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शकों की देन है मगध की छठपूजा!

Posted On: 4 Nov, 2013 Others में

smritiJust another weblog samay ki dhara me

saurabhkrishna

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आधुनिक बिहार में छठपूजा सर्वाधिक लोकप्रिय पर्व है,छठपूजा का पर्व सूर्य को समर्पित है,छठपूजा उन गिनेचुने पर्वों में है जिनका सम्बन्ध सूर्य से है..ऐसा माना जाता है कि भारत में सूर्य पूजा शकद्वीप(पूर्वी ईरान,बलोचिस्तान और सीस्तान का क्षेत्र ) के मागी पुरोहितो द्वारा आरम्भ हुयी,इसका वृतांत हमें महाभारत के भीष्मपर्व(अध्याय-११) में मिलता है जहाँ शकों के चार प्रकार मग,मशक,,मन्दग,मन्हास का उल्लेख है..भविष्य पुराण में भी शाकद्वीपी मागी पुरोहितो के सूर्य पूजा में सिद्धहस्त होने कि कहानी का वर्णन है..ऐसा कहा जाता है जब भगवान कृष्ण के अत्यंत रूपवान पुत्र साम्ब को कुष्ठरोग हो गया और कोई इलाज नहीं मिला तब साम्ब ने यादवों के मुखिया उग्रसेन के प्रधान सलाहकार गौरमुखी से मंत्रणा की, गौरमुखी ने उसको शक मागी पुरोहितों के बारे में बताया..जो जरशब्द(जरथ्रुस्त)के पूर्वज थे,साम्ब ने शाकद्वीप से इन मागी पुरोहितों को बुलाने का निश्चय किया और १८ परिवार जिसमे ८ मागी थे और १० परिवार मन्दग थे जो ज्योतिष ,आयुर्वेद,वास्तुकला,शिल्प और मूर्तिकला में माहिर थे,शाकद्वीप से आमंत्रित किये गए. भागवतपुराण में भी साम्ब और शाकद्वीपी मगो का यही वृतांत मिलता है.आज का मुल्तान(मूलस्थान) जो चेनाब (चंद्रभागा)नदी के पास स्थित है प्राचीन काल में सांबपुरा के नाम से विख्यात था,यहाँ साम्ब ने एक सूर्य मंदिर का निर्माण कराया…और मागी पुरोहितों के मार्गदर्शन में सूर्य कि आराधना कि जिससे उसका कुष्ठ ठीक हो गया,ये मागी शक पुरोहित न केवल भारत और ईरान में प्रसिद्द थे बल्कि अपने ज्योतिष,आयुर्वेद और गणित के ज्ञान के कारण अरब और यूनानी समाज में भी सम्मान कि दृष्टि से देखे जाते थे,ईसामसीह के जन्म कि भविष्यवाणी इन्ही मागी विद्वानों द्वारा कि गयी थी,रोमन-लैटिन शब्द मैजिक ,मेडिकल भी इन्ही मागी पुरोहितों से निकले है क्योंकि इनको अपने औषधीय और ज्योतिषीय ज्ञान कि वजह से जादूगर समझा जाता था……भारत में इन मागी पुरोहितों ने सूर्य पूजा का विस्तार किया ..राजवंश इन्हे बड़ी-२ जायदाद देकर अपने यहाँ बुलाते थे,जल्दी ही ये मागी पुरोहित पूरे उत्तर और पूर्वी भारत में छा गए,ब्राह्मणों में शाकद्वीपी ब्राह्मण जिन्हे सकलद्विपी और भोजक भी कहा जाता इन मागी विद्वानों के वंशज है…अंग देश में विस्तार के क्रम में इन्ही मागीयों के नाम से मगध नाम का अस्तित्व आया.गया के आसपास और बंगाल में शकलद्विपी ब्राह्मणों को ७२ पुरों का दान प्राप्त हुआ,ईसवी कि आरंभिक शताब्दियों में हम पूरे भारत में सूर्यमंदिरों के निर्माण में वृद्धि पाते हैं.गुजरात(सौर-राष्ट्र) में मोढेरा,मंदसौर(मालवा) और कोणार्क(कलिंग) के सूर्य मंदिर विशेष ख्याति प्राप्त है,इन सभी में भगवान सूर्य को शकों के सामान कोट और बूट पहने चित्रित किया गया है…स्थापत्य कला पर ईरानी छाप स्पष्ट दिखाई पड़ती है जो इस ईरानी सम्बन्ध को पुष्ट करती है.. शक क्षत्रपों के और राजपूत काल में सूर्य पूजा का प्रचलन और अधिक बढ़ा जिसमे शाकद्वीपी मागी पुरोहितों का विशेष योगदान है,उज्जैन के महान ज्योतिषी,ज्योतिर्विद और गणितज्ञ वराहमिहिर जो कि स्वयं मागी थे..उन्होंने बृहत् संहिता (६०-१९)में स्पष्ट निर्देशित किया है कि सूर्यप्रतिमा कि स्थापना केवल मागी पुरोहितों से ही करवाई जाये,आर्य भट्ट का सम्बन्ध भी इन्ही शाकद्वीपी मागियों से था.गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित कल्याण पत्रिका के २००४ के वार्षिक अंक में छठ पूजा और मगध के शाकद्वीपी मागी ब्राह्मणों के सम्बन्ध पर विस्तृत शोध प्रकाशित किया है.अगर छठपूजा के ज्योतिषीय स्वरूप को देखा जाये तो छठपूजा वर्ष में दो बार कार्तिक और चैत्र के माह में मनाई जाती है..जिसमे कार्तिक की छठपूजा का महत्व ज्यादा है,कार्तिक माह में सूर्य अपनी नीच राशि तुला में होते है,ज्योतिष में ये मान्यता है कि जब कोई गृह अपनी नीच राशि में होता है तो वो पूज्य होता है तभी वो अपने नीचत्व के दोष से मुक्ति दिला सकता है,इसी प्रकार चैत्र माह में सूर्य अपनी उच्च राशि मेष में होते हैं.सूर्य चूँकि पिता है ,ग्रहों के राजा हैं इस लिए उनकी कृपा सभी प्रकार के दोषो से मुक्ति दिलाती है.कुष्ठ रोग के निराकरण के लिए सूर्य पूजा का विशेष महत्व है,चंद्रभाग नाम कि एक नदी ओड़िसा में भी है ये माना जाता है साम्ब ने यहाँ भी तप किया था,आज भी कुष्ठ रोगी इस नदी में स्नान के लिए जुटते है..क्योंकि मान्यता है कि यहाँ स्नान से रोग से मुक्ति मिलती है…..इन सकलद्विपी मागी शाकद्वीपी पुरोहितों का योगदान ज्योतिष और औषधि के क्षेत्र में अनुपम है ..भारत में सूर्य आधारित पंचांग का प्रचलन और मूर्ति कला(गांधार शैली) व मंदिर निर्माण कि वास्तुकला को प्रचलित करने वाले यही मागी शाकद्वीपी हैं.वैदिक काल में मूर्ति पूजा का कोई स्थान नहीं था,कनिष्क जो कि शक शासक था उसके शासन काल में भगवान बुद्ध कि मूर्तियों और स्तूपों का बड़े पैमाने पर निर्माण हुआ जबकि सूर्य पूजा से सनातन धर्मियों में मूर्ति पूजा और मंदिर का प्रचलन बढ़ा…ईरानी सूर्य देव का एक नाम मंदिर स्वामी भी था(स्त्रोत -भारतीय उच्चायोग,तेहरान कि वेबसाइट),पहले देवालय शब्द ही मंदिर के लिए प्रयोग होता था,गुप्तकाल में भी मंदिर के लिए प्रसाद,देवस्थान,आयतन,देवालय शब्द का ही प्रयोग मिलता है ,मंदिर शब्द प्राचीन नहीं है…मंदिर शब्द का प्रचलन भी धीरे-२ सूर्य मंदिरों से ही हुआ है और देवस्थान के लिए अब सामान्य शब्द मंदिर ही है.इसे इन मागी शक पुरोहितों कि भारत को एक नायाब सांस्कृतिक देन कहा जा सकता है.भारत में अब तक ज्ञात सबसे प्राचीन मंदिर मुल्तान का सूर्य मंदिर है जिसका उल्लेख स्कैलेक्स जो कि एक यूनानी था उसे ईरानी सम्राट दरयवासु(दारा-प्रथम) ने सिंधु नदी के उद्गम का पता लगाने के लिए सिंध भेजा था उसने ५१९ ईसापूर्व में इस सूर्य मंदिर को देखा था इसका उल्लेख महान इतिहासकार स्ट्रैबो और हेरोडोटस ने भी किया है.यहाँ विशुद्ध सोने कि सूर्य प्रतिमा स्थापित थी,इसे मूर्ति पूजा और प्रतिमाविज्ञानं का पहला उदाहरण समझा जा सकता है…ये भी ईरानी शक प्रभाव है जो बहुत गहरे ढंग से हिन्दू धर्म से समायोजित हो गया है.

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