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क्या संघर्ष भी कभी सुखद होता है? क्या कोई इसी आशा में था? Date 9 july2013

Posted On: 31 Jul, 2013 Others में

PAHAL - An Initiative by Shyam Dev MishraJust stepped out... to explore the opportunities..

shyamdevmishra

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यह पोस्ट केवल उन चुनिन्दा लोगो के लिए हैं जो खास हैं, खुद को संघर्षशील मानते हैं, संघर्ष को कठिन मानते हैं, कठिनाई के किसी भी रूप में आने से विचलित नहीं होते बल्कि उसका डटकर सामना करते हैं। बाकियों के लिए बस इतना कहूँगा कि इन 72825 पदों के अलावा और भी नौकरियां हैं, जिनकी हिम्मत इस संघर्ष में जवाब दे गई है, वे उनके लिए प्रयास करें और अपने परिजनों-प्रियजनों के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करें।

पर जिन्हें अपने हक़ का भरोसा है, अपनी मजबूती पर भरोसा है, लड़कर अपना हक़ लेने का जज्बा है और इस लड़ाई की बड़ी से बड़ी बाधा पार कर जाने का इरादा है, वे लड़ रहे हैं, आगे भी लड़ेंगे और जीतेंगे भी। संभव हुआ तो इलाहाबाद में, अन्यथा सर्वोच्च न्यायालय में, आज नहीं तो कल, पर जीतेंगे जरूर!!

कल खंडपीठ में जो हुआ, अप्रत्याशित हुआ, पर कोई अनहोनी नहीं। हालिया घटनाक्रम से लोग सकते में इसलिए भी हैं क्यूंकि पहले लार्जर बेंच के निर्णय की लम्बी प्रतीक्षा और फिर जून की छुट्टियों में उबाऊ इंतज़ार के बाद, यानि अपने मामले की 12 मार्च को खंडपीठ में हुई सुनवाई के बात अब जाकर 8 जुलाई को अपने केस की सुनवाई का नुम्बर आया, और मिला क्या, “सभी सम्बद्ध अपीलें किसी अन्य बेंच में सुनवाई के लिए अगली कॉज-लिस्ट में सूचीबद्ध की जाएँ!” का वन-लाइनर आर्डर!

निश्चित रूप से तो नहीं कह सकता, पर अपने मामले को अन्य किसी बेंच को भेजे जाने के कई कारण हो सकते हैं। हो सकता है कि पहले उन्होंने मामले को किसी भूलवश या जानबूझकर अपने पास रखा हो और बाद में इसे गलत, मुश्किल या अव्यवहारिक मानकर अन्य बेंच को भेजने का आदेश दिया हो। जज भी एक आम इंसान है, जो गलतियाँ करता है, उसे सुधारता है, एक विचार बनाता है और सही न लगने पर उसे बदलकर नया विचार बनाता है, अपनी बची हुई छुट्टियाँ लेना चाहता है, उतने उतने ही काम हाथ में रखना चाहता है जितने सेवा-निवृत्ति के पूर्व आसानी से संपन्न हो जाएँ, नहीं चाहता कि कोई ऐसा काम हाथ में रह जाये जिसकी औपचारिकता पूरी करने के लिए उसे सेवा- निवृत्ति के अंतिम क्षण तक या उसके बाद भी कार्यालय में बैठना पड़े। इस तरह के मामलों में अगर मौजूदा पीठ ही सुनवाई करती तो आर्डर भी उसे ही लिखवाना पड़ता और निश्चित रूप से वरिष्ठ होने के कारण निर्णय लिखवाने के दुरूह, समयसाध्य और गंभीर कार्य में हरकौली जी को ही समय देना पड़ता, जो शायद आसन्न सेवा-निवृत्ति के मद्देनज़र, संभवतः उनके लिए मुश्किल हो। जो साथी पीठ-परिवर्तन को एक षड़यंत्र मानकर आशंकित हैं, वो भी समझ चुके होंगे कि उनकी आशंका सही होने की स्थिति में भी आपकी जीत केवल विलंबित हो सकती है, हार नहीं बन सकती।

इस मामले में तो जीत की पटकथा 4 फ़रवरी को ही जस्टिस हरकौली और जस्टिस मिश्रा ने लिख दी थी। अपने आदेशों में उन्होंने “प्रशिक्षु शिक्षक” पदनाम के आधार पर, चयन के आधार में सुधार के लिए किये संशोधन के प्रभाव से और तथाकथित धांधली के प्रभाव को कम करने के लिए भर्ती को रद्द करने के सरकार के अबतक निर्णय, यानि मामले के सभी पहलुओं को न सिर्फ उठाया, बल्कि तार्किक और विधिसम्मत आधारों पर उनकी समीक्षा करते हुए स्पष्ट रूप से उन्हें औचित्यहीन और गलत ठहराया। अपने निष्कर्षों और निर्णय की वैधता और सत्यता पर खंडपीठ को इस सीमा तक विश्वास था कि सरकार द्वारा बदले यानि गुणांक-आधार वाले नए विज्ञापन के अनुसार शुरू हो रही काउन्सलिंग को यह कहकर रोक दिया कि अपीलकर्ताओं की अपील स्वीकार होने की स्थिति में यह एक निरर्थक प्रक्रिया भर रह जाएगी। तथाकथित धांधलीबाजों को बाहर निकाले जाने की सम्भावना तलाशे जाने की मंशा से खंडपीठ द्वारा बार-बार मौका दिए जाने भी सरकार ने जो और जैसे सबूत पेश किये, खंडपीठ ने उन्हें विचार-योग्य ही स्वीकार नहीं किया। केवल नॉन-टेट अभ्यर्थियों के भर्ती के लिए अयोग्य होने के लार्जर बेंच के औपचारिक आदेश की प्रतीक्षा में रोका गया निर्णय आना बाकी था, और अब भी वही बाकी है।

एक बात स्पष्ट कर दूँ कि मामला अन्य किसी बेंच को ट्रान्सफर हो रहा है आगे की सुनवाई/कार्यवाही के लिए, न कि अबतक की कार्यवाही के रिव्यु/समीक्षा के लिए! जो भी खंडपीठ मामले को देखेगी, वह अबतक की कार्यवाही और अबतक के निष्कर्षों के आधार पर आगे सुनवाई/निर्णय करेगी। क्या किसी को ऐसा लगता है कि नई बेंच मामले को हाथ में लेते ही कहेगी कि अबतक खंडपीठ द्वारा निकाले गए सभी निष्कर्ष गलत हैं और हम स्टे हटाते हैं? ऐसा ख्वाब तो कोई दीवाना अकादमिक समर्थक भी नहीं देखता। सबसे ज्यादा संतोषजनक बात ये है कि वृहत दृष्टिकोण वाले खंडपीठ के अबतक के आदेश औरन्यायसम्मत निष्कर्ष, सिर्फ जुबानी जमा-खर्च नहीं, लिपिबद्ध न्यायिक दस्तावेज है, और इन्हें अनदेखा करना या इनके विरुद्ध जाना, हमारे , आपके और सरकार तो क्या, खुद न्यायाधीशों के लिए भी भारी पड़ जायेगा। “कैसे?” अब ये न पूछिए!! यह पूछने-बताने नहीं, करने-देखने की बात है। वैसे इसकी नौबत न ही आये तो सबके लिए अच्छा!!

चलते-चलते इतना और बता दूँ कि इलाहाबाद में आपके साथी निराशा से दूर, बुलंद इरादों के साथ इस केस की औपचारिकतायें लगभग पूरी करवा चुके हैं और आने वाले दो-एक दिनों में बेंच नॉमिनेट हो जाएगी जहां अपना केस प्राथमिकता के आधार पर, यानी “अनलिस्टेड केस” के तौर पर सुना जायेगा, फ्रेश केस के तुरंत बाद।

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