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आओ माँ मै पुनः चिढाऊं

Posted On: 11 May, 2015 Others में

Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'this blog contains the pain of society. different colours of life.feelings and as seen from my own eyes .title ..as Naari..Pagli.. koyala.sukhi roti..ghav bana nasoor..ras-rang etc etc

surendra shukla bhramar5

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आओ माँ मै पुनः चिढाऊं
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मन कहता मै पुनः शिशु बन
माँ के आँचल खेलूँ
कल्पवृक्ष सम माँ ममता संग
गोदी खेले प्रेम का सागर पी लूँ
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मुझे निहारे मुझे दुलारे
तुतला गाये शिशु बन जाए
हो आनंदित हर सुख पाये
माँ को मेरी ‘आँच ‘ न आये
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मुझमे माँ का प्राण बसा है
माँ के प्राण मै वास करूँ
मेरे दुःख से दुखी वो होती
धन्य जननि शत नमन करूँ
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जननी माँ तू जग कल्याणी
शक्ति प्रेम सब में भरती
गुरु माँ तू आलोकित करती
‘पीड़ा’ तम जग की हरती
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कभी खिलाने कभी खोजने
पीछे पीछे मेरे भागी
रुष्ट हुआ वीमार हुआ तो
रात-रात सोची जागी
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क्षुधा हमारी पीड़ा मेरी
जादू जैसे मुझसे पहले तू जाने
भूखी रह तू तृप्त है करती
दुर्गा काली नीलकंठ तू जग जाने
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कभी घटुरुवन कभी खड़ा मै
गिर-गिर उठता सम्हल गया
याद तुम्हारी ऊँगली की माँ
थामे बढ़ा पहाड़ चढ़ा
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शत शत नमन करूँ हे माता
मेरी उम्र तुम्हे लग जाए
करुणा निधान वारें हर खुशियाँ
लेश मात्र दुःख छू ना पाये
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दुःख सुख में माँ ही मुख निकले
‘लोरी’ जीवन झंकृत करती
नहीं ‘उऋण’ माँ जग कुछ कर ले
‘जीवन’ दान जो तू जग करती
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कर-कमलों को सिर पर मेरे
रख देना -देना आशीष
‘सूरज’ चंदा जो ये तेरे
करें उजाला -माँ के साथ
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तेरी ममता का बखान मै
लिखता लिखता तक जाता
सृजती रूप धरे माँ नवधा
रोता-जाता माँ माँ केवल लिख पाता
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रोम-रोम हर कण माँ मेरे
रूप धरे- प्रभु वास करे
सात्विक गन संस्कार ये मेरे
‘नौका’ बन भव पार करे
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सीख मिली जो बचपन माता
गुण गाता ना कभी अघाता
जनम -जनम मै शिशु तू माता
पुनः मिले ये करें विधाता
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दे आशीष सदा दिल तेरे
टुकड़ा-दिल बन रह जाऊं
उऋण भले ना माँ मै तुझसे
‘प्रेम’ तेरा तुझ संग मै बांटूँ
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आओ माँ मै पुनः चिढाऊं
डाँट मार कुछ खाऊं
कान पकड़ फिर ‘राह ‘ मै पाऊँ
ना भटकूँ आँचल छाँव में सो जाऊं
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सुरेन्द्र कुमार शुक्ल भ्रमर ५
मातृ दिवस पर
८-८.२० मध्याह्न १०-मई -२०१५
कुल्लू हिमाचल प्रदेश भारत

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