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वोट-बैंक की घटिया राजनीति के शिकार न बनकर रह जाएँ नौकरी की आस में बैठे शिक्षामित्र!!

Posted On: 22 Apr, 2013 Others में

PAHAL - An Initiative by Shyam Dev MishraJust stepped out... to explore the opportunities..

shyamdevmishra

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उत्तर प्रदेश सरकार ने प्राथमिक विद्यालयों में नियमित शिक्षकों की कमी से निपटने के लिए शिक्षामित्र योजना प्रारंभ की और स्थानीय युवाओं को सामुदायिक सेवा के रूप 11 माह के नवीनीकरणीय अनुबंध के आधार पर विद्यालयों में तैनाती दी। ग्राम-शिक्षा समिति स्तर तथा न्याय-पंचायत स्तर पर इनके चयन में अपनाये गए मापदंड, आधार, प्रक्रिया और पारदर्शिता की तो बात छोड़िये, सरकारी सेवाओं में चयन के क्रम में अनिवार्य रूप से दिए जाने वाले आरक्षण तक को अनदेखा किया गया और देखा जाये तो इसमें कुछ गलत भी नहीं था, आखिर शिक्षामित्रों के अनुबंध के उपबंधों के अनुसार उनके द्वारा दी जाने वाली सेवाएँ किसी भी प्रकार से नियमित एवं रोजगार-परक नियोजन के अंतर्गत नहीं थीं बल्कि विशुद्ध रूप से नियमित मानदेय के बदले अल्प-अवधि के लिए एक नवीनीकरणीय अनुबंध के अंतर्गत दी जानेवाली सामुदायिक सेवा भर थीं। इनके अनुबंध-पत्र में इन बातों के अतिरिक्त यह भी स्पष्ट था कि ये न स्वयं को कभी राज्य सरकार का कर्मचारी समझेंगे और न ही कभी सेवायोजन यानि नौकरी का दावा पेश करेंगे।

NCTE की उपरोक्त शर्तों और शिक्षामित्रों की वस्तुस्थिति को ध्यान में रखते हुए विचार करने पर तो ऐसा लगता है जैसे राज्य सरकार द्वारा इनके प्रशिक्षण की अनुमति मांगते समय NCTE को इनकी एक अध्यापक या संविदा पर तैनात कर्मी के रूप में इनके प्रस्थिति (Status), प्रशिक्षण हेतु इनके चयन की प्रक्रिया और उसमे आरक्षण-सम्बन्धी प्रावधानों की अनदेखी के बारे में अँधेरे में रक्खा गया था। देखना होगा कि क्या NCTE एक अल्प-अवधि के अनुबंध पर दी गई गैर-रोजगार-परक सामुदायिक सेवा को दो-वर्ष सरकारी या मान्यता-प्राप्त विद्यालय में अध्यापन के तौर पर मान्यता देती है?

साथ ही राज्य सरकार ने उक्त प्रशिक्षण में प्रवेश के सम्बन्ध में NCTE के निर्देश की अवहेलना करते हुए न तो इस प्रशिक्षण में प्रवेश हेतु चयन के लिए न तो कोई उपयुक्त प्रक्रिया निर्धारित की और न ही इस प्रशिक्षण हेतु अभ्यर्थियों के लिए प्रभावी आरक्षण-सम्बन्धी प्रावधानों के अनुसार अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/शारीरिक निःशक्त/स्वतंत्रता-सेनानी आश्रित/भूतपूर्व सैनिक आदि श्रेणियों के लिए आरक्षण प्रदान किया। इन सभी तथ्यों के NCTE के संज्ञान में आने के बाद इनके प्रशिक्षण की वैधता कितनी प्रभावित होती है, यह लाख टके का सवाल है।

Iइन्ही बिन्दुओं के आधार पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने इस प्रशिक्षण के विरुद्ध दायर याचिका की सुनवाई करते हुए इसपर स्थगनादेश जारी कर दिया था जिसे राज्य सरकार द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका की सुनवाई करते समय खंडपीठ ने यह कहते हुए हटाया था कि इस प्रशिक्षण की वैधता इस मामले के अंतिम निर्णय से निर्धारित होगी। मामला अबतक विचाराधीन है और ऊँट कभी भी, किसी भी करवट बैठ सकता है।

राज्य सरकार अगर वाकई में इन्हें नौकरी देने के प्रति गंभीर होती तो शिक्षामित्रों के दो-वर्षीय प्रशिक्षण में नामांकित होते ही 2012 में 1 या 2 TET कराती और NCTE की TET Guidelines का लाभ उठाकर इनके अध्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम में नामांकित होने को आधार बनाकर इन्हें उसमे सम्मिलित होने देती, तो शायद अबतक प्रशिक्षणरत लगभग सभी शिक्षामित्र TET उत्तीर्ण कर चुके होते और बचेखुचे 2013 में तर जाते। अब ये न कहियेगा कि सरकार इतनी भोली थी कि उसे TET की अनिवार्यता या प्रशिक्षण की वैधता पर उठे सवाल की वास्तविकता पता नहीं थी। जो सरकार खुद ही एक मखौल समझकर महज इन्हें शांत रखने के लिए बार-बार पुचकारती-भर नज़र आती है, शायद उसे भी प्रशिक्षण की वैधता को लेकर प्रतीक्षित उच्च न्यायालय के निर्णय और अपनी मंशा, दोनों का बखूबी अंदाज़ा है।

जहां तक मुझे ज्ञात हुआ है, 2011 के सत्र से ही शिक्षामित्रों के अनुबंध का नवीनीकरण किया जाना बंद कर दिया गया है और बिना अनुबंध के शिक्षामित्रों से किस आधार पर और किस हैसियत से काम लिया जा रहा है, इसका जवाब अभी आना बाकी है। आनेवाले दिनों में अगर कुछ नौकरशाहों पर “अनुबंध समाप्ति के बाद भी शिक्षामित्रों के मानदेय भुगतान के जरिये सरकारी खजाने में सेंध लगाने” के लिए मुकदमा चले तो ज्यादा आश्चर्य नहीं होगा।

बेहतर होगा कि केवल सरकार के आधार-हीन वायदों पर अँधा भरोसा करने के बजाय शिक्षामित्र अब सरकार से इस सम्बन्ध में दो-टूक जवाब मांगे, ताकि वे वास्तविकता से अवगत होकर समय रहते उचित निर्णय ले सकें। सरकारी फर्जीवाड़े और खोखली बयानबाज़ी के सहारे आप किसी को कुछ दिन बरगला सकते हैं पर प्रदेश में दसियों सालों से नौकरी की आस में बैठे लाखों शिक्षित बेरोजगारों, जिनमे भारी संख्या में TET-उत्तीर्ण बी०एड० उपाधि-धारक भी हैं, की फ़ौज अपने हक़ पे खुले-आम डाका पड़ते देखते रहेंगे, इसकी अपेक्षा कतई नहीं कर सकते, वह भी तब जब उनके साथी सरकार से एक यादगार लड़ाई जीतने के कगार पर हैं और उनकी अपनी जिन्दगी में अपनी मौजूदा डिग्री के आधार पर PRT की नौकरी मिलने की आखिरी तारीख में साल-भर से भी कम समय बचा हो!

एक बात और, शिक्षामित्रों को सरकार ने जिस मिटटी के जहाज में बिठा रखा है, उसका TET की अनिवार्यता से छूट की अपनी मनचाही मंजिल तक पहुचने के इरादे से कोर्ट के समंदर में उतरते ही खुद-ब-खुद घुल जाना तय है। इनके द्वारा उठाये जाने वाले TET से मुक्ति के सवाल पर आने के पहले ही न्यायालय उनकी वर्तमान में अनुबंध-हीन प्रस्थिति, मापदंड-विहीन, खुली-प्रतिस्पर्धा-रहित चयन-प्रक्रिया और आरक्षण के प्रावधानों की खुली अनदेखी के कारण यदि इनके प्रशिक्षण-कार्यक्रम को ही सिरे से खारिज कर दे तो यह अप्रत्याशित नहीं होगा।

अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी किये जाने की मांग से जुड़े तमाम मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णयों में कई बार अस्थायी कर्मियों के नियमितीकरण को “खुली प्रतिस्पर्धा के आधार पर नौकरी पाने के हर योग्य व्यक्ति के अधिकार का हनन” बताया है और राज्य से एक आदर्श नियोजक नियोजक के उत्तरदायित्व को निभाते हुए सार्वजनिक क्षेत्र के सेवायोजन में अनुच्छेद 14 एवं 16 के अनुपालन को सुनिश्चित करते हुए खुली प्रतिस्पर्धा के आधार पर चयन की अपेक्षा की है। ऐसे में शिक्षामित्रों के सुप्रीम कोर्ट जाने पर उनकी बचीखुची लुटिया डुबोने प्रदेश के लगभग 2 लाख TET-उत्तीर्ण बी०एड०-डिग्री धारक उनके मामले में अगर थर्ड पार्टी बनकर पहुच जाएँ तो शायद यह कहानी जल्द ख़त्म हो जाये।

वैसे भी NCTE की 10 सितम्बर 2012 की अधिसूचना के अनुसार 31 मार्च 2014 तक कक्षा 1 से 5 के अध्यापक के तौर पर नियुक्ति के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित होने वाली अध्यापक पात्रता परीक्षा औरउक्त तिथि तक ही इन कक्षाओं के अध्यापक के रूप में नियुक्ति के अर्ह बी०एड०-डिग्री धारक राज्य सरकार द्वारा आगामी अध्यापक पात्रता परीक्षा में सम्मिलित होने से मनमाने तरीके से वंचित किये जाने पर इस प्रक्रिया को अदालत में घसीटने ही वाले हैं, शिक्षामित्रों की याचिका में दखलंदाज़ी वो नहीं करेंगे, इसके आसार नगण्य हैं, आखिर बीमार तो ये एक ही अनार के लिए हैं।

खैर, अपने दिए मत का मूल्य तो अभी 3 – 4 साल चुकाना ही पड़ेगा, जनता की दुश्वारियों की कीमत पर भी घटिया राजनैतिक तिकड़मबाजियों का यह खेल इतने समय तक तो अनवरत चलने ही वाला है, ईश्वर पहले तो हम सबको सदबुद्धि दे, और जो लेने से इंकार करे, उसे सहनशीलता!!!

डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन के सन्दर्भ में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् द्वारा निर्धारित कुछ महत्वपूर्ण शर्तें तथा (2) केंद्र सरकार की अधिसूचना का अंश 10.09.2012
डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन के सन्दर्भ में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् द्वारा निर्धारित कुछ महत्वपूर्ण शर्तें तथा (2) केंद्र सरकार की अधिसूचना का अंश 10.09.2012

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