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क्या है क्रिसमस का रहस्य (कैसे कृष्णमास को मनाएं ?)

Posted On: 26 Dec, 2014 Others में

आर्यधर्मआर्य पुनर्जागरण का आह्वाहन

shailesh001

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गीता के हरि उद्बोधन (जयंती) की १८ दिवा यानि महाभारत युद्ध पश्चात् विश्व ने करोड़ों मौतों, अथाह विनाश के बाद एक नया क्षण देखा और पाया एक नया नायक -महानायक I इस पूर्णतः परिवर्तित काल खंड को कहा गया कलियुग और इसकी पहली दिवा एवं पहला माह अत्यंत ही चमत्कारिक था. ये उस काल एवं जनसमुदाय(जो भी बचा था) के लिए नव वर्ष सदृश्य ही था. कई अर्थों में, ये महाभारत युद्ध एक नयी व्यवस्था का आरम्भ एवं किसी नए युग का सूत्रपात था I अगर हम वास्तविक काल गणना करें, तो जैसा अभी विदेशी इतिहासकारों द्वारा अनुमानित है कि यह २५०० विक्रम पूर्व में घटित हुआ(डेविड डेवनपोर्ट) I पर, इस कथानक में में मात्र यही विमर्श नहीं है.
सिंधु घाटी सभ्यता के उत्खनन से बहुत महत्वपूर्ण बातें मालूम हुई हैं जिसमे एक सुव्यवस्थित, नगरीय व्यवस्था बिना किसी अधिक मानवी अवशेषों के पायी गयी है, कई मानवी अवशेष स्वाभाविक शारीरक प्रक्रिया में ही मूर्त रूप कर दिए गए हैं- जैसे एक गली में एक ही परिवार के तीन लोग हाथ पकडे मुंह के बल जमीं पर चिपटे पड़े पाये गए हैं, भवनो के उत्खनन से मालूम होता है की ऊपर का हिस्सा पूरा बिना किसी अवशेष के गायब है और ईंटों की चारदीवारी गलाकर चिकनी कर दी गयी ! सोचने वाली बात है कि क्या है जो ईंट पत्थर को भी गला दे ? लोहा गलानेवाले ब्लास्ट फर्नेस में तापमान १.५ से २००० डिग्री सेंटीग्रेड पहुँचता है पर ईंट को भी गलाने के लिए और अधिक तापमान चाहिए वो क्या है जिसने ऐसी ऊर्जा पैदा करी ! इतनी ऊष्मा पैदा कहाँ से हुई ? कोई प्राकृतिक अग्नि धरती पर ऐसी नहीं जहाँ ऐसा ताप पैदा हो जायेI पर, मानवजनित एक उपक्रम से ऐसा हो सकता है — वो है “अणु या नाभिकीय विस्फोट” !!!
जी हाँ, महाभारत युद्ध परमाणु विस्फोट से समाप्त हुआ और जिसमे करोड़ों की तात्कलित जनसँख्या कालकवलित हुई थी. महाभारत के द्रोण पर्व में उल्लेख है — वृष्णिक और अंधकपुत्रों ने विमान से आग्नेयास्त्र फेंका जिससे कई सूर्यों के चमकने जितना पकाश उत्पन्न हुआ, इतनी भीषण ऊष्मा पैदा हुई की खाल देह से उधड़कर उत्तर गयी, एक योजन के दायरे में गहरा गड्ढा हो गया और सब कुछ वाष्पीकृत हो गया, सैनिक उस भयावह दहन से बचने के लिए जलाशयों में कूद पड़े पर फिर भी बच नहीं पाये….. वृष्णिक और अंधकों की पूरी नस्ल वहीँ समाप्त हो गयी !
ऐसा विभिषक था वह प्राचीन विश्वयुद्ध और जिसमे बचने वाले कुछ चंद ही भाग्यशाली थे. पर इसमें अधर्मियों का नाश हुआ था और धर्मग्राही आर्यों के नायक थे श्री-कृष्ण !! महाभारत युद्ध पश्चात युधिष्ठिर का राज्योंहण हुआ और एक नया शासन चला. कलियुग का प्रारम्भ वैसे तो भारत युद्ध के ३६ वर्ष पश्चात हुआ था!
पर, पिछले पांच सहस्त्र वर्षों की दो सर्वप्रमुख तिथियों में यह तिथि एक है.
गीता ज्ञान या हरी ज्ञान या श्री कृष्ण उद्बोधन की तिथि मार्गशीर्ष एकादशी है और पौष की त्रयोदशी को महाभारत युद्ध का समापन हुआ, और वास्तव में यह दिवस सूर्य की धनु में संक्रांति(अयनांत) (winter solistice) पूरी दर्शिका\पंचांगीय दृष्टि का एक महत्वपूर्ण अवसर है .
यह धनु संक्रांति इस वर्ष २१ दिसंबर को पड़ी पर कभी यह २५ दिसंबर को पड़ी होगी I और ये तभी हुआ जब उस विदेशी राज्यव्यवस्था ने इस तिथि को अपने सर्वमान्य प्रथम दिवस के रूप में निश्चित किया !! यह वर्ष ज्योतिषीय गणना से निकाला जा सकता है ! यह तिथि ३३६ ईस्वी हो सकती है जब रोमन शासक कॉन्स्टैन्टाईन ने ईसाई बन कर ईसाई धर्म की स्थापना करी. शीत या धनु संक्रांति का यह दिवस वह अवसर है जब सूर्य अपनी कक्षा में हमसे सबसे दूर होता है जब रात सबसे लम्बी होती है, और इसी दिन से अंधकार काम होता जाता है, जबकि प्रकाश बढ़ता जाता है क्योंकि हमारा पालक पिता सूर्य पृथ्वी के समीप आता जाता है. इस दिवस को प्रकाश का दिवस भी कहा जाता है और इसीलिए पश्चिम में इस दिन प्रकाश करते हैं, ये वह समय होता है जब मध्यपूर्व एवं यूरोप में कड़ाके की ठण्ड पड़ती है और सब कुछ जमा होता है इसका तात्पर्य ये हुआ की वहां इस क्षण उत्सव मनाने जैसा कुछ नहीं होता !! तो फिर क्यों बेथलहम में इस मसीह की कथा बनायीं गयी ? ईसा मसीह को प्रकाश का पुत्र भी कहा जाता है ! पर, ये आज पूरी तरह से निश्चित है और जिसे ईसाई तक मानते हैं की २५ दिसंबर इस मसीह की जन्म थी तो नहीं है. क्योंकि इस मौसम में मध्य पूर्व (बेथलहम या आजके इजराइल या ईश्वरलायम में !) में कोई घास नहीं होती, बस दर्जनो फीट ऊँची बर्फ होती है और ऐसी जगह कोई ग्वाला अपनी गाय चराते नहीं गुजर सकता और उसकी अनब्याही (?) स्त्री किसी बेटे को जन्म नहीं दे सकती !! तो फिर हुआ क्या था ??
वास्तव में, रोमन साम्राज्य जो की मेडिटेरेनिअन सागर के आसपास की सिमित था, विश्व के महानतम सम्राट* विक्रमादित्य के नेतृत्व में भारतीय आर्य सेनाओं ने उस साम्राज्य को छीन भिन्न कर दिया जिससे उन रोमनों को और पूर्व(और उत्तर में) में आना पड़ा जहाँ पूर्व भारतीय यानि महाभारत युद्ध के पश्चात पश्चिम (सिंधु देश से) की ओर गए हुए यदु वंशी निवास करते थे, यही ‘यदु’ वंशी ही आज के यहूदी हैं. यदु =यजु=ज्यु = JEW . और इन यदुवंशियों के अराध्य तो महानायक कृष्ण ही थे. रोमनों ने अपना शासन पुनर्स्थापित करने हेतु नया धर्म चलाया पर, वो इस जनमानस से कृष्ण का प्रभाव समाप्त नहीं कर पाये थे. इसलिए उन्होंने ३३६ (मतान्तर से ३२४) में नए राज्य की स्थापना की और बहुसंख्यक जनसमुदाय की आस्था के सम्मान के लिए उन्ही कृष्ण पर अपनी नयी आस्था (पंथ या धर्म) बनाने का प्रयास किया !
महाकवि कालिदास अपने अनुपम ग्रन्थ “ज्योतिर्विदा भरणम्” में लिखते हैं —
यो रुक्मदेशाधिपति शकेश्वरम् …………………….. सःविक्रमार्कः समसह्यविक्रमः अर्थ : जो रुक्म देश के अधिपति शकेश्वर को संग्राम में जीत कर लाया, उस राजा को बंदी बना उज्जयिनी में घुमाया और उसे पुनः मुक्त कर दियाI इस प्रकार, विक्रमदित्य का आश्चर्य जनक, उदार एवं सम सह्य(सम व्यव्हार, सहष्णुता) व्यव्हार युक्त पराक्रम है !!
यह घटना का वर्णन ३०६८ कलि संवत या ६६ विक्रमाब्द (या विक्रम संवत में लिखा गया है ! यानि ९ ईसा(AD) !! यानि इसके अगले लगभग ३०० वर्ष वहां गुप्त शासन रहने का अनुमान है, १३५ वर्ष तो है ही क्यंकि स्कंदगुप्त (विक्रमादित्य) एवं अन्य गुप्तवंशी सम्राटों ने फिर से शकों यानि रोमनों और ग्रीकों (वैसे वो रोमन साम्राज्य का अंग हो चुके थे और जिन्हें हम भारतीय म्लेच्छ या अनार्य कहते थे) का सफाया किया था ! और यह युद्ध उसी मध्य धरातलीय सागर (धरती के मध्य स्थित सागर या भूमध्य सागर) यानि मेडी टेरैनियन सी के समीप हुए; जिसके और कश्यप सागर या कश्यप-सर (Caspian sea) के मध्य ही कई (पौराणिक १२) देवासुर संग्राम हुए !!
यह ध्यान देने वाली बात है की जैसे हम भारतीयों के अगर मिलाकर देखे जाएँ तो सौ के आसपास त्यौहार होते हैं जबकि इन यूरोपियनों के कुल मिलाकर मात्र एक यही एक (प्रमुख) त्यौहार है जो ये बतलाता है की उनकी सभ्यता बहुत अल्पजीवी है !
और इस त्यौहार को मनाने का अर्थ ही है की वहां ऐसे शासकों का शासन रहा है जो कृष्ण का सम्मान करते थे और उनका सम्बन्ध श्री कृष्ण से रहा होगा ! जैसा मेरे अन्य ब्लॉग-लेख में वर्णित है (कब होता है नव वर्ष ?-१,२) “जीसस क्राइस्ट” “ईश्वर कृष्ण” से आया है ! श्रीकृष्ण को भी प्रकाश का दूत या ईश्वर का पुत्र कहा जा सकता है क्योंकि वो विष्णु के अवतार थे और पूरे विश्व को वो महाभारत के अंधकार से बाहर लेकर नए युग के जीवन में लेकर आए थे !
पर, श्रीकृष्ण के नाम को ही यहाँ प्रस्थापित करने का कोई तात्पर्य तो होगा ही ! क्यों नहीं यह दिवस (क्रिसमस) महाभारत समाप्ति यानी २५०० ईसा पूर्व से १० ईसा या यहाँ तक की ३२४ ईसा तक के बीच में त्यौहार के रूप में मनाया गया ? सोचकर देखें, इस त्यौहार के प्रथम शती ईसा से पहले (न पश्चिम न विश्व में) मनाने के कोई प्रमाण नहीं मिले हैं ! वास्तव में, अलेक्सांद्रिया का ओरिजेन(Aurigen) जैसे तो इसे “PAGAN” (प्राचीन भारतीय सभ्यता की पूजा पद्धति को दिया म्लेच्छों यानि आजके यूरोपियनों का अपमानकारी शब्द) परंपरा कह कर इसकी भर्त्स्ना करते थे, ईस्वीं पांचवी शती तक तो इसकी अवमानना की जाती थीI वास्तव में २५ दिसंबर का उल्लेख चौथी शती के रोमन पंचांग में आया (Dies Natalis Solis Invictus के नाम से यानि अविजित सूर्य का पदार्पण का दिन !!!!)और उस वक्त ईसाइयत का (विश्व में) नामोनिशान नहीं था. संन ६०१ ईस्वीं में एक पोप ग्रेगोरी ने ईसाइयत फ़ैलाने वाली मिशनरियों को, जो तात्कालिक विश्व की भारतीय\वैदिक या आर्य आबादी को ईसाई बनाने का प्रयास कर रहीं थीं, धूर्ततापूर्ण निर्देश दिया था की वैदिक\आर्य मंदिरों को तोड़ने की बजाय इसमे ही चर्च बना दिए जाएँ और बजाय बहुसंख्यक आर्य आबादी (प्राचीन वैदिक भारतीय) का प्रत्यक्ष धर्मान्तरण करने के प्रारम्भ करने को उनकी ही उत्सव तिथियों पर ईसाई बलिदान दिवस मनाये जाएँ. यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है– क्योंकि इंग्लैण्ड में ड्र्यूड लोग जो संस्कृत शब्द द्रविड़ का अपभ्रंश है जिस्का अर्थ ब्राह्मण (दक्षिण भारतीय मूल के) होता है तब भी प्राचीन आर्य (यानि गुप्तों द्वारा स्थापित) संस्कृति एवं पूजा पद्धति का पालन करते थे और आश्चर्यजनक हर्ष का विषय है की आज भी करते हैं. और दूसरी मजे की बात, उसी ईसाइयत में उनके पूर्वी साम्राज्य में यही तथाकथित क्रिसमस जनवरी ६ को मनाया जाता है !! कई पुराने म्लेच्छों ने अन्य तारीखों पर इस काल्पनिक जन्मदिवस को मनाने का सुझाव दिया था- जैसे अलेक्सांद्रिया के क्लेमेंट ने मई २० को इसे मनाने का सुझाव दिया पर इसके अलावा भी अन्य तारीखें भी गढ़ी गयीं जैसे– अप्रैल-१८, १९, २८; हिप्पॉलीटस ने २ जनवरी का दिन सुझाया था, नवम्बर १७, २५ के अलावा मार्च २५ और २१ (पोलिकार्प) तिथियाँ भी सुझाई गयीं !!!!! वास्तव में खुद ब्रिटेन में ही जहाँ प्राचीन वैदिक आर्य सभ्यता सबसे अंता तक रही और आज भी है, में एक दुसरे पोप ग्रेगोरी तेरहवें ने अपने नए कैलेंडर में १६०१ में ही इस तारीख को निश्चित किया था !!! वास्तव में, इस तारीख को जीसस से सम्बंधित बनाने के लिए हर तरह के प्रपंच किये गए, उस समस्त तात्कालिक विश्व के विरोध एवं एवाहन पहले से प्रचलित आर्य परंपरा के कारन कई तरह के झूठ बोले गए और विभिन्न आर्य-हिन्दू तिथियों को ईसाईयत का रंग देना शुरू किया गया -उदहारण: अर्मेनिआ में, मिश्रमें, पूर्वी यूरोप रूस में और मध्यपूर्व में यह तारीखें भिन्न हैं और उनको मनाने के कारण भी !!

“श्री” “कृष्ण” पर उत्तर महाभारत काल में ग्रन्थ लिखने वाले पहले व्यक्ति थे- महाराजाधिराज सम्राट समुद्रगुप्त इस ग्रन्थ का नाम था “कृष्ण चरित” !! कृष्ण महानायक तो थे ही पर १०० ईसापूर्व में उनपर साहित्य निर्माण हुआ और समूचे विश्व में प्रसार भी I इसका कारण यह हो सकता है कि गुप्तवंशी इन्ही “श्री” कृष्ण की वंशावली में आते थे और हर राजवंश अपने पूर्वजों को विशेष स्थान देता है ! इसीलिए इस महत्वपूर्व ज्योतिषीय कालखण्ड को “श्रीकृष्ण” के नाम पर चुना गया होगा जो एक दम उपयुक्त भी है !
तो ये कहा जा सकता है और जैसा कई पश्चिमी शोधकर्ताओं ने स्वीकारा भी है की वास्तव में जीसस क्राइस्ट कोई नहीं थे, ये गुप्तवंशी सम्राटों के पूर्वज और इसीलिए समस्त भारतीयों के पूर्वज एवं महानायक श्री कृष्ण ही थे जिनको खदेड़े गए रोमन (इटली और फ़्रांस के लोग) नकार नहीं सकते थे ! कृष्ण का नाम इस्तेमाल कर एक म्लेच्छ राज्य स्थापित किया गया था.
अगर निष्काषित एवं पराजित म्लेच्छो यानि रोमनों ने इस दिन का सहारा न लिया होता तो आज यह रोमन (इटैलियन) मूल की ईसाइयत शायद नष्ट हो गयी होती और बस उस एक रोमन क्षेत्र (रुक्मदेश=रोमकदेश=रोम) के सिवा आज समूचा विश्व आर्य या हिन्दू या भारतीय होता !!!

बड़ी ही विडंबना है की उन्ही श्री कृष्ण के वंशज आज के हमारे यहूदी (JEWS) भाई इसके बारे में सर्वथा अनभिज्ञ हैं और हम भारतीय भी!! और मात्र यहूदी ही नहीं, आर्य हिन्दू वंशज और भी हैं जिनके बारे में विश्व तक भूल गया है जैसे की यदीजी (यजीदी नहीं) जिनके बारे में मैं अन्य लेख में कहूँगा*.
तो इसीलिए कलियुग के आरम्भिक सबसे महत्वपूर्ण मास के प्रथम दिवस को कृष्ण मास या पुरुषोत्तम मास या विष्णु मास(जो अवधि पश्चात वैष्णव गुप्तवंशियों ने निश्चित किया होगा) कहते हैं; और जैसा पहले कहा गया– कई अर्थों में ये भी एक नववर्ष है.
१५०० वर्षों के झंझावात और म्लेच्छों के प्रभाव से हम भारतीय इस महान प्रभावकारी तिथि को सही सम्मान देना भूल गए हैं . निक्रिष्टों के प्रभाव में हमने इसे मल-मास, खलु (बुरा) मास या खरमास बना दिया है. मात्र इसी (और अन्य सामान्य) कारणों से भारतवर्ष या आर्यावर्त समूचे विश्व का शिक्षक, विश्वगुरु एवं शासक बना . महान नायक, विष्णु सदृश्य, “परम भागवत” “साहसांक” चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के “रामराज्य” में महा ब्राह्मण वराहमिहिर द्वारा स्थापित उस प्रचंड अलौकिक विश्व के इस अनुसन्धान को हम अनार्य प्रभाव में हम विस्मृत कर चुके हैं.
अगर भारतवर्ष या आर्यावर्त को फिर से आर्यावर्त बनना है और “हिन्दू” और “Indus” के आक्षेप से मुक्त होना है तो हमें इसी क्षण और कल से ही कृष्णमास का निर्वहन – पूरे विधिविधान से एवं गंभीर आचरण एवं अनुशासित मनःस्थिति से इसका आयोजन समस्त हिन्दू समाज और वास्तव में समूचे देश में प्रारंभ किया जाना चाहिए.
“कृष्ण्मास” अपने इस सैंटा क्लॉज़, रेनडियर के रूप में अंग्रेजों के कारण भारत में आया है जो साफ दिखाता है की यह इस संस्कृति का पर्व नहीं है; और क्योंकि यह पूरे विश्व में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है इसलिए हम इसका अनुसरण करने लगें ये तो मेरे दृष्टि में यह तो निकृष्ट गुलामी होगी. ध्यान रखें हमारे हर पर्व का उद्योग अत्यंत वैज्ञानिक है जो प्रथम आर्य-हिन्दू राज्य (विक्रमादित्य-वरहमहिर) द्वारा स्थापित किया गया था और इसे निर्दिष्ट विधान से मनाने से ही इसका लाभ होता है.
कृष्ण मास या विष्णुमास, पूर्णमास , “पवित्रमास” विद्यालयों और समस्त शिक्षा संस्थानों में मनाना चाहिए. इस दिन अवकाश न होकर जागृत उर्जावान होकर शुद्ध मुद्रा में संयत होना सीखना एवं सिखाना चाहिए.
इस दिन, सभी गुरुओं का सम्मान, शुद्ध, स्थापित एवं सर्वमान्य “ब्राह्मण संस्था” (अगर है तो, जो वास्तव में इस देश में अभी नहीं है *) के प्रस्थापित आचार्यों से संपर्क एवं शिक्षा प्रारंभ करना चाहिए. ईसाइयत में सेंट वास्तव में इसी प्राचीन प्रचलन का पश्चिमी अभिग्रहण है जो प्राचीन आर्य संत यानि ऋषियों यानि गुरुकुल, विश्वविद्यालयों के आचार्यों, महान प्रबुद्धों, शिक्षको एवं ज्ञानियों के लिए प्रयुक्त होता था. इस महान तिथि की उपेक्षा एवं इसे मात्र मंगल कार्यों के अनुपयुक्त पा इससे वैमनस्य ही हमारी दुर्दशा का कारण है.
कृष्ण मास या विष्णु मास या “गुरु-मास” पर प्रातःकाल स्नान-आराधना करके तैयार हों, जितना हो सके एवं निश्चित रूप से केसरिया, पीताम्बर एवं उन सबसे बढ़कर indigo यानि जामुनी, नील एवं श्वेत का मिश्रित रंग वस्त्र रूप में या तिलक रूप में धारण करें .
यही दिवस पठन पाठन, दीक्षारंभ, गुरुकुल स्थापना, शोध एवं शिक्षण सत्र आरंभ, छात्रों को उपाधि वितरण, गुरु दक्षिणा एवं गुरु चरण वंदन हेतु विधिवत प्रस्थापित होना चाहिए और उससे पहले हम अपने जीवन में इसे प्रारंभ कर सकते हैं. किसी अन्य मिथ्या कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है.
कृपा करके इस दिन एवं सही रूप में पूरे मास पर्यंत दैहिक, मानसिक (एवं ब्राह्मणों के लिए-(जाति नहीं) आत्मिक भी) अनुशासन का पालन, मद्य, सामिष एवं अन्य वासनाओं से दूर रहें . वास्तव में ईसाई क्रिस्मस इसी मास के पूर्व होने वाला मस्ती पूर्ण या बंदिशों से रहित हर्षोत्सव है. जैसे श्रावण मास से पूर्व “गटारी” मनाया जाता है . अनार्य प्रभाव में हम अपना सत्व निसार चुके हैं .
आज के दिन दान एवं उपहार भी दें, पर पुस्तक का, पाठन सामग्री, शिक्षण उपकरण, शिक्षण सामग्री, गरीब होनहार बच्चों को (खोजकर) शिक्षा के लिए अनुदान, सहायता प्रदान करें जिसके लिए ये सर्व उपयुक्त दिवा एवं माह है.
प्राचीन गुरुओं, महर्षियों, ज्ञानियों, विद्वानों को सम्मानित करें, नमन करें.
विद्यालयों, प्राचीन व्यवस्था के अंतर्गत चलने वाले गुरुकुलों, बटुक संस्थानों, विश्वविद्यालयों, निशुल्क चलने वाले शिक्षण संस्थानों को दान-सहायता के लिए इस माह से महत्वपूर्ण माह और दूसरा नहीं. ऐसा करके हम अपना परलोक सुधारें या नहीं अपने महानतम राष्ट्र का भविष्य अवश्य सुधार देंगे. जिस क्षण सर्वत्र भारतवर्ष इस महान पर्व का शुद्ध विधान से पालन करना आरंभ कर देगा यह राष्ट्र अंश राष्ट्र होने की दिशा में दौड़ पड़ेगा. महामहिम राष्ट्रपति महोदय, आदरणीय प्रधानमंत्री साब से भी यही अनुरोध है जो उनसे साझा की जा चुकी है.
इस दिन पीपल के वृक्ष की विशेष रूप से या तुलसी या बेल की पूजा की जानी चाहिए ध्यान देने योग्य है ये तीनों पादप क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, महेश का प्रतिनिधित्व करते हैं, आंग्ल देश (इंग्लैण्ड या यूरोप) में इन पादपों के अभाव में mistletoe यानि अमरबेल या क्रिसमस ट्री को अलंकरण के लिए (नाकी पूजा के लिए) प्रयोग किया जाता है. या पीपल का पत्ता निकाल कर रखना चाहिए, खासकर पुस्तक में.
पीली वस्तुओं, आहार का सेवन करना चाहिए, सोंठ, गोंद, हल्दी, केसर, सरसों इत्यादि का सेवन कर सकते हैं.
इस महान देश के भाग्यशाली नागरिकों को गुरु वंदन, ज्ञानोपासना एवं अध्यात्मिक आरोहण के उत्सव कृष्ण मास की नवीन शुभकामनायें, कृपया किसी विदेशी पद्धति एवं म्लेच्छ आस्था का पोषण कल ना करें . यह हमारा हिन्दुओं का ही पर्व है, जीहाँ, “कृष्ण” का इससे गहरा सम्बन्ध है* . तो इससे अभी इसे कृष्ण मास कहें तो भी ठीक, विष्णुमास कहें वो भी ठीक पर इसका आयोजन पुरुषोत्तम आचार से ही करें, वही अत्यावश्यक है.
और एक प्रचंड सत्य, इस कृष्ण मास की महिमा पूर्व स्थापित थी इसका संज्ञान उन म्लेच्छ यानि यूरोपियनों द्वारा प्रयुक्त किये इस बारहवें महीने के नामकरण से होता है !
यूरोपियनों ने इस महीने का नाम (January) रखा एक मिथक रोमन देव के नाम पर जिसे “जैनस” बताया गया है — वास्तव में जनवरी जिस जैनस देव के नाम पर रखा है वह “ज्ञान” का पश्चिमीकरण (रोमनीकरण) है ! देखिये — ज्ञान यानि GYAN को विदेशी आज भी ज्ञान या “JAN” लिखते हैं जिसका स्नग्यसूचक या पुरुष सूचक रूपांतरण है जैनस, जिसे भले ही बताया जाता है देवता जो द्वार को परिलक्षित करता है (जिसमे दोनों ओर से प्रवेश होता है– (आना) “जाना”!!!!) पर यह इस ज्ञान के मूहूर्त मास के शुभारम्भ का सूचक है, यह घटना बहुत संभव है आठवीं शताब्दी के बाद और सोलहवीं शताब्दी के पहले हुई होगी ! और लगे हाथ यह भी आज बता ही दूँ इसी ज्ञान की पूजा करके पश्चिमी बर्बर, गंवार (हमेशा से) आज अपनी “क्रांति”(!!!) से विश्व पर राज कर रहे हैं ! और यह सब आर्य सत्ता या भारत की अपनी उत्पन्न की हुई थाती है हमारी धरोहर है !
सोचने वाली बात है क्या हो गया इस धरोहर को ?

जय विक्रम, जय सप्तर्षि, जय शिव.
शैलेश.

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