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यूपी में यूनिफार्म वितरण में धांधली

Posted On: 5 Jul, 2018 Others में

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shivavidyarthi

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 जीएसटी लागू हुये एक वर्ष बीत गये। एक पर्ष पूरे होने पर देश भर मे कई सरकारी और गैर सरकारी कार्यक्रम हो रहे हैं। टी वी चैनलों से लेकर अखबारों एवं अन्य सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियायें जारी है। अभी थोडी देर पहले एबीपी न्यूज चैनल पर जीएसटी के लाभ हानि और परेशानियों के विषय मे चैनल के तमाम शहरों के रिपोर्टर व्यापारियेां से उनकी प्रतिक्रिया ले रहे थे। इसमें पक्ष और विपक्ष में प्रतिक्रिया आ रही थी। पूरे कार्यक्रम को देखने पर लगा कि अक्सर रिपोर्टर व्यापारियेां से ही ज्यादा प्रतिक्रिया ले रहे थे। नागरिक उनके एजेंडें में शायद नहीं था।

गुजरात के कई शहरों के कपडा एवं रेडिमेड के व्यापारियेां एवं लखनउ के व्यापरियेां की अलग अलग तुलना की जाये तो एक बार यह भी आम तौर पर सामने आ रही थी कि इसमें कहीं कहीं व्यापारी भी राजनैतिक रूप से किसी दल विशेष की विचारधारा से प्रभावित नजर आ रहे  थे। गुजरात के कपडा और रेडिमेड व्यापारी जहां जीएसटी से थोडी परेशानी के बावजूद सहमत और जुडते नजर आये तो लखनउ के व्यापारी जीएसटी को परेशानी को कारण बता रहे थे। यहां यह भी खुलकर सामने आया कि व्यापारियेां में वे व्यापारी जाे  जागरूक और शि क्षित थे उन्हें प्रारंभ में भले ही कुछ परेशानियां हुईं लेकिन बाद मे चल कर अब उन्हें कोई परेशानी नहीं हो रही है। वहीं पहले के बिना बिल बुक और कैश बुक एवं कैश मेमों के नकदी बेचने और टैक्स की चोरी करने वाले इसे अभी भी परेशान का सबब बता रहे हैं।

इस विषय में हम एक उदाहरण देकर इसमें परेशानी की बात करने वालों की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में परिषदीय विद्‍यालयों में सरकार की ओर से निःशुल्क युनिफार्म वितरण का काम किया जाता है । इसके तहत छात्रों को २ सेट युनिफार्म प्रति वर्ष दिया जाता है। इसके लिए २०० रूपये प्रति छात्र धन सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है। यह युनिफार्म ग्राम  समूह योजना के अन्तर्गत सिलाई का काम करने वाली संस्थाओं से सिलाई करवा कर बच्चों में युनिफार्म बांटने का प्राविधान किया गया। सरकार की मंशा यह है कि इससे ग्रामीण महिलाओं ‚ स्वयंसेवी संस्थाओं ‚ या कमजोर वर्ग की महिलाओं को रोजगार मिलेगा और उनकी आमदनी बढेगी जिससे वे अपना और अपने परिवार का भरण  पोषण अच्छे ढंग से कर सकेंगीं। लेकिन हो ठीक इसके उल्टा हो रहा है। स्कूलों में जो युनिफार्म बांटा जा रहा है वह रेडिमेंड युनिफार्म होता है। न कि स्वयं सहायत समूहों या समाज के कमजोर वर्ग की महिलाओं द्वारा सिला हुआ। सारा खेल यहीं से शुरू होता है। चूंकि सरकार की मंशा या यूं कहें कि आदेश यह है कि ग्राम सहायता समूह द्वारा ही सिला हुआ युनिफार्म बांटा जाय इसलिए स्पलाई करने वालें दुकानदारों ने इसकी काट निकाल ली और जो बिल प्रस्तुत करते हैं उसमें दो बिल लगाते हैं। एक बिल कपडा खरीद का होता है और दूसरा बिल सिलाई का होता है। इससे होता यह है कि रेडिमेड के रूप में जब युनिफार्म का वितरण दिखाया जाता तो नियमानुसार उस पर टैक्स जो लगभग १२ प्रतिशत होता उसका भुगतान करना होता। और यह भुगतान होने से सरकार के राजस्व में बढोत्ततरी होती। लेकिन दूकान दार दो बिल लगा कर सरकार की मंशा के अनुसार युनिफार्म का वितरण तो दिखा देते हैं लेकिन सरकार को करोडों रूपये के राजस्व की चपत भी लगा जाते हैं। मजे की बात यह है कि यह गोरखधंधा युनिफार्म वितरण की जिम्मेदारी निभाने वाली ग्रा० शिक्षा समिति से जुड़े अधिकारी भी जानते है। लेकिन न जाने क्याें जान बूझ कर आंखे मूंद लेते हैं।

अब आप समझ लिजिए कि इस युनिफार्म के वितरण के लिए प्रति छात्र २०० रूपये प्रति सेट की कीमत को दुकान दार से लेकर अन्य संबंधित व्यक्ति कम बताता है और कपडें की खरीद और सिलाई के मद में बढोत्तरी और मंहगाई का हवाला देकर कीमत बढाने की मांग करता है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ प्रति छात्र प्रति सेट ५० से ६० रूपया ग्राम शिक्षा समितियों एवं प्रधानाचार्याें के बीच की बंदरबांट के वावजूद बांटा जा रहा है। आखिर यह कैसे संभव हो पा रहा है।  जब कि इस संपूर्ण प्रक्रिया में कहीं भी जीएसटी का स्थान नहीं होता। क्यों कि कपडा खरीद और सिलाई की जो प्रक्रिया अपनाई जा रही है उसमें जीएसटी का भुगतान नहीं किया जाता।

इसी प्रकार की कर चोरी करने वाले व्यापारी इस जीएसटी को परेशानी का सबब बता रहे है। वे चाहते हैं कि काम बिना किसी लिखा पढी में हो जैसा कि उनकी आदम बन चुकी है और कहीं भी किसी प्रकार का टैक्स आदि देने का झंझट न हो। समझ में नहीं आता कि जीएसटी आम उपभोक्ता से वसूल किया जाता है और उसमें व्यापारी के पाकेट से एक भी पैसा नहीं जाता फिर व्यापारी इस पैसे का हिसाब रखने और सरकार को वाजिब वसूली गयी राजस्व को उसके खाते में जमा करने से क्यों हिचकते हैंॽ सीधी सी बात है कि उनकी मंशा टैक्स चोरी की होती है। टैक्स तो उपभोक्ता से लेते हैं लेकिन उसे सरकार को जमा न करके अपनी जेब में रख लेते है।

हम यहां उत्तर प्रदेश सरकार से भी यह कहना चाहते हैं कि जिस प्रकार बैग और जूतों काे टेंडर देकर खरीदा जाता है उसी प्रकार से युनिफार्म को भी टेंडर देकर ख्ररीदा जाय और स्कूलों में भेज दिया जाय। इससे जहां एक मुश्त खरीद का हिसाब सप्लाई करने वाली फर्म या संस्था से आसानी से लिया जा सकता है वहीं राजस्व के रूप में उसे करोडो का फायदा भी हो सकता है। और गुणवत्ता भी बनी रहेगी। अगर इसमें कहीं से कोई भी गडबडी मिलती है तो सीधे सीधे संबंधित फर्म् को देाषी ठहराया जा सकता है उससे वूसली भी की जा सकती है। लेकिन न जाने क्यों सरकार एसा कदम नहीं उठा रही है। हां इसके लिए जब जून में सत्र बंद चल रहा होता है। उसी समय यह कदम उठाया जा सकता है।

गत वर्ष स्कूलों में जाडें के दिनों में बच्चों को स्वेटर भी दिया गया था। इसमें ऐसे ही टैक्स की चोरी करने वाले दुकान दारों ने सप्लाई दी थीं स्वेटर जो दिया गया था वह भी रेडिमेड के  आइटम में ही आता है फिर भी किसी सप्लायर ने टैक्स नहीं दिया। क्या सरकार संपूर्ण प्रकरण की जांच करायेगीॽ और टैक्स की चोरी करने वाले ऐसे दुकान दारों के खिलाफ कोई कार्यवाही करेगी जो स्वयं तो राजस्व को चूना लगाते है । और सरकार के कार्यक्रमों और मंशा पर सवाल उठाते हैं और बदनाम करते हैं।

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