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"कहानी जमीं और आसमान की " (वैलेंटाइन कांटेस्ट)

Posted On: 11 Feb, 2014 Others में

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shubhaaruni

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एक दूसरे को हमेशा देखते रहने की चाहत , कभी भी न नजरें हटाने की कवायद लेकिन कभी भी न मिलने का ईश्वरीय आशीर्वाद| तकरार हुई जमी और आसमान के बीच …….कहा जमीं ने कि में तो वही जमी हूँ जो हमेशा ही पददलित है …..सहती रहती कष्ट अपार लेकिन फिर भी नहीं होता कम ये प्यार ,और तुम आसमान, काम हे तुम्हारा सिर्फ ऊँचाइयों से देखना ….क्यूंकि ऊंचाई तुम्हें मिली और में सिर्फ इस भ्रम में कभी तो मिलेंगे, उंचाइयों के साथ साथ तुम्हें तो मिला चाँद तारों का साथ भी ,..और मुझे मिला दिन के समय मुझ पर पड़ने वाला …जलाने वाला सूरज का ताप. ..और जब कभी तुम ये देख कर द्रवित होते हो तो बरसा देते हो मेघ . ..और में वही पागल जमीं जो खिल उठती हूँ कि मुझे मेरे आसमान ने याद किया| अरे ये क्या देखते ही देखते बादलों की श्रंखला न जाने कहाँ से आ गई इस बैरी आकाश पर, और जोड़ दिया जमी को इस बरखा की डोर के माध्यम से अपने आकाश से | क्या आकाश का मन हुआ या फिर वो जमी की दुर्दशा देखकर द्रवित् हुआ | नहीं समझ पा रही है जमीन , कश्मकश की स्थिति है लेकिन एहसास सुखद है |
..लेकिन कितने दिनों के लिए है ये भीगना .फिर टूट जाता है ये बारिश की डोर का बंधन .. .और तुम पहले जेसे ही निष्ठुर . …क्यूंकि तुम्हारे पास है वही नीला नीला अप्रितम सोंदर्य ..चाँद और सितारे भी और में फिर करती रहती हूँ इंतजार मेघों का | माना कि चंद्रमा और असंख्य तारे हैं तुम्हारे पास , लेकिन निशा के दौर के बीत जाने के बाद दिन के उजाले में तुम मुझको ही देखते रहते हो और मुझ पर ही झुके रहते हो |दिन का उजाला ही तो सत्य का प्रतीक है और सत्य ही शाश्वत प्रेम है |मुझे भान है कि सदियां गुज़र गई लेकिन जमीन और आसमान का मिलन कभी न सम्भव हो पाया| लेकिन जो प्रेम दूर रहकर जीने में है , वो पास आने कि प्यास से कई गुना बड़ा है |

शुभा दिवेदी
असिस्टेंट प्रोफेसर
जैव प्रोद्योगिकी विभाग
एस. डी. कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी
मुज़फ्फरनगर, यू. पी.

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