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अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे

Posted On: 23 Aug, 2016 Others में

Sincerely yours..Aaiye Haath Uthayein Ham Bhi.............

sinsera

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सुबह तो रोज़ जैसी ही हुई थी लेकिन उस दिन एक अजीब सी बात हुई..

उस दिन नींद से जागते ही हर किसी को एक सूचना मिली. किसी के फोन में मैसेज पड़ा था, किसी के अख़बार के अन्दर पैम्फलेट था तो किसी की ईमेल में था..

किसी अनजान का  मैसेज..दर्द में डूबा हुआ..जिसने भी पढ़ा, चौंक उठा..मैसेज में लिखा था..

“मैं अब अपने जीवन से तंग आ चुका हूँ. जिधर भी जाता हूँ, अपनी ही बुराइयाँ सुनता हूँ. हर कोई मुझे कोसता रहता है.हर गलत बात के लिए मुझ पर ही उँगलियाँ उठाई जाती हैं. आरोपों की बौछार से मेरा तन मन  छलनी हो गया है.इतने सारे दोष उठा कर अब मैं जीना नहीं चाहता.इसलिए मैं ने अपने घृणित जीवन को समाप्त करने का फैसला किया है.

मुझे ईश्वर का वरदान प्राप्त है कि जो लोग मुझे सरेआम गालियाँ देते  हैं, अगर वो ही सब, अपने अपने मन में मुझसे मुक्त होने का संकल्प लेकर, एक एक पत्थर मारेंगे, तभी मेरे जीवन का अंत होगा, अन्यथा नहीं…इसलिए आप सब  से अनुरोध है कि मेरे  घृणित जीवन को समाप्त करने  के लिए आप आज दिन में ठीक बारह बजे निश्चित समय पर चौराहे पर पहुँच जाएँ , अपने पवित्र मन और संकल्प से एक एक पत्थर मुझे मारें, और अपनी आँखों के सामने मुझे समाप्त होते हुए देखें.. मैं नगर के चौराहे पर खुद को सूली पर टांग कर संसार  को अपने  बोझ से मुक्त करने के लिए आप  सब का इंतज़ार कर रहा हूँ..

मैं चाहता हूँ कि सभी नागरिक मेरी मृत्यु के साक्षी बने. जिसने जिसने मुझे कोसा है, गालियाँ  दी हैं, दोषी ठहराया है..उन सब की उपस्थिति को मैं अपने   मरते  हुए अस्तित्व  से आखिरी बार महसूस करना चाहता हूँ.. जिन्हें अपने जीते जी मैं ने कभी चैन से नहीं रहने दिया , उन्हें चैन की साँस भरते देखना चाहता हूँ..मैं जिन जिन का दोषी हूँ, उनमे से एक भी अगर मेरे अंतिम क्षण में उपस्थित न रहा तो मैं मर न सकूँगा…अवश्य आइयेगा ..

आपका अपना– पाप  “

नगर में तहलका मच गया..हर कोई पाप को मरता हुआ देखने के लिए उत्सुक हो उठा…बड़े बड़े राजनेता, नौकरशाह,अफसर,बिल्डर,व्यापरी,भक्त, पुजारी,योगी, भोगी, स्त्री , पुरुष, लड़के ,लड़कियां  ….सभी..

हर तरफ एक ख़ुशी की लहर दौड़ गयी. पाप से यूँ छुटकारा मिल जायेगा ये किसी ने सोचा न था.सब को बारह बजने का इंतज़ार था..

लोग अपने अपने काम समेटने लगे.

नेताओं ने भ्रष्टाचार के धंधे समेटना शुरू किया . जब पाप ही न रहेगा , तो ये काले धंधे कैसे चल पाएंगे. काला साम्राज्य समेटते समेटते नेताजी के मन में मोह समा गया. काली  कमाई के बिना जीवन कैसे चलेगा? हजारों नाम से हजारों बैंक अकाउंट हैं. किस किस को सरेंडर करें और किसको रहने दें . बारह बजे तक तो हो भी नहीं पायेगा . फिर  जिस राजसी ठाठ बाट  से रहने की आदत हो गयी है, क्या वो ईमानदारी की कमाई में मिलेगा? लेकिन नेता के पास  ईमानदारी की कमाई? किस सोर्स से आयेगी..?तनख्वाह से..??

जिस जिस को अपनी शक्ति के बल पर शोषित किया है , अब उसको पाप के मर जाने के बाद किसके बल पर दबायेंगे. पाप के मरने से मेरा तो फायदा कम नुकसान ही ज्यादा है.नेताजी असमंजस में पड़ गए. छोडो, मैं नहीं जाता . हजारों की भीड़ में किसी को पता भी नहीं चलेगा कि कौन आया , कौन नहीं आया..

हर जगह अफरातफरी मची थी. पाप के ऊपर पत्थर फेंकने से पहले सब को अपने अपने राज़  छुपाने की चिंता सता रही थी. अफसर ,नौकरशाह अपने दलाली कमीशनी और रिश्वतखोरी के सबूत मिटाने में जुटे थे, लेकिन बौखलाहट में समझ नहीं पा रहे थे कि इनमे से कुछ लिंक तो बचा लें ताकि आगे कभी काम आ सके.

व्यापारियों ने जमाखोरी का माल निकालने की सोची लेकिन फिर उनमे से कुछ बोरियों में कंकड़ मिला मिला कर अपने ही गोदाम में रखने का काम शुरू करवा दिया .

भक्त, पुजारी भगवान का नाम लेने में जुटे थे, मुल्ला ,मौलवी  सजदे में गिरे हुए थे..हे प्रभु, या ख़ुदा, पाप  मर गया तो हमारा क्या होगा. किसी को हमारी ज़रूरत ही न होगी. पाप ही न होगा तो सब नेक राह पर खुद ही चल लेंगे. ये करोड़ों का चढ़ावा, दान दक्षिणा,अरबों का चंदा .. सब बंद हो जायेगा तो हम खायेंगे क्या? हमारा पूरा कुनबा बर्बाद हो जायेगा…भगवान तक पहुँचने का रास्ता दिखाने के नाम पर अब हम किसको भटकायेंगे. रक्षा करो . . रक्षा करो प्रभु. हमको जिंदा रखने के लिए पाप को मरने न दो…

शिक्षक ,रक्षक से ले कर भक्षक तक्षक तक सब के सब बिलबिला कर, जहाँ तहाँ  भाग भाग कर, पाप को मारने से पहले अपने अपने पापों की निशानियाँ मिटाने में जुट गए.. फर्जीवाडे की योजनाओं के कागज़, कुएं तालाब  खोदने के कागज़, पुल और डैम बनवाने के कागज़, फर्जी नियुक्ति, फर्जी एडमिशन, फर्जी अंकपत्र, भविष्यनिधि, छात्रनिधि, यूनिफोर्म, बस्ते, किताबें,मिड डे मील, फर्नीचर, स्टेशनरी, बाढ़ की राहत, सूखे की राहत, सरकारी पत्र, गैर सरकारी पत्र, प्रेम पत्र….सब छुपाये, हटाये, बढ़ाये. फाड़े, जलाये जाने लगे..

आखिर पाप के मर जाने के बाद ये  सब तो सामने आ ही जायेगा.. फिर कोई किसी को क्या जवाब देगा. कोई किसी से कैसे नज़रें मिलाएगा..

सासें रोने लगीं..बिना दहेज़ वाली बहू को जला नहीं पाएंगी, दूसरे की बेटी का अपने हित में शोषण कैसे करेंगी.

बहुएं कलपने लगीं..ससुराल के लिए निष्ठावान बनना पड़ेगा..

कर्मचारी को चिंता सताने लगी कि अब सारे समय ईमानदारी से काम करना पड़ेगा..

विवाहित लोगों का तो काल हो गया..किसी एक के  हो कर कैसे रह सकेंगे ..मन में ही सही, कुविचार आने ही न पायेगा , पाप के बिना तो जीवन नरक सामान हो जायेगा.

कुंवारों की मुसीबत हो गयी… छुप छुप के मिलना,झूठ-फरेब, धोखा, प्रेम के नाम पर जाल में फंसाना, इन सब के बिना नीरस जीवन तो मौत से भी बदतर हो जायेगा…

अब पढ़े बिना पास होने के लिए गुरूजी को चढ़ावा चढ़ाने के दिन गए..फर्जी डिग्री के दिन गए..ऊपर के अधिकारी को मेज़ के नीचे से उपहार देकर नौकरी पाने के दिन गए..

अब कमज़ोर की कमजोरी शक्तिशाली की शक्ति नहीं बन सकेगी..

अब गरीब की गरीबी, अमीर की अमीरी नहीं बन सकेगी..

सारे संसार में हाहाकार मचा हुआ था. ऐसा हाहाकार तो प्रलय आने पर भी न मचता. लोग दौड़ दौड़ कर अपने पापों के सबूत मिटा भी रहे थे और आड़े वक्त के लिए उनमे से कुछ बचा भी रहे थे पर काम ऐसा था कि निपटता ही न था..

देखते ही देखते बारह बजने को आये..समय का पता ही न चला . चौराहे पर सन्नाटा था.. लोग अपने अपने कीमती दस्तावेजों को संजोने में ऐसा लगे कि पाप को मारने जाने के समय का ध्यान ही न रहा ..

ठीक बारह बजे…चौराहे पर पाप के मरने का नज़ारा देखने केवल एक छोटा सा मासूम बच्चा पहुंच कर चुपचाप सूली पर लटके हुए “पाप” के कलेजे  से टपकता हुआ लहू  देख कर दुखी हो रहा था..अपने नन्हे नन्हे हाथों से सहारा  देकर उसने पाप को उतारना चाहा..

“क्यूँ मरना चाहते हैं आप? अगर सब आपसे नफरत करते है तो आइये , मैं आपको अपने ह्रदय में रख लूँगा..”

पाप कांप उठा..”नहीं बच्चे नहीं..तुम्हारा ह्रदय तो बेहद कोमल और निष्कलंक है. ऐसी साफ सुथरी जगह पर तो मैं रह ही नहीं सकता..हर समय मेरा दम घुटता रहेगा..”

“फिर..??”

“फिर क्या..” पाप के होठों पर कुटिल मुस्कान उभर आई. “चिंता न करो प्यारे बच्चे. ईश्वर  के वरदान के मुताबिक मुझे तो ऐसे भी तब तक नहीं मरना है जब तक हर मनुष्य मन में मुझे मारने का संकल्प ले कर एक एक पत्थर न मारे.”

“आज अगर एक भी इंसान पीछे हट जाता तो फिर मैं मर ही नहीं सकता था ..लेकिन  देखो, यहाँ तो मुझे पत्थर मारने कोई आया ही नहीं. . मेरा सूली पर लटके रहना बेकार ही है.. मैं तो  चला वापस उसी संसार में, जो मेरे बिना चल ही नहीं सकता..”

“…..तुम्हारे ह्रदय में भी आऊंगा मैं..” पाप सूली से उतरते हुए मुस्कुराया…”लेकिन अभी नहीं..थोड़े और बड़े हो जाओ..तब आऊंगा..”

बच्चा चुपचाप खड़ा “पाप” की कही हुई बातों को समझने की कोशिश कर रहा था..

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