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मोदी के प्रयास कितने सफल होंगे?

Posted On: 29 Jun, 2013 Others में

वैचारिकीअभिव्यक्ति का प्रखर हस्ताक्षर

सिद्धार्थ शंकर गौतम 09424038801

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गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को भाजपा की केंद्रीय चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष मनोनीत करने के बाद रोज सामने आ रहे नये-नये घटनाक्रमों के मद्देनज़र यह तो मानना ही होगा कि मोदी का नाम और उनका साथ राजनीति में सर्वमान्य नहीं है. कुछ तो राजनीतिक मजबूरियां और कुछ आपसी अदावत का गुस्सा; दोनों ही बातें हैं जो एनडीए के कुनबे को मोदी के आने के बाद से संकुचित कर रही हैं. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बगावत को हाल ही में पूरा देश देख-सुन चुका है. ओडिशा के मुख्यमंत्री और राजग के पूर्व सहयोगी नवीन पटनायक भी मोदी के साथ कदमताल करने में खुद को असहज महसूस कर रहे हैं. एक समय छोटे-बड़े कुल 18 राजनीतिक दलों वाला राजग आज 2-4 दलों तक सिमट गया है. पंजाब में शिरोमणि अकाली दल और महाराष्ट्र में शिवसेना को यदि छोड़ दिया जाए, तो आज भाजपा का कोई बड़ा सहयोगी नहीं है. पंजाब में शिरोमणि अकाली दल की सत्ता की मजबूरियों को परे रख दिया जाए तो महाराष्ट्र में शिवसेना भी मोदी को आइना दिखाने से नहीं चूकती. स्व. बालासाहब ठाकरे राजग की ओर से सुषमा स्वराज को प्रधानमंत्री पद के लिये मजबूत प्रत्याशी मानते थे, शायद यही वजह है कि शिवसेना आज भी मोदी को लेकर सहज नहीं है. हालांकि राजनीतिक सोच में समानता और गठबंधन की सियासत के चलते अब शिवसेना का मोदी विरोध कुछ कम हुआ है. अब शिवसेना मोदी को हिन्दुओं का सर्वमान्य नेता बता रही है. फिर भी मौके-मौके पर सेना अपने अखबार ‘सामना’ में मोदी की आलोचना या यूं कहें कि उन्हें समझाइश दे ही देती है. हाल ही में उत्तराखंड में आई भयावह प्राकृतिक आपदा के बाद मोदी द्वारा 15000 गुजराती मूल के लोगों को बचाकर ले जाने की खबर ने फिर से उनको शिवसेना के निशाने पर ला दिया. मोदी भी महाराष्ट्र और राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में सेना का साथ होना महत्वपूर्ण मानते हैं, लिहाजा अपने मुंबई प्रवास के दौरान उन्होंने सेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे और उनके परिवार से मातोश्री जाकर सौजन्य भेंट तक कर डाली. यहां मोदी ने अपने पूर्ववर्ती नेताओं की उसी परंपरा का निर्वहन किया है, जिसमें यह अघोषित होता था कि यदि मुंबई आगमन हुआ है तो मातोश्री की धूल माथे पर लगानी ही होगी. खैर, राजनीति जो न करवाए वो अच्छा. मोदी और उद्धव के बीच हुई सौजन्य भेंट कितनी सौजन्य थी और इसमें किन-किन मुद्दों पर चर्चा हुई यह फिलहाल रहस्य ही बना हुआ है, मगर इतना तो तय है कि राजग के कुनबे को बढाने से लेकर अगले वर्ष महाराष्ट्र में होने वाले विधानसभा चुनाव के बारे में कुछ मंथन तो हुआ ही होगा.

दरअसल, गठबंधन में बने रहने की भाजपा और सेना की अपनी-अपनी दलीलें और सियासी मजबूरियां हैं. महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन के साथ रामदास अठावले की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया की महायुति भी साथ दे रही है. अब चूंकि भाजपा को आगामी लोकसभा चुनाव के चलते मोदी के नेतृत्व में नए साथियों का साथ चाहिए, लिहाजा वह मोदी के निजी मित्रों को उन्हीं के मार्फ़त साथ लाने में जुटी है. गौरतलब है कि प्रधानमंत्री बनने की चाह में मोदी के निजी रिश्तों की काफी अहम भूमिका हो सकती है. इसमें कारपोरेट घरानों के साथ उनके निजी संपर्क सूत्र काम भी कर रहे हैं. यह गतिविधि अभी से नहीं, बल्कि दो तीन वर्षों से जारी है. इसी के मद्देनजर मोदी ने जयललिता, ममता बनर्जी और राज ठाकरे जैसे नेताओं के साथ संबंध प्रगाढ़ किए. इस लिहाज से देखा जाए तो महाराष्ट्र की राजनीति में तेजी से आगे बढ़ रहे राज के मोदी से मित्रवत सम्बन्ध हैं और उन्होंने इशारों-इशारों में राजग और मोदी का समर्थन किया है. मगर राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों के चलते राज और मोदी खुलकर कुछ नहीं कर पा रहे. यह भी सर्वविदित है कि उद्धव राज के साथ कभी नहीं आयेंगे और अठावले राज को पसंद ही नहीं करते, लिहाजा उनका भी एक मंच पर आना असंभव है. भले ही राज की मनसे को महाराष्ट्र विधानसभा में 13 सीटों पर विजयश्री प्राप्त हुई हो, लेकिन बीते चुनाव में उसने भाजपा-सेना-रपाई के गठबंधन में जबरदस्त सेंधमारी करते हुए उसे नुकसान पहुंचाया था. इस तथ्य को मोदी, उद्धव, अठावले और राज चारों जानते हैं. उन्हें यह भी यकीन है कि यदि ये चारों एक मंच पर आ जाएं तो महाराष्ट्र में कांग्रेस-राकांपा गठबंधन को कोई नहीं पूछेगा, पर सवाल वही है कि ये चारों एक मंच पर आयेंगे ही क्यों? हालांकि मोदी और उद्धव की सौजन्य भेंट में राज पर चर्चा अवश्य हुई होगी, पर चारों को एक मंच पर आने के लिए अपने राजनीतिक हितों को तिलांजलि देना होगी, वरना अल्पकालीन साथ चारों को फायदा पहुंचाने की बजाय नुकसान अधिक पहुंचाएगा.

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