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क्रांति स्वर में ललकारें

Posted On: 7 Jun, 2014 Politics में

! अब लिखो बिना डरे !शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

DR. SHIKHA KAUSHIK

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छोड़ विवशता वचनों को

व्यवस्था -धार पलट डालें ;

समर्पण की भाषा को तज

क्रांति स्वर में ललकारें .

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छीनकर जो तेरा हिस्सा

बाँट देते है ””अपनों ”” में

लूटकर सुख तेरा सारा

लगाते  सेंध  ”सपनों” में ;

तोड़ कर मौन अब अपना

उन्हें जी भर के धिक्कारें .

समर्पण की भाषा को तज

क्रांति स्वर में ललकारें .

*********************************

हमी से मांगकर वोटें

जो सत्तासीन हो जाते ;

भूलकर के   सारे वादे

वो खुद में लीन हो जाते ,

चलो मिलकर   गिरा दें

आज सत्ता-मद की दीवारें .

समर्पण की भाषा को तज

क्रांति स्वर में ललकारें .

******************************

डालकर धर्म -दरारें

गले मिलते हैं सब नेता ;

कुटिल चालें हैं कलियुग की

ये न सतयुग, न है त्रेता ,

जगाकर आत्म  शक्ति को

चलो अब मात दे डालें .

समर्पण की भाषा को तज

क्रांति स्वर में ललकारें.

शिखा कौशिक ‘नूतन’

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