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'५ जून-विश्व पर्यावरण दिवस' प्रकृति की गोद में खेलकर, लोट-पोट कर हम बड़े होते है लेकिन ...?

Posted On: 1 Jun, 2010 Others में

Proud To Be An IndianTruth, Truth & Truth ... (अब तक की ज़िन्दगी को जी कर यही समझ आया है कि ज़िन्दगी सच में एक सफ़र ही है...)

Tufail A. Siddequi

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प्रति वर्ष ५ जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है. आने वाले ५ जून को फिर से एक बार औपचारिकता पूरी की जाएगी. औपचारिकता इस मायने में की हम पर बहुत अधिक फर्क तो वैसे भी पड़ने वाला नहीं है. मतलब ‘ढाक के फिर वही तीन पात’. खैर जो लोग औचारिकता में विश्वास नहीं रखते है, उनसे तो हम अच्छे ही है. हम कम से कम औपचारिकता तो कर रहे है…..!!!!

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पर्यावरण की महत्ता को देखते हुए इसे स्कूलों में बच्चो की पठन सामग्री में शामिल कर लिया गया है. हमारे चारों ओर प्रकृति तथा मानव निर्मित जो भी जीवित-निर्जीव वस्तुएं है, वे सब मिलकर पर्यावरण बनाती है. इस प्रकार मिटटी, पानी, हवा, पेड़-पौधे, जीव-जंतु सभी कुछ पर्यावरण से अंग है, और इन सभी के आपसी तालमेल (उचित मात्रा में होना) को पर्यावरण संतुलन कहा जाता है.

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पृथ्वी के सभी प्राणी एक-दुसरे पर निर्भर है तथा विश्व का प्रत्येक पदार्थ एक-दुसरे से परभावित होता है. इसलिए और भी अवश्यक हो जाता है की प्रकृति की इन सभी वस्तुओं के बीच अवश्यक संतुलन को बनाये रखा जाये. इस २१वी सदी में जिस प्रकार से हम औदोगिक विकास और भौतिक समृद्धि की और बढे चले जा रहे है, वह पर्यावरण संतुलन को समाप्त करता जा रहा है. अनेकानेक उद्योग-धंधों, वाहनों तथा अन्यान्य मशीनी उपकरणों द्वारा हम हर घडी जल और वायु को पर्दूषित करते रहते है. वायुमंडल में बड़े पैमाने पर लगातार विभिन्न घटक ओधोगिक गैसों के छोड़े जाने से पर्यावरण संतुलन पर अत्यंत विपरीत परभाव पड़ता रहता है. मुख्यतः पर्यावरण के पर्दूषित होने के मुख्य कारन है- निरंतर बढती आबादी, ओधोगिकरन, वाहनों द्वारा छोड़ा जाने वाला धुंआ, नदियों, तालाबों में गिरता हुआ कूड़ा-कचरा, वनों का कटान, खेतों में रसायनों का असंतुलित पर्योग, पहोड़ों में चट्टानों का खिसकाना, मिटटी का कटान आदि.

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पृथ्वी का तीन चौथाई हिस्सा जल मग्न है फिर भी करीब ०.३ फीसदी जल ही पीने योग्य है. विभिन्न उद्दोगों और मानव बस्तियों के कचरे ने जल को इतना पर्दूषित कर दिया है की पीने करीब ०.३ फीसदी जल में से मात्र करीब ३० फीसदी जल ही वास्तव में पीने के लायक रह गया है. जल पर्दूषण के कारन अनेक बीमारियाँ जैसे- पेचिस, खुजली, हैजा, पीलिया आदि फैलते है. वर्तमान में हमारे द्वारा छोड़े जाने वाले धुएं इत्यादि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है की इराक युद्ध के समय इराक पर होने वाली बमबारी तथा वहां के तेल के कुओं में लगने वाली आग के कारन वायुमंडल में इतना विषाक्त पहुँच गया की वहां दो-तीन बार काले पानी की वर्षा हो चुकी है.

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जीव जंतुओं के अलावा पेड़ पौधे तथा भवन आदि भी वायु प्रदुषण से प्रभावित होते है. आये दिन मशीनों, लौद्स्पीकारों, कारों द्वारा तथा विवाहोस्तव, त्योहारों, धार्मिक कार्यों के अवसरों पर होने वाला ध्वनी प्रदुषण न जाने कितनों की नींद हराम करता रहता है. कृषि तथा अन्य कार्यों में कीटनाशकों के प्रयोग की बात करें तो विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अधिकांश कीटनाशकों को विषैला घोषित किया है. बावजूद इसके हमारे देश में तो इनका प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है. भारत में लगभग ४००० से अधिक रासायनिक कारखाने है जिनमे काम करने वाले अनेक रोगों से पीड़ित हो जाते है और अनेकों का तो जीवन ही समाप्त हो जाता है. वन और वृक्षों का विनाश प्रदुषण का एक मुख्य कारन है. इसके साथ ही विचार प्रदुषण में एक स्वार्थबद्ध एवं संकुचित विचार वायुमंडल में दूषित लहरियों का संचार करते है. इनके कारन अनेक पेड़-पौधे तथा फूलों की वृद्धि बाधित होती है तथा अनैतिक कार्यों की प्रेरणा प्राप्त होती है.

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सारांश रूप में औद्योगिक विकास, गरीबी और अन्य विकास से उत्पन्न वातावरण, बदलता हुआ सोचने-समझने का ढंग आदि जिम्मेदार है पर्यावरण प्रदुषण के. हम प्रत्येक कार्य करने से पूर्व ये सोचते है की इसके करने से हमें क्या लाभ होगा, जबकि हमें ये सोचना चाहिए की हमारे इस कार्य से किसी को कोई नुकसान तो नहीं होगा.

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भारत के ऋषि-मुनिओं ने आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व पर्यावरण के प्रति अपने दायित्व का अनुभव करते हुए कहा था- प्रकृति हमारी माता है, जो अपना सर्वस्व अपने बच्चो को अर्पण कर देती है. प्रकृति की गोद में खेलकर, लोट-पोत कर हम बड़े होते है. वह हमारी समस्त आवश्क्तायो की पूर्ती करती है. धरती, नदी, पहाड़, मैदान, वन, पशु-पक्षी, आकाश, जल, वायु आदि सब हमें जीवनयापन में सहायता प्रदान करते है. ये सब हमारे पर्यावरण के अंग है. अपने जीवन के सर्वस्व पर्यावरण की रक्षा करना, उसको बनाए रखना हम मानवों का कर्तब्य होना चाहिए.

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हकीकत तो यह है की स्वच्छ पर्यावरण जीवन का आधार है और पर्यावरण परदुषण जीवन के अस्तित्व के सम्मुख प्रश्नचिन्ह लगा देता है. पर्यावरण जीवन के प्रत्येक पक्ष से जुड़ा हुआ है. इसीलिए यह अति आवश्यक हो जाता है की प्रत्येक व्यक्ति अपने पर्यावरण के प्रति जागरूक रहे और इस प्रकार पर्यावरण का स्थान जीवन की प्राथमिकताओं में सर्वाधिक महत्तवपूर्ण कार्यों में होना चाहिए, लेकिन अफसोश की बात है की हम चेत नहीं रहे है. अभी हाल ही में विश्व तम्बाकू निषेध दिवस के अवसर पर हमने वास्तविकता को बखूबी नजदीक से देखा और पाया की कितने प्रासंगीक है ये दिवस हमारे जीवन में और कितने परहेज़ वाले हम बन पाते है ?

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