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दिल्ली लोकपाल पर विरोध क्यों?

Posted On: 5 Feb, 2014 Others में

बात पते की....भारत के संविधान भाग-3 की धारा 25 से 30 यदि भारत की असुरक्षा का कारण बन जाए तो हमें इसे पुनः परिभाषित करने की जरूरत है।- शम्भु चौधरी

Shambhu Choudhary

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दिल्ली लोकपाल पर विरोध क्यों?
आज दिनांक 4 फरवरी 2014 को केजरीवाल की आम आदमी सरकार ने दिल्ली में ‘दिल्ली लोकपाल कानून’ लाने की पहल शुरू कर दी। कल सोमवार को ही इस बिल को दिल्ली के केबिनेट से पास कर दिया गया। इस दिल्ली लोकपाल कानून का दायरा दिल्ली अधिकार क्षेत्र से बहार नहीं होगा। इस लोकपाल से केंद्र के कोई भी मंत्री जेल नहीं जा सकते। फिर भाजपा और कांग्रेस को इस लोकपाल से इतना खतरा क्यों नजर आता है कि अभी से ही इसे असंवैधानिक कहने लगे। वे इतने ही ईमानदार और जनता के प्रति वफादार है तो इस बिल के उन प्रावधानों पर क्यों नहीं बोलते कि अमूक प्रवधान से उनको केजरीवाल की नियत पर शक है?
दिल्ली लोकपाल कानून उस लोकपाल कानून की काली करतूतों को उजागर करता है जिसमें उन  सियासत दानों ने मिलकर हड़बडी में पास कर दिया। वास्तविकता यह थी कि उनको भय हो चला था कि कहीं केजरवाल की सरकार कोई लोकपाल कानून ना ला दें। इसलिये वे जल्द से जल्द कोई भी कानून पास कर देना चाहते थे कि केजरीवाल दिल्ली में दिल्ली लोकपाल के द्वारा उनके 30 सालों के पापों की फाइल ना खुलवा दें। अब यही लोग उसी लोकपाल का सहार लेकर कानून की दुहाई देने में लग गये। कि दिल्ली में अलग से कोई लोकपाल की जरूरत ही नहीं चुंकि दिल्ली एक केन्द्र शासित राज्य है।
सवाल उठता है कि दिल्ली की जनता को लूटने के लिये इनके पास सारे कानून और सिस्टम उपलब्ध है परन्तु जनता के धन पर राज करने वालों पर कोई नियंत्रण करने का साधन नहीं। दिल्ली के मुख्यमंत्री के हाथ-पांव को सभी कानून से बांधने के हथकंडे को कानून व व्यवस्था का नाम देने वाले कानूनी लूटरों   की बात पर तब आश्चर्य होता है कि जिस लोकपाल को केजरीवाल लाना चाहते हैं क्या उसमें केजरीवाल को कहीं सुरक्षित रखने का भी प्रावधान है क्या? यदि ऐसा नहीं है तो उनका विरोध किस बात का है।
ये राजनीति दल चाहतें हैं कि चोरों के पकड़ने का कानून भी चोर ही बनाये। कानून व्यवस्था का सहारा लेकर ये लोग कभी केजरीवाल को अराजक कहने से नहीं हिचकते । कोई इनको पागलों का नेता कहता है तो कोई केजरीवाल को पागल कहता है।  भ्रष्टाचार में डूबे इन नेताओं का अहंकार सर चढ़कर बोलने लगा है। मानो सरकार चलाने का तर्जूबा सिर्फ कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के पास ही। देश की सत्ता में काबिज हो सरकारी खजानों को लूटना, देश की खनिज संपदा का बंदरवाट इनके सरकार चलाने का अर्थ होता है। लोकतंत्र को यह अपने घर की तिजौरी समझते हैं ये राजनेता। एक-दूसरे को गाली गलौज करो,  कुछ दिन तुम राज कर लो फिर मैं मुझे गाली दूंगा तुम विपक्ष में बैठना मैं राज करूँगा। देश का लोकतंत्र बस इसी व्यवस्था का नाम है। देश को लूटो और राज करो।
लोकतंत्र को इन राजनेताओं ने जनता को मुर्ख बनाने का साधन समझ रखा है। इनके लिये चांदी के टूकरों पर पलनेवाले कुत्तों को रोटी फेंकते रहना ही लोकतंत्र है। एक की सत्ता घूटनों से ऊपर नहीं उठती दूसरे की सत्ता दो टांगों के बीच फसी हुई है।
– शम्भु चौधरी 04.02.2014
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आज दिनांक 4 फरवरी 2014 को केजरीवाल की आम आदमी सरकार ने दिल्ली में ‘दिल्ली लोकपाल कानून’ लाने की पहल शुरू कर दी। कल सोमवार को ही इस बिल को दिल्ली के केबिनेट से पास कर दिया गया। इस दिल्ली लोकपाल कानून का दायरा दिल्ली अधिकार क्षेत्र से बहार नहीं होगा। इस लोकपाल से केंद्र के कोई भी मंत्री जेल नहीं जा सकते। फिर भाजपा और कांग्रेस को इस लोकपाल से इतना खतरा क्यों नजर आता है कि अभी से ही इसे असंवैधानिक कहने लगे। वे इतने ही ईमानदार और जनता के प्रति वफादार है तो इस बिल के उन प्रावधानों पर क्यों नहीं बोलते कि अमूक प्रवधान से उनको केजरीवाल की नियत पर शक है?

दिल्ली लोकपाल कानून उस लोकपाल कानून की काली करतूतों को उजागर करता है जिसमें उन  सियासत दानों ने मिलकर हड़बडी में पास कर दिया। वास्तविकता यह थी कि उनको भय हो चला था कि कहीं केजरवाल की सरकार कोई लोकपाल कानून ना ला दें। इसलिये वे जल्द से जल्द कोई भी कानून पास कर देना चाहते थे कि केजरीवाल दिल्ली में दिल्ली लोकपाल के द्वारा उनके 30 सालों के पापों की फाइल ना खुलवा दें। अब यही लोग उसी लोकपाल का सहार लेकर कानून की दुहाई देने में लग गये। कि दिल्ली में अलग से कोई लोकपाल की जरूरत ही नहीं चुंकि दिल्ली एक केन्द्र शासित राज्य है।

सवाल उठता है कि दिल्ली की जनता को लूटने के लिये इनके पास सारे कानून और सिस्टम उपलब्ध है परन्तु जनता के धन पर राज करने वालों पर कोई नियंत्रण करने का साधन नहीं। दिल्ली के मुख्यमंत्री के हाथ-पांव को सभी कानून से बांधने के हथकंडे को कानून व व्यवस्था का नाम देने वाले कानूनी लूटरों   की बात पर तब आश्चर्य होता है कि जिस लोकपाल को केजरीवाल लाना चाहते हैं क्या उसमें केजरीवाल को कहीं सुरक्षित रखने का भी प्रावधान है क्या? यदि ऐसा नहीं है तो उनका विरोध किस बात का है।

ये राजनीति दल चाहतें हैं कि चोरों के पकड़ने का कानून भी चोर ही बनाये। कानून व्यवस्था का सहारा लेकर ये लोग कभी केजरीवाल को अराजक कहने से नहीं हिचकते । कोई इनको पागलों का नेता कहता है तो कोई केजरीवाल को पागल कहता है।  भ्रष्टाचार में डूबे इन नेताओं का अहंकार सर चढ़कर बोलने लगा है। मानो सरकार चलाने का तर्जूबा सिर्फ कांग्रेस और भाजपा के नेताओं के पास ही। देश की सत्ता में काबिज हो सरकारी खजानों को लूटना, देश की खनिज संपदा का बंदरवाट इनके सरकार चलाने का अर्थ होता है। लोकतंत्र को यह अपने घर की तिजौरी समझते हैं ये राजनेता। एक-दूसरे को गाली गलौज करो,  कुछ दिन तुम राज कर लो फिर मैं मुझे गाली दूंगा तुम विपक्ष में बैठना मैं राज करूँगा। देश का लोकतंत्र बस इसी व्यवस्था का नाम है। देश को लूटो और राज करो।

लोकतंत्र को इन राजनेताओं ने जनता को मुर्ख बनाने का साधन समझ रखा है। इनके लिये चांदी के टूकरों पर पलनेवाले कुत्तों को रोटी फेंकते रहना ही लोकतंत्र है। एक की सत्ता घूटनों से ऊपर नहीं उठती दूसरे की सत्ता दो टांगों के बीच फसी हुई है।

– शम्भु चौधरी 04.02.2014

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