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बचपन के वो पल-ब्लॉग आमंत्रण – बचपन की यादें

Posted On: 27 May, 2014 Others में

! मेरी अभिव्यक्ति !तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

शालिनी कौशिक एडवोकेट

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बचपन के वो पल




आज बैठे बैठे बचपन की याद आ गयी.शायद मानव जीवन का सबसे खूबसूरत समय यही होता है .मनुष्य जीवन के तनावों से परे यह समय मेरी नज़रों में स्वर्णिम कहा जा सकता है .हरदम रोमांच से भरा बचपन रहा है हमारा  बिलकुल वैसे ही जैसे सीमा पर जवानों का रहता है उनको सामना करना होता है पडोसी देश की सेनाओं का तो हमें हरदम सामना करना पड़ता खतरनाक वानर सेनाओं का .होश सँभालते ही बंदरों की फ़ौज मैंने घर में देखी और घर हमारा इतने पुराने समय का बना है कि कहीं कोई रास्ता बंद नहीं था कहीं से भी बन्दर आ जा सकते थे जहाँ चलो ये देखकर चलो कहीं यहीं पर बन्दर बैठा हो .

एक बार की बात तो ये है कि जब मैं बहुत छोटी थी तो अपनी बुआजी के साथ छज्जे पर लेटी थी तो एक बन्दर मेरे ऊपर से कूद कर गया था .एक बार जब मैं कहीं बाहर से आकर केले खा रही थी तो बन्दर मेरे हाथ से केले छीन कर भाग गया था .यूँ तो हमारा एक प्यारा सा कुत्ता भी था जो बंदरों की परछाई देखकर ही भौंक पड़ता था पर हाल ये था कि  एक बार जब वह बन्दर को आगे बढ़ने से रोक रहा था तो बन्दर ने उसके मुहं पर थप्पड़ तक मार दिया था सन १९८७ में २९ मई की शाम को हमारा प्यारा कुत्ता हमें हमेशा के लिए बंदरों में अकेला छोड़ गया और तब शुरू हुआ बंदरों का खतरनाक दौर जिसमे मम्मी के भी बंदरों ने दो बार काट लिया और वो भी ऐसा वैसा नहीं काफी खून मम्मी का बहा भी .ऐसे खतरनाक दौर में हमारे यहाँ कुछ नए बन्दर और जुड़ गए मैं क्योंकि उनकी शक्ल पहचानती थी इसलिए उनके कुछ नाम भी रख दिए थे एक बन्दर जिसका कान कुछ कटा हुआ था  उसका नाम तो ”कनकटा ”वैसे ही पड़ गया था बहुत खतरनाक बन्दर था वो और उसके साथ थी एक बंदरिया जिसका नाम मैंने ‘चॅटो ‘रख दिया और आप भी यदि उससे मिलते तो उसके खतरनाक होने का अंदाजा लगा सकते थे .जब तक वह रही हम घर में एक कमरे में ही लगभग बंद रहते अभी कुछ महीने पहले ही उसके स्वर्ग सिधारने  का पता चला.

बस एक ही किस्सा लिखती हूँ क्योंकि यदि मैं बंदरो पर लिखती रही तो बहुत पेज  भर जायेगा बस एक ही किस्सा है जिसमे मैं बंदरों को कुछ परेशान कर पाई थी,किस्सा यूँ है कि मैंने छत से देखा कि बन्दर छत के नीचे इकठ्ठा है और हम नीचे नहीं जा पाएंगे तो मैंने बंदरो के बड़े बड़े पत्थर मारे जो उनके लग भी गए और उसके बाद मैं तेजी से भाग कर कमरे में आयी बस शुक्र ये रहा कि बन्दर जीने से आये अगर वे छत से ही छत से ही आते तो उस दिन मेरी शामत आ गयी थी

ऐसे ही किस्सों से भरा है मेरा बचपन ,क्यों सही कहा न सैनिकों जैसा था मेरा बचपन

शालिनी कौशिक

http://shalinikaushik2.blogspot.com

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