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राम ,बुद्ध ,दुष्यंत ये क्या क्या नहीं ....

Posted On: 12 Apr, 2014 Others में

! मेरी अभिव्यक्ति !तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

शालिनी कौशिक एडवोकेट

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आज तक कहा जाता रहा है की द्वापर युग में कलियुग की बहुत सी बातें आ गयी थी किन्तु त्रेता युग में कलियुग का कुछ असर आ गया था यह कभी नहीं कहा गया पर अभी कल ही जब कलयुग के अवतारी पुरुष को अपनी पत्नी का नाम अपने राजकाज में लेते हुए देखा गया तब ये तथ्य भी प्रकाशित हो गया कि त्रेता का असर आज कलियुग में भी है .
आप सभी जानते ही हैं कि कलियुग में एक अवतारी पुरुष हुए हैं और उन्होंने भी त्रेता के राम की तरह वनवास काटा है .त्रेता में तो राम को उनके पिता द्वारा माता का वचन निभाने के लिए वनवास दिया गया था किन्तु यहाँ के अवतारी पुरुष ने स्वयं ही स्वयं को वनवास दिया .त्रेता में तो राम को वनवास दिए जाने पर उन्हें उसमे अपने किसी पुण्य के जाग्रत होने का भान हुआ कलियुग के अवतारी पुरुष को तो पहले से ही इसमें अपने पुण्य की जाग्रत अवस्था दिख गयी और वह स्वयं ही वनवास को चल पड़े और त्रेता के राम तो १४ वर्ष बाद अपने घर वापस आ गए थे किन्तु कलियुग के अवतारी पुरुष १९७१ में घर से चले गए और आजतक घर वापस नहीं लौटे और यही नहीं एक सबसे महत्वपूर्ण बात त्रेता के राम ने अपनी पत्नी माता सीता का परित्याग किया था और कलियुग के इन अवतारी पुरुष ने भी अपनी पत्नी जशोदाबेन का परित्याग किया है .
यही नहीं त्रेता के राम ही नहीं ये अवतारी पुरुष अपनी पत्नी का परित्याग करने के मामले में भगवान विष्णु के एक और अवतार के भी तुल्य है और वे हैं भगवान गौतम बुद्ध .गौतम बुद्ध ने जीवन -मृत्यु का सत्य देखा और उन्हें संसार से विरक्ति हो गयी ऐसा ही हमारे इन अवतारी पुरुष के साथ हुआ इन्हें भी संसार से विरक्ति हुई और ये घर बार पत्नी सभी को देश सेवा के लिए छोड़ आये .
और महाराजा दुष्यंत को भी आप सभी जानते होंगे जो शकुंतला को भूल गए थे ऐसा ही लगता है कि इन महान अवतारी पुरुष जी के साथ हुआ क्योंकि असत्य का साथ देना और नारी पर अन्याय करना इनकी जीवन शैली नहीं और इसी विस्मृति के कारण इन्होने अपनी पत्नी के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया ,जब खुद ही याद न हो तो किसी और को कोई क्या बताएगा ?
और इनकी पत्नी एक बेचारी भारतीय नारी जो आज भी उसी स्थिति में है जिसमे माता सीता रही ,यशोधरा रही और शकुंतला रही अपने स्वामी के प्रति समर्पित ,परित्याग के बाद भी अपने स्वामी का ही ध्यान धरने वाली एक आदर्श भारतीय नारी जशोदा बेन भी हैं जिन्होंने अपने पति के घर में तीन वर्ष में से मात्र तीन महीने उनके साथ बिताकर अपना सारा जीवन उनके नाम समर्पित कर दिया और भारतीय संस्कृति में नारी के लिए स्थापित नारी के कर्तव्यों का निर्वहन करने में अपने सौभाग्य को माना .वे आज भी अपने पति की ख़बरें सुनती हैं और उनकी पूजा करती हैं .जैसे राम के अश्वमेध यज्ञ करने पर माता सीता ने महऋषि वाल्मीकि के साथ गंगा के किनारे जाकर व्रत व् हवन किया था ठीक वैसे ही आज वे अपने पति द्वारा लोकतंत्र में प्रधानमंत्री बनने के लिए किये जा रहे अश्वमेध यज्ञ में साथ देने के लिए व्रत कर रही हैं ,वे अपने सभी कर्तव्यों का पालन कर रही है किन्तु जो प्रश्न आज तक माता सीता के परित्याग को लेकर सिर उठाये हुए हैं वे भला जशोदा बेन के परित्याग को लेकर बंद कैसे हो सकते हैं .सवाल उठने स्वाभाविक भी हैं –
माता सीता के परित्याग के पीछे क्या कारण थे ,लवकुश द्वारा पूछे जाने पर राम ने इसका कारण ”राजधर्म” कहा था फिर यहाँ जशोदाबेन के परित्याग के पीछे क्या कारण था ? इन्हीं अवतारी पुरुष मोदी के भाई सोमाभाई कहते हैं ,”देश सेवा ही उनका धर्म रहा ,इसलिए उन्होंने घर और सांसारिक ज़िंदगी को अलविदा कह दिया ,”सबसे पहले तो चाय पिलाने के अलावा और कोई देश सेवा का रिकॉर्ड हमें आजतक नहीं मिला और १७ सितम्बर १९५० की पैदाइश ये महाशय कोई स्वतंत्रता संग्राम तो लड़ने जा नहीं रहे थे जो १९७१ में जो शहीद भगत सिंह बनने चल दिए और उनकी तरह देश की स्वतंत्रता को ही पत्नी का स्थान दे दिया ,पत्नी सभी जानते हैं पति की चिरसंगिनी होती है ,सहधर्मिणी होती है ,तुलसीदास को तुलसीदास बनाने वाली रत्नावली ही थी उनकी पत्नी जिन्होंने –
”अस्थि चर्ममय देह मम तामे ऐसी प्रीति ,
ऐसी जो श्रीराम में होत न तो भवभीति .”
कहकर तुलसीदास के जीवन को एक नयी दिशा प्रदान की और पत्नी को यहाँ इन अवतारी पुरुष मोदी जी ने पावों में बेड़ियों के समान माना और साथ लेकर चलने में कोफ़्त समान महसूस किया गया .सोमाभाई ४०-५० साल पहले के इस रीतिरिवाज को महज औपचारिकता कहते हैं ,जो एक नारी का जीवन की दिशा पलट दे जिसके सहारे उसे सारी ज़िंदगी बितानी होती है वह उसे बेसहारा छोड़कर घुट-घुट कर अपनी ज़िंदगी बिताने को मजबूर हो जाये उसे पुरुष समाज के ये मुख्य मानवमूर्ति के भाई महज औपचारिकता कहते हैं और कमाल तो ये की अपने भाई का लक्ष्य देश सेवा कहते हैं ,पत्नी व् घर छोड़कर भागने को सांसारिक जीवन को अलविदा कहना कहते हैं ,फिर सांसारिक जीवन के मुख्य केंद्र राजनीति के महल विधानसभा के चुनावों को चार चार बार लड़ना क्या दिखता है और वह भी तब जब ये उसमे कहीं भी ये नहीं दिखाना चाहते कि इनकी कोई पत्नी भी है ,अपने माता पिता का नाम भी न लिखते क्योंकि संसार से जोड़ने वाले सबसे पहले तो वे ही हैं ,अच्छा तरीका है स्वयं तो सारे सुख ऐश्वर्य भोगो और पत्नी को दर दर भटकने को मजबूर कर दो ,लगता है साधु सन्यासी कहलाने वाले ये अवतारी पुरुष कभी भी अपनी पत्नी को याद नहीं कर पाते यदि कांग्रेस के मछुआरे दिग्विजय सिंह वह अंगूठी ढूंढ कर न ला पाते ,यदि चुनाव आयोग नामांकन करते वक़्त विवाहित /अविवाहित स्थिति को भरना अनिवार्य न करते तो ये अवतारी पुरुष प्रधानमंत्री पद की दावेदारी भी स्वयं को कुंवारा दिखा कर ही करते .
ये धोखेबाजी की मिसाल नहीं है तो और क्या है भाजपा के अध्यक्ष राजनाथ सिंह मोदी को राम कहते हैं .राम ने तो अश्वमेध यज्ञ में पत्नी की मूर्ति रखवाना स्वीकार कर अपनी पत्नी सीता का गौरव बनाये रखा था ,उन्होंने अखिल जगत के नारी सम्मान की खातिर रावण से युद्ध किया था फिर ये राजनाथ के राम क्या जसोदाबेन का गौरव स्थापित करने के लिए उन्हें वर्षों बाद स्वीकारकर उनकी तपस्या को सफल करेंगे या अब भी माता सीता के समान इस संसार से रोते रोते जाने को विवश .

शालिनी कौशिक
[कौशल ]

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