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संविधान पीठ के हवाले -सुप्रीम कोर्ट के सवाल-कानूनी स्थिति प्रश्न -1

Posted On: 28 Apr, 2014 Others में

! मेरी अभिव्यक्ति !तू अगर चाहे झुकेगा आसमां भी सामने, दुनिया तेरे आगे झुककर सलाम करेगी . जो आज न पहचान सके तेरी काबिलियत कल उनकी पीढियां तक इस्तेकबाल करेंगी .

शालिनी कौशिक एडवोकेट

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Constitution bench to decide fate of Rajiv killers
राजीव गांधी के हत्यारों को फिलहाल जेल में ही रखने का उच्चतम न्यायालय ने फैसला किया है और इस सम्बन्ध में दोषियों की रिहाई का मसला संविधान पीठ को भेजते हुए अपने कुछ महत्वपूर्ण सवाल संविधान पीठ के सामने रखे हैं जिनका विवरण और उनके सम्बन्ध में कानूनी स्थिति कुछ इस प्रकार है –
*उच्चतम न्यायालय का पहला प्रश्न ये है कि –
प्रश्न-1 -क्या ताउम्र कैद की सजा भोग रहा उम्र कैदी रिहाई की मांग कर सकता है या फिर विशेष अपराधों में जिनमे फांसी की सजा ताउम्र कैद में तब्दील की गयी हो ऐसे दोषी की सजा माफ़ करने के बाद रिहा करने पर रोक लगायी जा सकती है ?
कानूनी स्थिति -ताउम्र कैद की सजा भोग रहा उम्र कैदी रिहाई की मांग नहीं कर सकता .भारतीय दंड संहिता की धारा 57 में दिए गए आजीवन कारावास के प्रावधान के विषय में अभिमत व्यक्त करते हुए उच्चतम न्यायालय ने सुभाष चन्द्र बनाम कृष्णलाल एवं अन्य ए.आई.आर .2001 एस.सी.1903 में कहा -”कि इस दंड से दण्डित व्यक्ति को उसके जीवन पर्यन्त कारावास भोगना होगा जब तक कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसकी सजा लघुकरण या परिवर्तन न कर दिया गया हो ,न्यायालय ने यह भी कहा कि यह आम धारणा पूर्णतः निराधार व् गलत है कि आजीवन कारावास का अर्थ बीस वर्ष के कारावास से अनधिक कारावास होता है और यह माना जाये कि अभियुक्त आवश्यक रूप से इस कारावधि में ढील या छूट का अधिकारी होगा या इसके लिए पात्र होगा .
साथ ही विशेष अपराधों में जिनमे फांसी की सजा उम्र कैद में तब्दील की गयी हो ऐसे दोषी की सजा माफ़ करने के बाद रिहा करने पर रोक नहीं लगायी जा सकती .रूदल शाह बनाम बिहार राज्य १९८३ उम.नि.प.३८७ के प्रकरण में दोषमुक्ति के बाद भी पिटीशनर को अवैध रूप से कारागार में निरुद्ध रखा गया न्यायालय द्वारा बंदी प्रत्यक्षीकरण के साथ साथ प्रतिकर का दावा भी स्वीकार किया गया और यह कहा गया कि यदि इस देश में सभ्यता का विनाश नहीं हो जाना है तो यह आवश्यक है कि हम अपने आपको यह स्वीकार करने के लिए सशक्त बनायें कि व्यक्तियों के अधिकारों का समादर गणतंत्र का एक वास्तविक स्तम्भ है .”और जब उस अपराध में उसकी सजा माफ़ कर दी गयी है तो रिहा किया जाना उसका अधिकार बनता है क्योंकि अपराधी होने के कारण वह अपने प्राण के अधिकार से वंचित नहीं हो जाता है .इसके साथ ही मेनका गांधी बनाम भारत संघ ए.आई.आर.१९७८ एस.सी.५९७ में न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया -”कि प्राण का अधिकार केवल भौतिक अस्तित्व तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसमें मानव गरिमा को बनाये रखते हुए जीने का अधिकार है .”और ऐसे में जब सजा माफ़ हो गयी हो तो जेल में रहना उसके मानव गरिमा के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन है इसलिए ऐसे में उसे रिहा किया जाना चाहिए जब फांसी की सजा ताउम्र कैद में तब्दील की जाने के पश्चात माफ़ कर दी गयी हो .
अन्य प्रश्न के संबंध में कानूनी स्थिति अगली पोस्ट में ……
शालिनी कौशिक
[कानूनी ज्ञान ]

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