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'वो' गीत

Posted On: 13 Apr, 2012 Others में

बावरा मन Just another weblog

shivnathkumar

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(फोटो गूगल से साभार)
(फोटो गूगल से साभार)

पीर की गहराई में
दिल की तन्हाई में
ढूँढते खुद को
खुद की परछाई में
‘वो’ कुछ बोल पड़ा है
हाँ, ‘वो’ जो सोया पड़ा था
कई दिनों से
आज तोड़ मौन
बस रो पड़ा है

मन का आकाश
बादलों से घिरा
शाम पिघल कर आज
दामन में जो गिरा
‘दिये’ ने रौशनी फैलाई है
गुजरता कारवां सामने
‘वो’ कुछ इस तरह से
आँखों में बरस आई है

करवटे बदलती राहों से
स्याह रात की दीवारों से
निकल कर ‘चाँद’
आँगन में बिखरा है
शब्द मूक बह रहे
बह रहा ‘वो’ गीत
और गीत का टुकड़ा है

हाँ, ‘वो’ जो सोया पड़ा था
कई दिनों से
आज तोड़ मौन
बस रो पड़ा है

http://kumarshivnath.blogspot.com

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