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फँसे ऐसे कीचड़ में गदहे बेचारे, निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं !

Posted On: 17 Oct, 2012 Others में

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shashibhushan1959

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नियति ने चली चाल इतनी भयानक,
थे ढीले जो फन्दे, कसे जा रहे हैं !
फँसे ऐसे कीचड़ में गदहे बेचारे,
निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं !
.
चढ़ा है नशा मिल गया जो सिंहासन,
न सोचा था ऐसे भँवर में पड़ेंगे !
बपौती समझ कुर्सियों से हैं चिपके,
न सोचा था इतनी बेशर्मी करेंगे !
.
बिना डोर की बन गए हैं तिलंगी,
दिशाहीन होकर उड़े जा रहे हैं !
फँसे ऐसे कीचड में गदहे बेचारे,
निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं !
———–
रानी के दामाद की चाटुकारी में,
सारे नियम – कायदे तोड़ डाले !
थू-थू करे सारी जनता भले ही,
बने आगे बढ़-बढ़ के सब उसके साले !
.
न आती इन्हें शर्म अपने किये पर,
गज़ब बेहया हैं, हँसे जा रहे हैं !
फँसे ऐसे कीचड में गदहे बेचारे,
निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं !
————
भरी इनकी हाँडी, किये पाप इतने,
लबालब हुआ अब छलकने लगा है !
ये खुजला रहे पीठ आपस में मिलकर,
मुखौटा सभी का उतरने लगा है !
.
जनता ने अपनी हिलाई जो चुटकी,
तो खटमल के जैसे पिसे जा रहे हैं !
फँसे ऐसे कीचड में गदहे बेचारे,
निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं !

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