिस रंग, ढंग, संग मे मिले वैसा ही हो जाता है“ ”मुक्ति ज्ञान से होती है ज्ञान की उत्पत्ति भक्ति से है। भक्ति की प्राप्ति सत्संग से होती है सत्संग सन्तो के संग से मिलता है। और ”बिनु हरि कृपा मिलहि न संता“……..
सौरभ दोहरे
विशेष संवाददाता
इण्डियन हेल्पलाइन न्यूज़

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