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कविता –(Poems)आँगन में तब आई धूप ![CONTEST ]

Posted On: 5 Jan, 2014 Others में

! अब लिखो बिना डरे !शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

DR. SHIKHA KAUSHIK

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ठिठुर-ठिठुर काली भई तुलसी
हरा रूप जब भया कुरूप
आँगन में तब आई धूप !
………………………………
कातिल शीत हवाएं आकर
चूस गयी तन का पीयूष
आँगन में तब आई धूप !
……………………………….
गर्म शॉल लगें सूती चादर
कैसे काटें माघ व् पूस
आँगन में तब आई धूप !
……………………………..
सब जन कांपें हाड़ हाड़
हो निर्धन या कोई भूप
आँगन में तब आई धूप !
………………………………..
हिम सम लगे सारा जल ,
क्या जोहड़ नहर व् कूप ,
आँगन में तब आई धूप !
………………………………….
चहुँ ओर कोहरे की चादर ,
बना पहेली एक अबूझ ,
आँगन में तब आई धूप !
……………………………………………..
हुआ निठल्ला तन व् मन ,
गई अंगुलियां सारी सूज ,
आँगन में तब आई धूप !
……………………………
पाले ने हमला जब बोला ,
बगिया सारी गई सूख ,
आँगन में तब आई धूप !

शिखा कौशिक ‘नूतन’

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