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"संसद" बहुमत की बपौती नहीं!

Posted On: 22 Feb, 2014 Others में

बात पते की....भारत के संविधान भाग-3 की धारा 25 से 30 यदि भारत की असुरक्षा का कारण बन जाए तो हमें इसे पुनः परिभाषित करने की जरूरत है।- शम्भु चौधरी

Shambhu Choudhary

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“संसद” बहुमत की बपौती नहीं!
अन्ततः कल 15वीं लोकसभा ने अपनी अंत्येष्टि कर ली। मनमोहन सरकार के इस अंत्येष्टि कार्यक्रम के समापन समारोह जब प्रतिपक्ष की नेता श्रीमती सुषमा स्वराज ने कहा की ‘‘तेलंगाना व लोकपाल बिल को इस संसद ने पास किया जो वर्षों से लंबित पड़ा था। यह अपने आप में इतिहास है।’’ जबकि लोकसभा के वरिष्ठतम सदस्य व भाजपा के नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी जी सदन में अपनी तारीफ सुनकर भावुक हो गये उनकी आंखों में आंसू भर आये। यह दोनों ही दृश्य कई प्रश्नों का जबाब खोज रही है।
15वीं लोकसभा ने जाते-जाते जिस प्रकार बिल पर बिल पास करने की हड़बड़ी दिखाई, इससे संसदीय लोकतंत्र परंपरा पर कई प्रश्नचिन्ह भी लगा दिये हैं कि क्या ‘‘इसी को लोकतंत्र कहते हैं?’’ संसद को जिसप्रकार ब्लैकआउट कर बहुमत को दंभ भरा गया। ‘‘क्या इसे ही लोकतंत्र की मर्यादा कही जा सकती है?’’इसीप्रकार बहुमत की ताकत से संसद को चलाया जाना था तो ‘‘महिला बिल’’ ने क्या पाप किया था?
तेलंगाना राज्य बने इस बात पर देश में कहीं विवाद नहीं। परन्तु जिस जमीन पर इसकी फसल रोपी गई है वह ना सिर्फ लोकतंत्र के लिये खतरे की घंटी है। इससे भाजपा की नियत पर शक होना लाजमी है कि यह प्रतिपक्ष में बैठी है कि सत्तापक्ष की दलाल है?
15वीं लोकसभा में ही ‘‘लोकपाल बिल’’ को लेकर भाजपा नेता श्री अरुण जेटली जी का एक और बयान चौंकानेवाला रहा ‘बिल’ पर बहस का समय नहीं मिले तो सदन में बिना बहस के भी ‘‘लोकपाल बिल’’ को पारित किया जा सकता है।’’ सवाल इस बात का नहीं कि जेटलीजी ने सबकुछ देख सुन लिया है। सवाल इस बात का है कि देश की जनता को जानने का हक है या नहीं? कि संसद में हो क्या रहा है?
संसद सिर्फ बहुमत की बपौती नहीं है। इससे 125 करोड़ लोगों की आस्था जूड़ी हुई है। बहुमत एक आस्था और व्यवस्था का नाम है, ना कि तानाशाही का। राजनैतिक दलों में आपसी सहमती बने यह अच्छी परंपरा  है। परन्तु संसद को ब्लैकआउट कर तेलंगाना बिल पारित कर देना। देश को गुमराह कर ‘‘लोकपाल बिल’’ को पास करवाना, अपने राजनैतिक फायदे के लिये ‘‘दागी बिल’’ पर आपसी सहमती बनाना। इसीप्रकार जो लोग देश के हिसाब-किताब की पल-पल की खबर रखना चाहतें हैं वे ही लोग अपना हिसाब देना नहीं चाहते? ऐसे कृत्य को बहुमत की मोहर लगा देना, लोकतंत्र के लिये घातक माना जाना चाहिये। ऐसा बहुमत जो लोकतंत्र की मूल भावना को तहसनहस करता हो, ऐसा बहुमत जो देश को लूटने के लिये बनाया जाता हो और लुटरों को सुरक्षा प्रदान करता हो उसे कदापी बहुमत नहीं माना जा सकता भले ही पूरी की पूरी संसद उसके पक्ष में ही क्यों ना खड़ी हो। हमें इसके उन पहलुओं पर भी गंभीरता से सोचना होगा कि ‘अल्पमत’ की जायज बातों को कहीं ‘बहुमत’ से दबाया तो नहीं जा रहा? यदि ऐसा है तो यह लोकतंत्र के लिये शुभ संकेत नहीं है।
जो लोग अब तक देश लूटते रहे जाते-जाते इनलोगों ने सदन के भीतर लोकतंत्र को लूटने का अवसार भी नहीं चुके। ऐसे में सवाल उठता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में हम जिसे विकल्प के तौर पर देख रहें हैं वह कहीं इन्हीं लुटरों का सरदार तो नहीं?
आगामी लोकसभा की तैयारी अब जोरों पर है। अब यही लोग संदन से निकल कर हमारे वोट को लूटने आनेवाले है। कोई हमारी भावना को लूटेगा तो कोई हमारे विचारों को। सबको सत्ता की भूख है। देश की परवा इनमें से किसी को नहीं है। देश की सोचने वाला शख्स इनके विचारों में अराजकता फैला रहा। वह शहरी नकस्लवादी है। उन्हें सरकार चलानी नहीं आती। वह पागल है। उनके पास कोई आर्थिक नीति नहीं। उसको पता नहीं देश की विदेश नीति क्या होनी चाहिये? हमें सोचना होगा कि हमें देश के लूटरों में से किनको चुनना है कि एक वह पागल को चुनना है जो देश के लिये मरने को तैयार खड़ा है। जिसे सत्ता नहीं चाहिये उसे देश की भ्रष्ट व्यवस्था में सुधार चाहिये।
जयहिन्द!!
– शम्भु चौधरी (कोलकाता- 22.02.2014)
Please Read More “BAAT PATE KI”

अन्ततः कल 15वीं लोकसभा ने अपनी अंत्येष्टि कर ली। मनमोहन सरकार के इस अंत्येष्टि कार्यक्रम के समापन समारोह जब प्रतिपक्ष की नेता श्रीमती सुषमा स्वराज ने कहा की ‘‘तेलंगाना व लोकपाल बिल को इस संसद ने पास किया जो वर्षों से लंबित पड़ा था। यह अपने आप में इतिहास है।’’ जबकि लोकसभा के वरिष्ठतम सदस्य व भाजपा के नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी जी सदन में अपनी तारीफ सुनकर भावुक हो गये उनकी आंखों में आंसू भर आये। यह दोनों ही दृश्य कई प्रश्नों का जबाब खोज रही है।

15वीं लोकसभा ने जाते-जाते जिस प्रकार बिल पर बिल पास करने की हड़बड़ी दिखाई, इससे संसदीय लोकतंत्र परंपरा पर कई प्रश्नचिन्ह भी लगा दिये हैं कि क्या ‘‘इसी को लोकतंत्र कहते हैं?’’ संसद को जिसप्रकार ब्लैकआउट कर बहुमत को दंभ भरा गया। ‘‘क्या इसे ही लोकतंत्र की मर्यादा कही जा सकती है?’’इसीप्रकार बहुमत की ताकत से संसद को चलाया जाना था तो ‘‘महिला बिल’’ ने क्या पाप किया था?

तेलंगाना राज्य बने इस बात पर देश में कहीं विवाद नहीं। परन्तु जिस जमीन पर इसकी फसल रोपी गई है वह ना सिर्फ लोकतंत्र के लिये खतरे की घंटी है। इससे भाजपा की नियत पर शक होना लाजमी है कि यह प्रतिपक्ष में बैठी है कि सत्तापक्ष की दलाल है?

15वीं लोकसभा में ही ‘‘लोकपाल बिल’’ को लेकर भाजपा नेता श्री अरुण जेटली जी का एक और बयान चौंकानेवाला रहा ‘बिल’ पर बहस का समय नहीं मिले तो सदन में बिना बहस के भी ‘‘लोकपाल बिल’’ को पारित किया जा सकता है।’’ सवाल इस बात का नहीं कि जेटलीजी ने सबकुछ देख सुन लिया है। सवाल इस बात का है कि देश की जनता को जानने का हक है या नहीं? कि संसद में हो क्या रहा है?

संसद सिर्फ बहुमत की बपौती नहीं है। इससे 125 करोड़ लोगों की आस्था जूड़ी हुई है। बहुमत एक आस्था और व्यवस्था का नाम है, ना कि तानाशाही का। राजनैतिक दलों में आपसी सहमती बने यह अच्छी परंपरा  है। परन्तु संसद को ब्लैकआउट कर तेलंगाना बिल पारित कर देना। देश को गुमराह कर ‘‘लोकपाल बिल’’ को पास करवाना, अपने राजनैतिक फायदे के लिये ‘‘दागी बिल’’ पर आपसी सहमती बनाना। इसीप्रकार जो लोग देश के हिसाब-किताब की पल-पल की खबर रखना चाहतें हैं वे ही लोग अपना हिसाब देना नहीं चाहते? ऐसे कृत्य को बहुमत की मोहर लगा देना, लोकतंत्र के लिये घातक माना जाना चाहिये। ऐसा बहुमत जो लोकतंत्र की मूल भावना को तहसनहस करता हो, ऐसा बहुमत जो देश को लूटने के लिये बनाया जाता हो और लुटरों को सुरक्षा प्रदान करता हो उसे कदापी बहुमत नहीं माना जा सकता भले ही पूरी की पूरी संसद उसके पक्ष में ही क्यों ना खड़ी हो। हमें इसके उन पहलुओं पर भी गंभीरता से सोचना होगा कि ‘अल्पमत’ की जायज बातों को कहीं ‘बहुमत’ से दबाया तो नहीं जा रहा? यदि ऐसा है तो यह लोकतंत्र के लिये शुभ संकेत नहीं है।

जो लोग अब तक देश लूटते रहे जाते-जाते इनलोगों ने सदन के भीतर लोकतंत्र को लूटने का अवसार भी नहीं चुके। ऐसे में सवाल उठता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में हम जिसे विकल्प के तौर पर देख रहें हैं वह कहीं इन्हीं लुटरों का सरदार तो नहीं?

आगामी लोकसभा की तैयारी अब जोरों पर है। अब यही लोग संदन से निकल कर हमारे वोट को लूटने आनेवाले है। कोई हमारी भावना को लूटेगा तो कोई हमारे विचारों को। सबको सत्ता की भूख है। देश की परवा इनमें से किसी को नहीं है। देश की सोचने वाला शख्स इनके विचारों में अराजकता फैला रहा। वह शहरी नकस्लवादी है। उन्हें सरकार चलानी नहीं आती। वह पागल है। उनके पास कोई आर्थिक नीति नहीं। उसको पता नहीं देश की विदेश नीति क्या होनी चाहिये? हमें सोचना होगा कि हमें देश के लूटरों में से किनको चुनना है कि एक वह पागल को चुनना है जो देश के लिये मरने को तैयार खड़ा है। जिसे सत्ता नहीं चाहिये उसे देश की भ्रष्ट व्यवस्था में सुधार चाहिये।

जयहिन्द!!

– शम्भु चौधरी (कोलकाता- 22.02.2014)

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