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बेहया -'बेशरम'

Posted On: 12 Feb, 2015 Others में

Bhramar ka 'Dard' aur 'Darpan'this blog contains the pain of society. different colours of life.feelings and as seen from my own eyes .title ..as Naari..Pagli.. koyala.sukhi roti..ghav bana nasoor..ras-rang etc etc

surendra shukla bhramar5

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बेहया -‘बेशरम’

वो आये यहाँ

हमने धरती दिया

खुला आसमान

सींचा सहारा दिया

खाली जमीन !!

तालाब- बंजर पटते गए

उनमे हरियाली

खिलते गए -‘फूल’ !

बिना गंध- महक के

बिना काँटों के

नागफनी – कैक्टस वे बनते गए

चुभते गए – बढ़ते गए

फैलते गए – यहाँ – वहां

जहाँ – तहां

अन्दर – अन्दर जड़ें

‘बेहया’ – ‘बेशरम’ –

भी कह डाला हमने उन्हें

काहे की शरम ! –

धोकर पी डाले लगता है !!

‘कील’ से चुभे छाती में

चूसते ‘पानी’-हरे होते जा रहे

और हम -‘बंजर’-धूल !!

दुनिया भर की संस्थाएं – कुकुरमुत्ते सी –

कुछ फैलती- ‘उनसी’

साथ जो उनके –

झंडा ले आड़े आते

हरियाली मत काटो –

मत छांटो ‘शाख’

बिना कांटे के ये गड़ते-बढ़ते

लाभ लेते -सोखते

हमारी उपजाऊ जमीन का

धंसे जा रहे !!

जब तक हमारे यहाँ

हया- ‘पानी’ -शरम –

बाकी है !!

बेहया ये बेशरम !!

काटो तो लग जाएँ बिना पानी के

जलाओ तो ‘विष’ उगलें

धुवाँ भरा – ‘हानि’ से

चक्कर आता अब हमें

आँखें धुंधला गयीं

न लकड़ी न फूल

पल पल अब गड़ें

जैसे हैं शूल !!

लगता हैं ‘नया’ –‘बड़ा’

पाल लिया -‘रोग’

अब जिसे मिटाने में -अक्षम -बेकार !!

भाई -भतीजा-है -मेरी सरकार !!

नहीं कोई साथ –

टोटका न जोग

कोई मंत्र न मूल !!

क्या लाया – लगाया

क्या कर डाली -“भूल”. !!

सुरेन्द्रशुक्लभ्रमर५

24.03.2011

दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

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