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मन पंछी है बहुत अकेला !

Posted On: 14 Dec, 2011 Others में

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shashibhushan1959

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मन पंछी है बहुत अकेला !
आगे रेला – पीछे मेला !
मन पंछी है बहुत अकेला !
.
दिल के टुकड़े – टुकड़े कर के, एक – एक जर्रे को देखा,
शायद मिल जाए अपनापन, शायद मिले प्यार की रेखा,
मिली उलझनें, मिला झमेला,
मन पंछी है बहुत अकेला !
.
वक्त तमाचा जड़े गाल पर, अपने भी बेगाने होते,
दीपक की लौ मद्धम होती, दूर सभी परवाने होते.
समझ नहीं पाता यह खेला !
मन पंछी है बहुत अकेला !
.
स्वर्ग-नर्क-धरती सब ढूंढा,पर्वत की चोटी पर देखा,
सागर की अथाह गहराई, मंदिर में-मस्जिद में देखा.
प्रेम नहीं, बस रेलम – रेला !
मन पंछी है बहुत अकेला !
.
रिश्ते-नाते-प्रेमी-परिजन, सभी कारवां के हैं साथी,
जब था रहबर सभी साथ थे, बेटा-बेटी-पोते-नाती.
तम्बू सिमटा – उजड़ा मेला !
मन पंछी है बहुत अकेला !
.
यह दुनिया तो रंगमंच है, स्वर्ग-नर्क हैं इसके परदे.
जर-जोरू-जेवर-जमीन में, जीवन भर हैं उलझे रहते.
मंजिल है मिटटी का ढेला !
मन पंछी है बहुत अकेला !
आगे रेला – पीछे मेला !
मन पंछी है बहुत अकेला !

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