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जय हिन्द..जय हिन्द की नारी ..

Posted On: 15 Aug, 2016 Others में

Sincerely yours..Aaiye Haath Uthayein Ham Bhi.............

sinsera

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बहुत लिखा है मैं ने लड़कियों के बारे में..

जब जब लड़कियों के प्रति कोई अपराध हुआ, मुझे अक्सर यही लगा कि शायद इसकी वजह यह है कि लड़कियों ने अपनी आज़ादी को थोडा गलत रास्ते पर मोड़ रखा है. मैं क्या, बहुत से लोग यही कहते पाए गए कि लड़कियां खुद को बेज़रूरत एक्सपोज़ करती हैं, अपनी हदों से ज्यादा आगे बढ़ना चाहती हैं, या फिर अपनी प्रतिभा से कहीं अधिक पाने के लिये गलत रास्तों पर चलने से नहीं कतरातीं.

ये एक अलग मुद्दा है.

इससे दरकिनार एक बात यह है कि चलिए अगर हम मान भी लेते हैं कि कोई गलत है तो क्या जो सही इन्सान है, उसे उसका फायदा उठाना चाहिए?

महिलाओं के प्रति अपराधो में बीते वर्षों में हद से ज्यादा वृद्धि हुई है तो क्या हर जगह लड़कियों के चुने हुए गलत रास्ते ही इसके लिए ज़िम्मेदार हैं?

अगर संस्कृति की शुरुआत से देखा जाये तो जब धरती पर जनसँख्या बेहद कम थी और संसाधन बहुत ज्यादा, उस समय स्त्रियों को समाज में काफी सम्माननीय स्थान प्राप्त था. उनको भी पढने लिखने , या स्वतंत्रता से कहीं भी आने जाने का अधिकार था. विवाह नामक संस्था , समाज के जन्म के साथ ही प्रचलित हो गयी थी .बावजूद इसके, पुरुष में तब भी कुछ न कुछ दबी छुपी कुत्सित इच्छाएं अवश्य थीं, वर्ना किसी मजबूर स्त्री को नगर वधू या देवदासी बनाने का प्रचलन न होता..हालाँकि पुरुष में शक्तिशाली होने का अहंकार तब भी था ,जो इनकी विवशता को परे रख कर , इन्हें आंसू बहाने से भी रोक देने के लिए , इनको समाज में अति – सम्माननीय पदवी दे देता था ,और….इसी आड़ में इनका दैहिक शोषण करता था.

बलात्कार फिर भी होते थे..

तब कहाँ स्त्रियाँ छोटे छोटे भड़काऊ कपडे पहन कर किसी को उकसाती थीं..

कहाँ तब पोर्न फ़िल्में होती थीं, जिन्हें आजकल के नैतिक पतन का एक कारण समझा जाता है.

अहिल्या ने तो अपना कोई मतलब साधने के लिए इंद्र से सम्बन्ध नहीं बढ़ाये होंगे, लेकिन फिर भी अहिल्या का बलात्कार इंद्र द्वारा किया गया, ….पत्थर का बुत बनने का अभिशाप भी अहिल्या को ही झेलना पड़ा, और इंद्र आज भी देवता हैं…ये है पुरुष का अनाचार और दबदबा …

पता नहीं कबसे , लेकिन शायद इसी कारण से स्त्री को धीरे धीरे घर के अन्दर, परदे में और पुरुष से पीछे रहने की आदत डाल लेनी पड़ी.

अत्याचार झेलने से सांकेतिक कैद ही भली…युग बीतते चले गए लेकिन पुरुष की शक्ति का अहंकार और स्त्री का विभिन्न प्रकार से शोषित होते रहना नहीं रुक सका.

जब जब उसने मजबूरी में स्वीकृत किये हुए जेलखानों से ज़रा बाहर झांकना भी चाहा तब तब वो बुरी तरह से प्रताड़ित, शोषित या लज्जित होती रही… तो वो क्या करे..?

जाये फिर उसी जेल में , अपने दरबे में छुप कर बैठी रहे..??

नहीं …क्यों बैठी रहे?

जब स्त्री और पुरुष ,दोनों ही ईश्वर की बनायीं हुई रचनाएँ हैं फिर कोई एक, दूसरे की सत्ता क्यूँ स्वीकार करे..?

कोई किसी का अधीन नहीं है और अगर करना चाहे तो स्त्री को अब अपनी कमजोरी भूल कर लड़ना होगा.

लड़कियों को परोक्ष रूप से इतना अपमानित किये जाने के अब दिन ये आ गए हैं कि “सूचना के अधिकार” के अंतर्गत अगर कोई स्त्रियों के प्रति बढ़ते हुए अपराधों का कारण पूछ ले तो सरकार की तरफ से दिए गए जवाब में भी फिल्मों और टी वी सीरियल में स्त्रियों द्वारा किये गए निर्लज्जता पूर्ण अभिनय को दोषी ठहराया जाता है…..

मैंने पहले कई बार कहा है कि समाज में भूखे भेड़िये भेस बदल कर घूमते रहते हैं. लड़कियां उनको हर समय पहचान नहीं सकतीं तो कम से कम बच कर रहें. लेकिन अब , जब सोती हुई मासूम बच्चियां उठा ली जा रही हैं…हाईवे पर तमंचे की नोक पर गाड़ियाँ रोक ली जा रही हैं…घरों की दीवार के अन्दर पवित्र रिश्ते शर्मसार हो रहे हैं तो अब क्या लड़कियां बंद कपडे पहनने के नाम पर कफ़न पहन कर घूमें…? दरिंदो से बचने के लिए गड्ढे खोद कर घुस जाएँ…?

नहीं लड़कियों नहीं….छुपने बचने के दिन गए….आज स्वतंत्रता दिवस की वर्षगांठ पर अपने लिए समाज में स्वतंत्रता से,निडरता से जीने की शपथ उठाओ..ठान लो कि अब जो तुम्हे शर्मिंदा करने आये , तुम उसे खुद अपने हाथों से सजा दोगी .

पौराणिक कहानिया सिर्फ इसलिए नहीं होती कि उन्हें कथा में सुन कर सिनेमा की तरह चमत्कारिक दृश्य अनुभव करो और अगरबत्ती जला कर ,आरती करके, प्रसाद खा कर अपने घर बैठो. बल्कि तुम्हे उनसे शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए..

सुना नहीं तुमने कि राक्षसों के विनाश के लिए विभिन्न देवताओं से विभिन्न शक्तियां लेकर दुर्गा उत्पन्न हुई थीं..

अनाचार और अधर्म से रक्षा के लिए कृष्ण आगे आए….

प्रोफेट मुहम्मद ने जंगलों की खाक छानी, अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया लेकिन समाज में फैली बुराइयों से सहमत नहीं हुए…

ईसा ने काँटों का ताज पहन कर सलीब उठा ली लेकिन अधर्मियों का साथ नहीं दिया…

खलील जिब्रान ने लिखा है कि “बर्फ और आंधी फूलों को उड़ा ले जाते हैं, लेकिन बीज कभी नष्ट नहीं होते..”

तो तुम किसका इंतज़ार कर रही हो..?ये सब तुम्हारे अन्दर मौजूद हैं..उठो और इनको खुद के अन्दर महसूस करो..

अपने सौ नेत्र औरआठ हाथ महसूस करो . नेत्रों में अग्नि और हर हाथ में शस्त्र रखो . कमर में कृपाण बांध कर चलो. तुम कहाँ इतनी कमज़ोर हो कि कोई तुम्हारा मान-मर्दन करके चला जायेगा… नहीं…ऐसा करने वाले को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ेगा , ये शपथ उठा लो. .

और अगर कभी, दुर्योग हो ही जाये ..तो उसे दुर्घटना समझ कर भूल जाओ..

किसी किसी को प्रकृति संघर्ष करने के लिए चुनती है. जीवन में सब कुछ सुगम ही नहीं होता और न ही एक दुर्घटना से जीवन नष्ट होता है. समय आगे बढ़ता ही रहता है..चोट लगने से प्रतिभा कुंठित नहीं होती है . अगर कभी तुम्हारे पंख चोट खा ही जाएँ तो उन्हें फिर से उगने दो ,और उड़ान भरो..जिसे लोग कलंक का टीका कहते हैं उसे तुम कदाचार रूपी रोगों से लड़ने का टीका समझ कर जियो …

यदि कोई दुष्ट किसी युद्ध में तुमसे जीत गया तो ये उसके पतन का प्रारंभ समझो. नैसर्गिक न्याय कभी उसको नहीं बख्शेगा. एक न एक दिन कुदरत उसको मिटा ही देगी..

तुम आजाद हो..सदा से आजाद हो, आजाद रहो…

आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर यदि झंडा फहराना है तो उसमे दण्ड की जगह पर बरछा लगाओ और जो तुम पर बुरी नज़र डाले ,उसकी आँखों में घुसा दो…अपने लहू को लाल की जगह केसरिया रंग कर लो , शुभ्र उज्जवल धवल तुम्हारा चरित्र हो और हरीतिमा बन कर सदैव लहलहाओ . चक्र की तरह असीम अनंत निरंतर उर्जावान रहो और हर प्रकार की वास्तविक/ आभासी बेड़ियों से खुद को आजाद कर लो..

और फिर सब मिल कर कहो…..

“स्वतंत्रता हमारा भी अधिकार है,हमें स्वतन्त्र रहने से अब कोई नहीं रोक सकता…”

जय हिन्द..जय हिन्द की नारी ..

visit….. http://sinserasays.com/


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