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''दागी कहलाने लगे आज कल रसूख़ वाले ''

Posted On: 9 Mar, 2014 Others में

! अब लिखो बिना डरे !शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

DR. SHIKHA KAUSHIK

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जब से जागा हूँ आज तक सोया ही नहीं !
कैसे कोई ख्वाब देखूं आज तक सोया ही नहीं !
……………………………………………
ग़मों ने साथ निभाया नहीं छोड़ा तन्हा ,
है ऐसा कौन इंसां आज तक रोया ही नहीं !
………………………………………………
उसे मालूम क्या दर्द किसे कहते हैं ,
जिसने अज़ीज़ कोई आज तक खोया ही नहीं !
……………………………………………..
दागी कहलाने लगे आज कल रसूख़ वाले ,
दाग इस चक्कर में आज तक धोया ही नहीं !
………………………………………………..
बनाकर मुंह न यूँ बैठो बबूल देख ‘नूतन’ ,
लगेगा आम कैसे आज तक बोया ही नहीं !

शिखा कौशिक ‘नूतन’

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