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तेरहवी -कहानी

Posted On: 9 Feb, 2014 Others में

! अब लिखो बिना डरे !शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

DR. SHIKHA KAUSHIK

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”मृत्यु , दाह-संस्कार और तेरहवीं …..इसके बाद बस स्मृति-पटल पर दिवंगत व्यक्ति की छवि ,उसका मुस्कुराना ,रूठना , मनाना , हिदायतें और शेष इच्छाओं की अपूर्णता को लेकर कसक …बस यही तो है इस जीवन का सच .” विचारों के ऐसे ही तूफानी उथल -पुथल से जूझ रही थी पुष्पा अपने सामने घर पर ताला लगवाते समय . आज उसका दिल ही नहीं बल्कि उसकी आत्मा भी चीत्कार कर रही थी .

तेरह दिन पहले तक ज़िंदगी धीमी ही सही सुकूनी रफ़्तार से चल रही थी .पुष्पा और उसके पतिदेव अपने इस आशियाने में लम्बा वैवाहिक सफ़र पूरा कर इतमीनान से रह रहे थे .एकलौता बेटा व् बहू दूर शहर में अपना आशियाना बसाये हुए थे ….पर तेरह दिन पहले की वह कातिल सुबह पुष्पा के पतिदेव को ह्रदय -गति रुक जाने के कारण अंतिम -यात्रा पर ले गयी और पुष्पा के दिल में बस एक सदमा कि ”अब तो जाना ही होगा ” दे गयी . किसी गैर के घर नहीं बल्कि अपने एकलौते बेटे के घर जाना भी पुष्पा के लिए दुखदायी ही था .पतिदेव के जीवित रहते कई बार कहा था पुष्पा ने बेटे के घर चलकर रहने के लिए पर रिटायर्ड बैंक अधिकारी पतिदेव ने हर बार ठुकरा दिया था ये कहकर -” तुम जाना चाहती हो तो जाओ मैं अकेला रह लूँगा !” पुष्पा जानती थी कि पतिदेव का यहीं अपने घर पर रहना स्वाभिमानी होने के साथ-साथ इस घर से जुड़ा मोह भी है .अपने ही बेटे के घर मेहमान बनकर जाने पर जो इज्ज़त बख्शी जाती है वो स्थायी रूप से निवास करने पर ज़िल्लत का रूप ले लेती है फिर अपनी इच्छानुसार जागने ,उठने-बैठने ,खाने-पीने ,घूमने ,बुलाने-जाने की जो आज़ादी यहाँ है वो बेटे के घर कहाँ ! दो दिन भी काटने मुश्किल हो जाते थे उसके घर जब कभी जाकर रहे थे दोनों .बेटे-बहू का भी दोष नहीं उनकी अपनी जीवन -शैली है .यहाँ बरसों पुराने दोस्तों के साथ पुरानी यादों को ज़िंदा कर जीवन के इस अंतिम -पड़ाव का जो आनंद था वो बेटे के घर पर टी.वी. के सामने चिपके रहने में कहाँ !….पर आज …आज तो पुष्पा को जाना ही पड़ेगा ! शरीर में इतना दम नहीं कि अकेले रह पाये और बेटा कब तक यहाँ रुक पायेगा ? …पूरे तेरह दिन नौकरी ,बच्चों की पढाई ,अपना घर छोड़कर तन-मन से पिता की आत्मा की शांति के लिए लगा रहा है बेटा …लेकिन अब एक और दिन रुक पाना सम्भव नहीं ! पोता-पोती धूम मचा रहे हैं …पूरे तेरह दिन बाद वापस अपने घर जा रहे हैं.कितना होम-वर्क करना पड़ेगा -इसकी चिंता भी सता रही है उन्हें ….और पुष्पा है कि बार-बार आँगन में लगे पौधों के पास जाकर मन ही मन माफ़ी मांग रही है …’माफ़ कर देना यदि किसी दिन पडोसी तुम्हे पानी देना भूल जाएँ ..कह दिया है उनसे पर तुम हो तो मेरे और उनके रोपे हुए .तुम ही साक्षी हो हम दोनों पति-पत्नी के आखिरी दिनों की मीठी नोंक-झोंक ,बड़बड़ाने और उखाड़ने के ” ……तभी नज़र पड़ी पुष्पा की कोने में पड़ी झाड़ू पर …” कौन बुहारने आएगा अब आँगन …….दिल करता है यहाँ की सुबह ,दोपहर , शाम और रात सब अपने थैले में भरकर ले जाऊं !”पुष्पा ये सोच ही रही थी कि बेटे ने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा -” चलो माँ …कार में बैठो …देर हो रही है ….अब यहाँ क्या जब पिता जी ही नहीं रहे !” पुष्पा ने कातर दृष्टि से बेटे की ओर देखा . कान में फिर से गूंजा -”अब यहाँ क्या जब पिता जी ही नहीं रहे .” पुष्पा के दिल में आया कहे ”सब कुछ तो है ….यहीं है मेरा सब कुछ ” पर बोल कुछ न पाई .कार में जाकर बैठने से पहले मुड़कर घर को प्रणाम किया -” तेरी दीवारों ,छतों ,आँगन में मेरा जीवन बसंत सा बीता …अब जा रही हूँ …शायद फिर न आ पाऊं तुझे सजाने-संवारने …मुझे याद रखना !” ये सोचते सोचते कार में पिछली सीट पर बैठ गयी पुष्पा . कार स्टार्ट होते ही ज्यूँ ही चली पुष्पा को लगा मानों उसके पतिदेव घर के द्वार पर खड़े हैं और कह रहे हैं -” जाओ पुष्पा …तुम जाना चाहती हो तो जाओ …मैं अकेला रह लूँगा !!” पुष्पा आँखों से ओझल होने तक मुड़-मुड़ कर अपना आशियाना देखती रही और उसे महसूस हुआ मानों पतिदेव के साथ -साथ उसकी तेरहवीं भी आज हो गयी और वो आज अपनी आत्मा यहीं छोड़ अनंत मुक्ति-पथ पर चल पड़ी है .

[जनवाणी के रविवाणी में नौ फरवरी २०१४ अंक में प्रकाशित ]

शिखा कौशिक ‘नूतन’

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