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अरुणाचल प्रदेश :सी.एम्.हाउस का वास्तु सुधारें ......

Posted On: 4 Jan, 2017 Others में

! मेरी अभिव्यक्ति !तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

शालिनी कौशिक एडवोकेट

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अरुणाचल प्रदेश में सी.एम्.हाउस में तीन सी.एम्. की मौत के बाद वहां की सरकार भी भूत-प्रेत में विश्वास करने लगी और बंगले को पूजा पाठ के बाद गेस्ट हाउस में तब्दील करने की योजना पर काम करने में जुट गयी .इसे कहते हैं समस्या के सही निदान की न सोचकर इधर-उधर हाथ पैर मारना, हमें स्वयं विचार करना चाहिए कि क्या गेस्ट हाउस इसका हल है और जिस बंगले को तीन तीन सी.एम्.व् एक कर्मचारी की मौत के कारण भुतहा समझा जा रहा है  क्या कोई गेस्ट उस हाउस में ठहरकर अपनी ज़िन्दगी गंवाने का दुस्साहस कर पायेगा और रही पूजा पाठ की बात तो पूजा पाठ अगर उसका यह दोष समाप्त कर सकती है तो फिर बंगले को सी.एम्.हाउस ही रहने देने में क्या बुराई है ?

२००९-१० में बनकर तैयार हुए २७९४.८० वर्ग मीटर क्षेत्रफल में फैले इस बंगले को बनाने में उस वक़्त ५९.५५ करोड़ रूपये खर्च हुए थे .पी.डब्लू .डी. की देखरेख में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट की डिजाइन शहरी विकास मंत्रालय तथा कहा जा रहा है कि शहर नियोजन विभाग के मुख्य वास्तुकार ने तैयार की थी जिसे लेकर आश्चर्य किया जा सकता है क्योंकि वास्तु वह विद्या है जिसमे ऐसी सब समस्याओं के हल हैं और वास्तुसम्मत कोई भवन ऐसी संज्ञा से विभूषित नहीं हो सकता .हमने स्वयं इस बात को देखा व् जाना है .एक भवन जिसमे एक परिवार ने जब रहना आरम्भ किया तो उस परिवार का केवल एक सदस्य ही जीवित रह पाया और उसी भवन को जब उससे एक अन्य परिवार ने खरीद उसमे बड़ों -बुजुर्गों से प्राप्त ज्ञान , जिसे अब पुस्तकों में ढाल दिया गया है और वास्तु शास्त्र नाम दिया गया है , के हिसाब से कुछ तब्दीलियां कराई तो उनका परिवार वहां सुख-चैन से रह रहा है और पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ रहा है .

वास्तु-शास्त्र में कहा गया है कि जिस प्रकार मनुष्य का शरीर पंचतत्वों से मिलकर बना है ,उसी प्रकार भवन निर्माण में भी पंचतत्वों के संतुलन का ध्यान रखना चाहिए तभी वह भवन मनुष्य के लिए हितकर एवं उद्देश्यपूर्ण होगा .भारतीय वास्तुशास्त्र भी इन्हीं पञ्च तत्वों के संतुलन को निर्धारित करता है .यदि हम भवन निर्माण के वास्तु चक्र पर गौर करें तो पाएंगे कि इससे दिशाओं -विदिशाओं में इन्हीं पंचतत्वों को इनके गुण अनुरूप समायोजित किया गया है .प्रत्येक धातु का उसी प्रकृति के अनुसार दिशा निर्धारण किया गया है यदि भवन निर्माण करते समय वायव्य कोण को खाली रखने का निर्देश दिया गया है और व्यक्ति वायव्य कोण को बिलकुल बंद कर दे तो वहां हवा से बहाव प्रभावित होगा जब हवा ठीक प्रकार से भवन में प्रवेश नहीं कर पायेगी तो भवन में रहने वालों के स्वास्थ्य पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा .

ऐसे ही भवन की छत के सम्बन्ध में भी वास्तु में विधान है ,पहले कड़ियों के घर बनते थे इसलिए कड़ियों की संख्या निश्चित थी और वास्तु में कहा गया है कि कड़ियों वाले हर कमरे की छत की कड़ियों की कुल संख्या अगर अलग-अलग चार पर किस्मत करे और यदि एक में उत्तर हो तो वह छत राजा इंद्र के समान होगी और उसका उत्तम फल होगा ,बाकी दो हो तो छत यम के समान मौत की यमदूत होगी ,बाकी तीन हो तो वह छत राजयोग के समान होगी और अब क्योंकि लिंटर का प्रयोग चलता है ,छतों में कड़ियों की जगह सरिये प्रयोग किये जाते हैं तो यह व्यवस्था इन पर इसी संख्या में लागू होती है .

अब सी.एम्. बंगले के जिस भाग में वहां ऐसी घटनाएं घट रही हैं वहां यदि वास्तु-दोष का सुधार किया जा सकता है  तो उस पर विचारकर ठीक करा लिया जाये और अगर ये संभव न हो तो पूजा-पाठ द्वारा भवन के मुख्यद्धार के दोनों ओर स्वस्तिक की स्थापना करा दी जाये क्योंकि स्वस्तिक में वह शक्ति है कि वह हर प्रकार के वास्तु दोष  को दूर  कर देता है और फिर अगर इसे सी.एम्.हाउस ही रहने दिया जाये तो हमें नहीं लगता कि कोई दिक्कत होगी क्योंकि जो भी आजमाइश करनी है सी.एम्.पर ही क्यों नहीं ? क्योंकि जो सुविधाएँ सी.एम्. को मिलती हैं वे किसी गेस्ट को तो नहीं मिलेंगी ,फिर बेवजह हाथ-पैर मारकर किसी गेस्ट को मौत के हवाले करने का प्लान क्यों बनाया जा रहा है ?

शालिनी कौशिक

[कौशल ]

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