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योगशास्त्र एवं आध्यात्म – 6. कर्म भाव : मूर्ति पूजा, गंगा-स्नान का रहस्य !

Posted On: 9 Jul, 2010 Others में

Dharm & religion; Vigyan & Adhyatm; Astrology; Social researchDharm & Religion- both are not the same; Vigyan & Adhyatm - Both are the same.....

Er. D.K. Shrivastava Astrologer

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नोट का वजन भला कितना होगा ? उसे सुलगाये तो एक बूंद पानी शायद ही गरम हो | पर उस पर एक मोहर लगी रहती है | उसी से उसकी कीमत होती है | ….और यही है मूर्ति पूजा का रहस्य | मूर्ति पूजा की कल्पना में बड़ा सोंदर्य है | यह मूर्ति पहले एक टुकड़ा ही तो थी पत्थर की; मैंने इसमे प्राण डाला भावना का | कोई पत्थर के टुकड़े कर सकता है, भला इस भावना के कोई टुकड़े कर सकता है ? कल्पना कीजिये की दो ब्यक्ति गंगा स्नान करने गए हैं | उसमे से एक कहता है — लोग गंगा-गंगा कहते हैं, उसमे है क्या ? दो हिस्से हाइड्रोजन, एक हिस्सा ऑक्सीजन, ऐसे दो गैस एकत्र कर दिए तो हो गई गंगा | इससे अधिक उसमे क्या है ?…दूसरा कहता है – ” भगवान विष्णु के पद कमलो से निकली है यह, शंकर के जटा में इसने वास किया है, हजारो ऋषि-मुनियो ने इसके तीर पर तपस्या की है, अनंत पुन्य कृत्य इसके तट पर हुवे हैं…ऐसी यह पवित्र गंगा माई है | इस भावना से अभिभूत होकर वह नहाता है | वह ऑक्सीजन-हाइड्रोजन वाला भी नहाता है | अब देह शुद्यी रूपी फल दोनों को मिला ही | परन्तु उस भक्त को देह शुधि के साथ चित्त शुधि रूपी फल भी मिला | यो तो गंगा में बैल भी नहाये तो उसे देह शुधि प्राप्त होगी, शरीर की गन्दगी निकल जाएगी | परन्तु मन का मैल कैसे धुलेगा ?

स्नान करके सूर्य नमस्कार करने वालों को व्यायाम का फल मिलेगा ही | परन्तु वह आरोग्य के लिए नमस्कार नहीं करता, उपासना के लिए करता है, अतः उसे आरोग्य लाभ तो होता ही है, बुधि की प्रभा भी फैलती है | आरोग्य के साथ स्फूर्ति और प्रतिभा भी उसे सूर्य नमस्कार से मिलेगी | कर्म वही, परन्तु भावना भेद से फल मे अंतर पड़ जाता है |

बाहर से मैं शिव लिंग पर सतत जल धारा गिराते हुए अभिषेक करता हूँ, परन्तु इस जलधारा के साथ ही यदि मानसिक चिंतन की धारा भी अखंड न चलती हो तो उस अभिषेक की क्या कीमत ? फिर तो सामने का वह शिव लिंग भी पत्थर और मै भी पत्थर ! पत्थर के सामने पत्थर—फिर कोई अर्थ न होगा |

अतः कर्म के साथ मन का मेल जरुरी है | इस मन के मिलन को हो गीता ‘विकर्म’ कहती है |

तंत्र के साथ मन्त्र होना चाहिए—केवल वाह्य तंत्र का कोई महत्त्व नहीं |

एक पीठ है, माँ बच्चे के पीठ पर हाथ फेरती है; इस मामूली कर्म से उस माँ-बेटे के मन में जो भावनाएं उठी, उसका वर्णन कौन कर सकेगा | यदि कोई यह समीकरण बैठाने लगे कि इतनी लम्बी चौड़ी पीठ पर इतने वजन का एक मुलायम हाथ फिराइए तो इससे वह आनंद उत्पन्न होगा तो यह एक मजाक ही होगा | हाथ फिराने का वह नगण्य क्रिया…परन्तु उसमे माँ का ह्रदय उंडेला हुवा है, इसी से वह अपूर्व आनंद प्राप्त होता है |

तुलसी रामायण में एक प्रसंग है –

राम कृपा करि चितवा सबही |
भये विगत्स्त्रम बानर तबही ||

अर्थात लड़ाई में बन्दर जख्मी हो गए है | बदन से खून टपक रहा है किन्तु राम के एक बार प्रेमपूर्वक दृष्टिपात करने भर से उन बंदरो की वेदना मिट जाती है | अब कोई मनुष्य राम की उस समय आँख कितनी खुली थी, इसका फोटो लेकर किसी की ओर उसी प्रकार देखा होता तो क्या उसका वैसा प्रभाव पड़ा होता ? वैसा करना ही हास्यास्पद है | अतः कर्म के साथ विकर्म का जोड़ होना चाहिए तभी शक्ति-स्फोट होता है |

भक्त कहता है की इस छोटी सी शालग्राम की बटिया में अखिल ब्रह्माण्ड का स्वामी है, यह मानो | अब कोई कहे–यह क्या पागलपन है ! तो उससे कहो–” तुम्हारी यह ज्यामिति क्या पागलपन नहीं है ? रेखा की परिभाषा बताते हो – इसकी चौड़ाई, मोटाई नहीं होती — और सर्वथा स्पष्ट मोटी रेखा खींच के कहते हो इसे बिना चौड़ाई की मानो | यह कैसा पागलपन है ! खुर्दबीन से देखोगे तो वह आधी इंच चौड़ी दिखाई देगी | जैसे तुम अपनी भूमिति में मानते हो, वैसे ही भक्ति शास्त्र कहता है कि इस शालग्राम में परमेश्वर मानो | अब कोई यदि कहे कि परमेश्वर न टूटता है न फूटता है | तुम्हारा यह शालग्राम तो टूट जायेगा, लगाऊ एक चोट ?… तो यह समझदारी नही कही जाएगी क्योकि जब भूमिति में ‘मानो’ चलता है तो भक्तिशास्त्र में क्यों न चलना चाहिए | सारांश यह की सच्चा रेखा व्याख्या में ही रहता है परन्तु हमें उसे मानकर चलना पड़ता है | भक्तिशास्त्र में भी शालग्राम में न टूटने फूटने वाला सर्वव्यापी परमेश्वर मानना पड़ता है | अगर रेखा को परिभाषा के बिपरीत होने के कारण मानने से इंकार कर दोगे तो रेखागणित का अस्तित्व ही ख़त्म हो जायेगा | फिर रेखागणित रहेगा ही नहीं | इससे जुड़े हुए वे सारे विकाश पीछे हो जायेगे | इसी तरह से अगर पत्थर में भगवान् मानने से इंकार कर दोगे तो फिर भगवान की बात ही ख़त्म हो जाएगी, क्योकि उस विराट को उसके असली स्वरुप में समझने वाले विरले ही होगें| अतः विराट को जानने के लिए हम जैसे साधारण जीवों को स्थूल मूर्ति का सहारा लेना ही होगा |

कहते हो…मूर्ति पूजा बेकार है, क्या पत्थरों में भी भगवान है ? मै कहता हूँ… एक बच्चे को पहले ‘क’ सिखाया जाता है बड़ा लिखकर, फिर धीरे धीरे छोटा किया जाता है | पहले सरल अक्षर, फिर संयुक्ताक्षर सिखाया जाता है | पहले ‘क’ सीखोगे तब ‘कमल’ जानोगे | पहले मूर्ती में भगवान समझो, तब ही उसका व्यापक रूप समझ आएगा | अमृत का घड़ा हो या एक बूंद; गले के नीचे उतर गया तो उससे अमरत्व ही मिलेगा | जो दिव्यता, पवित्रता परमेश्वर के विराट स्वरुप में है, वही एक छोटी सी मूर्ति में भी है | …..तो इसे समझना होगा |

ईश्वर का जो छोटा नमूना मेरी आँखों के सामने है, उससे यदि ईश्वर को नहीं पहचान सका तो फिर विराट परमेश्वर को देखकर भी मै कैसे पहचानूँगा ? पहले छोटे को पहचाना, तब बड़े की भी पहचान हो जाएगी | जब छोटा ही न समझ पावो तो बड़े को क्या समझ पावोगे | पहले मूर्ति में भगवान मानो, पहले पत्थर में भगवान मानो…तब भगवान की पहचान हो जाएगी |

तो मै कहता हूँ कि स्थूल को न देखो, सूक्ष्म को देखो, भावना को देखो |

एक बार मै पटना जा रहा था | गंगा के पुल पर बस आई | पास बैठे एक आदमी ने बड़े पुलकित ह्रदय से उसमे एक चवन्नी डाल दिया | पड़ोस में एक आलोचक महाशय बैठे थें; कहने लगे…”पहले ही देश कंगाल है और ये लोग यों व्यर्थ पैसा फेंकते हैं | मैंने कहा—“आपने उसके हेतु को पहचाना नहीं | मै मानता हूँ कि दुसरे सत्कार के लिए उसने यदि पैसे दिए होते तो और भी अच्छा होता | किन्तु यह बाद में | जिस भावना से उसने पैसा फेंका – समझ पाएंगे आप | उसने तो इसी भावना से यह त्याग किया है कि यह नदी यानि ईश्वर की करुणा ही बह रही है | इस भावना के लिए आपके अर्थशास्त्र में कोई स्थान है क्या ? देश की महान नदी को देखकर यदि यह भावना मन में जगती है कि अपनी सारी संपति इसमें डुबो दूँ, इसके चरणों में अर्पण कर दूँ तो कितनी बड़ी देशभक्ति है यह ! देशभक्ति का अर्थ क्या केवल रोटी है ? वह सारी धन-दौलत, ये मोती, ये मूंगा…इन सबकी कीमत पानी में डुबो देने लायक ही है | परमेश्वर की चरणों के आगे यह सारी धुलतुच्छ समझो | आप कहेंगे, नदी का और परमेश्वर के चरणों का क्या सम्बन्ध ! नदी है आक्सीजन और हाइड्रोजन | उसे नमस्कार क्या करे !…तो क्या नमस्कार करना होगा सिर्फ आपकी रोटी को | फिर भला रोटी में क्या है ? वह भी तो आखिर मिटटी ही है | उसके लिए क्यों इतनी लार टपकते हो ! इतना बड़ा सूर्य उगा है, ऐसी सुन्दर नदी बह रही है, इसमें यदि परमेश्वर का अनुभव न होगा तो फिर कहा होगा |

लेकिन आज तो हमारे जीवन में उत्साह है ही कहाँ ? हम जी रहे हैं क्योकि मरते नही |….तो फिर परमेश्वर का अनुभव कैसे होगा | कलाहीन रोता जीवन….. ! परन्तु एक बार यह सोच कर तो देखो कि सारी चीझे ईश्वर से जुडी है | यह मत कहो कि राम कहने से क्या होता है, जरा कह कर तो देखो ! कल्पना करो, संध्या समय कोई किसान काम कर के घर लौट रहा है | रास्तें में कोई यात्री मिल जाता है | वह उससे कहता है—हे पदयात्री नारायण, जरा ठहरो | अब रात हो गयी | भगवन, मेरे घर चलो | उस किसान के मूंह से ऐसे शब्द निकलने तो दो, फिर देखो उस यात्री का रूप बदलता है कि नही | वह यात्री डाकू या लुटेरा होगा तो भी पवित्र हो जायेगा |

……तो यह फर्क भावना के कारण होता है | भावना में ही सबकुछ भरा है | जीवन भावनामय है | ….कोई कहेगा की आखिर ऐसी झूठी कल्पना करने से क्या लाभ ? मै कहता हूँ कि पहले से ही सच्चा-झूठा मत कहो | पहले अभ्यास करो, अनुभव लो, तब तुम्हे सच-झूठ मालूम हो जायेगा |

cont…..Er. Dhiraj kumar shrivastava, 9431000486, 9.7.10

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