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''बसंत का शुभागमन !''

Posted On: 4 Feb, 2014 Others में

! अब लिखो बिना डरे !शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

DR. SHIKHA KAUSHIK

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थी सुप्त कहीं जो चंचलता
अंगड़ाई लेकर जाग उठी ,
सृष्टि के सुन्दर आँगन में
नव-पल्लव वंदनवार सजी !
………………………………………….
श्वेत शीत के वसन त्याग
बासंती वेष किया धारण ,
बांध नुपुर विहग-कलरव
सृष्टि थिरके अ-साधारण !
……………………………………………..
चटकी कलियाँ मटकी सरिता
जन-तन-मन में रोमांच भरा ,
मदमस्त पवन के छूने से
लज्जित स्मित कोमल लतिका !
……………………………………
है हास-विलास उमंग-तरंग ,
निखरा सृष्टि का अंग-अंग ,
निज रूप निहारे सरोवर में
सुन्दरतम बिम्ब का प्रतिबिम्ब !
……………………………………………………..
कामदेव के वाण पांच
चलते प्रतिपल हैं इसी मास ,
प्रेमी-युगलों में मिलन प्यास
करती मधु को अति मधुमास !
………………………………………
नव-पल्लव सम नव आस जगे ,
हरियाये जन-जन का जीवन ,
सन्देश यही लेकर बसंत
हर उर में करता शुभागमन !

शिखा कौशिक ‘नूतन’

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