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कभी कभी

Posted On: 27 Oct, 2015 Others में

saanjh aaiJust another weblog

shakuntlamishra

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दक्खिनी बयार
झूलती डार,
अपनों का प्यार
बींध जाते हैं !
फूल बसे घर
धुप धुली छत
भादों के बादल
काम ही दिखतें हैं !
अनूठा रूप
मुक्त वेणी
समंदर की लहरे
कुछ कह जातें हैं !

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