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एक आम हिन्दू की एक आम मुसलमान से सरेआम गुफ़्तगू

Posted On: 27 May, 2014 Others में

PAHAL - An Initiative by Shyam Dev MishraJust stepped out... to explore the opportunities..

shyamdevmishra

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मेरे एक मुसलमान दोस्त Syed Salman Arfi ने अपनी एक पोस्ट पर मेरे कमेंट के जवाब में कहा, कि मेरी सोच की हद मोदी तक है। बात यहाँ एक इंसान के तौर पर मेरी सोच की नहीं, एक हिन्दू के तौर पर मेरी सोच की थी, इसलिए मेरे वो मुस्लिम मित्र मुझपर ये तोहमत कर पाये, वरना एक इंसान के तौर पर वो मुझे अच्छा भले न सही, पर ठीक-ठाक आदमी तो मानते होंगे, इसका यकीन है। पर आज जरुरी लगा कि एक इंसान ही नहीं, एक हिन्दू के तौर पर भी मेरी जो सोच है, उसे जाहिर किया जाये ताकि कुछ लोगो के ज़ेहन के अँधेरे तो दूर हो सकें, कुछ दिलों की दूरियाँ तो मिट सकें।

मेरी या किसी पढ़े-लिखे इन्सान की सोच की हद मोदी, मुलायम, मनमोहन, राहुल, सोनिया या फिर अटल बिहारी बाजपेयी नहीं हो सकते। इंसान हालात के मुताबिक एक बेहतर विकल्प चुनता है, उसे अपनाता है, वो भी आजमाने के लिए और इस आज़माईश पर खरा उतरने पर ही कोई किसी का समर्थन आगे भी जारी रखता है, वरना कोई सियासतदान हमें-आपको कोई पगार नहीं देता। बिहार में लालू यादव या पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु का एक समय ज़बरदस्त जलवा था, पर उनके समर्थकों की दुनिया उन तक ही सीमित नहीं थी, वरना उम्मीदों पर खरा न उतरने पर वे उन्ही नेताओं को धूल न चटा देते।

अपना अपना नजरिया है, एक तरफ तो आप खुद फरमाते हैं कि इन साहब (बात आज़म खान की हो रही थी) ने अपनी कौम की बेहतरी के लिए बहुत काम किये, पर जरा ये तो बताइये कि सबकी बेहतरी के काम करने में क्या खराबी है? हमेशा मुसलमान-मुसलमान चिल्लाने की बजाय विकास की ऐसी योजनाएं क्यों नहीं बनाते-चलाते जिसमे समाज का हर तबका, जिसमे मुसलमान भी हैं, लाभान्वित हो? हमेशा औरों से बाँटकर, अलग से मुसलमानों की बात करना ही एक दरार पैदा करता है जिसे आज के सियासी हालात में वो हर शख्श करना जरुरी समझता है, जो मुसलमानों के वोट के लिए उनका रहनुमा बनने की ख्वाहिश रखता है। मुसलमान की बात कर-कर के ही ये हालात पैदा किये जाते हैं। क्यों सबकी बात नहीं की जाती, क्यों मुसलमानों को सबके बराबर, सबके जैसा, सबमे से एक नहीं माना जाता। और बुरा न मानियेगा, सबसे अलग रहने की जुगत में, भले ही वो अपनी बेहतरी की उम्मीद में, अपना वजूद बचाये रखने की उम्मीद में, मुसलमानों का एक अच्छा-खासा तबका इस सियासी सोच के साथ खड़ा होता आया है, स्ट्रेटेजिक वोटिंग के बारे में सब जानते हैं। पर एक बात कहूँगा, ऐसे में चाहे मुसलमान सबसे पीछे छूट जाये, चाहे सबसे आगे बढ़ जाये, रहेगा सबसे अलग ही! साथ रहने का, एक रहने का इकलौता तरीका सब में शामिल रहना ही है। हैं देश के मुसलमान इस के लिए तैयार?

देश के ज्यादातर हिन्दुओं का मिज़ाज ऐसा है कि वो ऐसे किसी भी आदमी का समर्थन नहीं करेंगे, जो देश का प्रधानमंत्री बनना चाहता हो और यह भरोसा दिलाता फिरे कि वह हिन्दुओं को प्राथमिकता देगा। ऐसा कहने की हिम्मत अगर किसी ने नहीं की तो इसका कारण है कि देश के सियासतदान भी जानते हैं कि इस अलगाव और दरार पैदा करने वाले तरीके का साथ ज्यादातर खुद हिन्दू नहीं देने वाले। पर मुसलमानों को आम समाज से काटकर ऐसा बना दिया गया है कि वह अपनी सुरक्षा की फ़िराक में तो कभी ज्यादा तवज्जो मिलने की आस में हर उस नेता को सर-माथे बिठाते आये हैं जो उन्हें तरजीह देने की बात करता है, आज़म-मुलायम को मिलने वाला मुस्लिम-समर्थन इसको ही साबित करता है। खुद आपने अपनी पोस्ट में मुसलमानों के लिए काम करने की बिना पर ही तो आज़म खान को मसीहा बताया है, अगर ये अपने कामों से केवल मुसलमानों के नहीं, सबके मसीहा बन जाते तो किसका नुकसान होता? किसी का नहीं, हाँ, सबका फायदा जरूर होता। लेकिन ये भी सच है कि केवल हिन्दू-हितों की बात करने वाले किसी नेता को कुछ धर्मांधों के वोट भले मिल जाये पर ऐसी सोच, ऐसी सियासत, ऐसे नेता को तमामों-तमाम आम हिन्दू बढ़ावा नहीं दे सकते, उसे मसीहा मानना तो संभव ही नहीं। खुद मेरा परिवार राजीव गांधी के ज़माने तक कांग्रेस का समर्थक था। फिर मेरा परिवार राजनैतिक परिदृश्य के धुंधले हो जाने पर लगभग उदासीन हो गया। फिर काफी उम्मीदें अटल बिहारी बाजपेयी के ज़माने में जगीं, फिर कांग्रेस ने निराशा दी, आज मोदी से उम्मीद है। मुलायम वगैरह तो राजनैतिक गुंडे-से हैं, इनसे तो न उम्मीद थी, न हो पायेगी। पर कभी नफरतों में नहीं बहे हम।

सबसे जुदा होकर तरक्की चाहने पर, आप तरक्की भले कर लें, पर उस तरक्की के बावजूद आप यह शिकायत करने के हकदार नहीं रह जायेंगे कि सब आपको अपने में शामिल, अपने जैसा नहीं मानते। सियासी बिसात के पन्ने पर हाशिये पर जाते, पर दिलों में इंसानी जज़्बात और एहसास समेटे ज्यादातर हिन्दू ऐसा ही सोचते होंगे, काम से काम मुझे तो ऐसा ही लगता है। अपनी उदार धार्मिकता के कारण हिन्दू आजतक वोट-बैंक नहीं बने, इसका मुझे अफ़सोस नहीं, पर इतना जरूर याद रखिये, कि आपके वोट से जीता कोई नेता आपका मसीहा भले बन जाये, आपका पडोसी नहीं बन सकता, इस भूमिका में हमें और आपको ही रहना है। और जब साथ रहना चाहे ख्वाहिश हो या मज़बूरी, पर हक़ीक़त हो तो एक होकर रहना ही सबसे बेहतर नहीं होगा क्या?

और रही बात आतंकवाद की, तो वो चाहे हरा हो या भगवा, है आतंकवाद ही, और निंदनीय है। अब ये मत कहियेगा कि गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराँचल, बिहार, झारखण्ड, गोवा, राजस्थान, पंजाब, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भाजपा को जितानेवाली जनता भी आतंकी या फिर आतंकियों की समर्थक है और इन राज्यों में हिन्दुओं के अलावा कोई और अल्पसंख्यक कौम नहीं रह सकती। मेरे अच्छे दोस्तों में कई मुस्लिम हैं, कई सिंधी हैं, कई पंजाबी हैं, और कुछ क्रिश्चियन भी हैं, पर हमारे बीच धर्म आड़े नहीं आता। अगर आज मैं मोदी को बेहतर विकल्प मानता हूँ तो यह किसी कट्टरपंथ या आतंकवाद का समर्थन नहीं हो सकता जो किसी और धर्मावलम्बी के लिए खतरा बन जाये। हिन्दू धर्म में “काफ़िर” की नहीं, “वसुधैव कुटुम्बकम” की अवधारणा है। गुजरात में मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों के किस्से घर बैठे मत सुनिए-सुनाइए, मैंने देखा है गुजरात, रहा हूँ गुजरात में दो साल, घूमा हूँ सूरत, अहमदाबाद, बड़ोदा, राजकोट और गुजरात के तमाम इलाकों में, इसलिए कहता हूँ, एक बार गुजरात के आम मुसलमानो से (सियासी नामों से परहेज करें तो सच ज्यादा साफ़ दिखेगा) मालूमात कीजिये, या वहाँ जाकर उनके हालात, उनके साथ सबका बर्ताव, उनकी भागीदारी देखिये। आज भी अहमदाबाद ही नहीं, गुजरात के हर हिस्से में मुस्लमान रह रहे हैं, रोजगार-धंधे में लगे हैं, खुश, संपन्न, सुरक्षित, ठीक वैसे ही जैसे बाकि सब, क्यूंकि वे खुद हकीकत का हिस्सा है, नफ़रत का मनगढंत किस्सा नहीं!

आपको अगर वही बातें दोहरानी हैं तो बात अलग है, वरना मज़हब की छतरी से निकलकर इंसानियत के खुले आसमान तले आइये, बात किसी के अपना मज़हब छोड़ने की नहीं हो रही, जब हम किसी हालत में अपना नहीं छोड़ सकते तो आपसे भला कैसे उम्मीद कर सकते हैं?? पर हमेशा मुसलमान के तौर पे खुद को या तो आक्रामक दिखाना या मज़लूम दिखाना हमें आगे नहीं, पीछे ही, उन्ही अंधेरों में ले जायेगा, जिनमे हमने अपना काला कल देखा है। देश में केवल महाराष्ट्र, गुजरात 2002 या मुज़फ्फरनगर में ही दंगे नहीं हुए। और इनमे जो इंसानी खून बहा, उसे मुसलमानी खून कहना ही किसी हल से दूर जाना है न कि हल की ओर जाना। देश में और भी तमाम दंगे हुए है, उनका दर्द भी उतना ही होना चाहिए। मैं किसी एक या चुनिंदा दंगों का रोना नहीं रोता, मेरी निगाह में हर दंगा निंदनीय है। ऐसा नहीं कि मुझे वो दंगे याद नहीं जिनमे ज्यादातर हिन्दू मारे गए, पर केवल उन्ही दंगों पर मातम की इजाजत कम से कम मेरा मज़हब, मेरा ज़मीर, मेरी इंसानियत नहीं देती। अब किसी दंगे की आलोचना इसलिए तो नहीं की जानी चाहिए क्योंकि उसमे मुस्लिम ज्यादा मारे गए और किसी दंगे को यह कहकर अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए क्यूंकि उसमे बहुसंख्यक ज्यादा मारे गए। वैसे गुजरात के दंगो को मुस्लिमो का जीनोसाइड कोई क्या यह जानकर भी कहेगा कि कुल मरे 1267 लोगो में 30% बहुसंख्यक समुदाय के थे।

रही बात धमकाने की तो, केवल तोगड़िया जैसों की बात करना भी एकतरफा बात है। जब मैं तोगड़िया को अनदेखा करता हूँ तो ओवैसी और इमरान मसूद का भी ज़िक्र नहीं करता। ऐसे लोग कहीं भी हों, कम से कम किसी कौम का आदर्श या फिर उसकी सीरत का पैमाना नहीं बन सकते हैं, इनको अगर हिन्दू या मुसलमान का नुमाइंदा मन गया तो अमनबहाली की बात करना ही बेवकूफी होगी। आपकी जानकारी के लिए 1967 से अबतक के दंगो का, जिनमे 100 से ज्यादा जानें गई, एक छोटा सा आंकड़ा कही से उठाकर दे रहा हूँ, इन 17 दंगों में से 9 कांग्रेस/सहयोगियों के शासनकाल में, 3 राष्ट्रपति शासनकाल में और 4 भाजपा शासन में हुए, पर किस दंगे में किस मज़हब के कितने मारे गए, इसका हिसाब नहीं लगाया जाना चाहिए। और मोदी आकर ये करेगा, वो करेगा, कहने और मानने वालों को कम से काम 2002 से 2014 तक गुजरात में जो हुआ, उस से आँखे नहीं फेरनी चाहिए।

रही बात लीडर चुनने की तो कोई माने या न माने, मोदी का नाम आज दंगो से ज्यादा विकास और प्रशासन के लिए जाना जाता है, केवल हिंदुस्तान ही नहीं, बाहर भी, और अगर उनकी लोकप्रियता के कारण, अपने घर की तमाम अंतर्कलह के बावजूद भाजपा उन्हें प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करती है तो यह स्वाभाविक है, आखिर आज हर चुनावी सर्वेक्षण में मोदी को सबसे ज्यादा लोकप्रिय बताया जा रहा है. पर इतना भी ध्यान दें, कि चुनाव में मिलने वाला पावर महज़ 5 साल का होता है और अगर कोई निरंकुश होता भी है, तो उसकी नकेल हमारे-आपके ही हाथो रहनी है, इंदिरा गांधी तक को इस जनता ने अर्श और फ़र्श, दोनों दिखाएँ है, मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश में है भाजपा, राजा नहीं!

इसलिए सियासत की इस बिसात पे किसी कौम या मज़हब का दाँव लगाने से बचिए, वर्ना जीतना किसको है ये भी तय है, हारना किसको है, ये भी तय है। गलत मतलब न निकालिएगा, साफ़ करना चाहूँगा, कि फायदा सियासतदानों का ही होगा, नुकसान हमारा-आपका ही होना है। नतीजा यही होगा कि जिनको (नेता) लड़ना चाहिए, वो एक दूसरे के साथ संसद में बैठेंगे और जिनको (जनता) साथ बैठना है, सड़कों पर लड़ेंगे ! कब तक?? आख़िर कब तक ??

आखिर में एक दुआ करूँगा कि एक बार मोदी को सत्ता मिले और उनके बारे में फैला भ्रम हमेशा के लिए दूर हो जाये, चाहे वो भ्रम मेरा हो या आपका! जिस दिन मोदी ने सबको समान मानने की बजाय किसी एक को सर चढ़ाया, उस दिन किसी और बेहतर रहनुमा की तलाश मैं भी शुरू कर दूंगा…फिलहाल तो यह समझ में नहीं आता कि एक ही तराजू पर तौले जाने से आपको इतना परहेज क्यों है ?

श्याम देव मिश्रा
मुम्बई
20 अप्रैल 2014

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