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भारत को धर्म नहीं रोटी चाहिए

Posted On: 12 Jan, 2018 Others में

Sincerely yours..Aaiye Haath Uthayein Ham Bhi.............

sinsera

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आज मुझे स्वामी विवेकानंद की बड़ी याद आ रही है. उनका जन्म दिवस है न.

दरअसल हमारे यहाँ की परंपरा यही है. महापुरुषों को उनके जन्मदिवस या पुण्यतिथि पर खूब जोर शोर से याद कर लिया जाता है, उनके आदर्शों को जबानी तौर पर दुहरा लिया जाता है उसके बाद साल भर के लिए बात ख़त्म.
आज भी यही हो रहा है. हम भारतवासियों को आज स्वामी विवेकानंद पर गर्व है, जगह जगह उनके यशोगान गए जा रहे हैं. उनका जीवन, उनके आदर्श, उनके सिद्धांत सर्वोत्तम माने जा रहे हैं लेकिन अगर उनके समर्थन में, उन्ही आदर्शों पर चलने को कहा जाये तो कितने लोग तैयार होंगे, इसमें संदेह है . उनहोंने अपने छोटे से, उनतालीस वर्षों के जीवन-काल में दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य सहित न जाने कितने विषयों को पढ़ डाला. इतना ही नहीं, उनकी वेद, उपनिषद, भगवद् गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों के अतिरिक्त अनेक हिन्दू शास्त्रों में गहन रूचि थी. इतना पढ़ लेने के बाद उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली . शारीरिक व्यायाम में व खेलों में भाग तो वे हमेशा लिया ही करते थे. आपको शायद पता न हो कि स्वामी विवेकानंद ने पश्चिमी तर्क, पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन जनरल असेंबली इंस्टिट्यूशन (अब स्कॉटिश चर्च कॉलेज) में किया, फिर ललित कला की परीक्षा उत्तीर्ण की, और इतने पर ही मन नहीं भरा तो कला स्नातक की डिग्री भी ले डाली.
सच्चा समर्थक वही है जो अपने आदर्श व्यक्ति के चरित्र को अपने जीवन में उतारे.स्वामी विवेकानंद का गुणगान करने वाले लोग इसका दस प्रतिशत भी कर पायें तो धन्य हो जाएँ.
आज बहुत से लोगों ने 1893 के शिकागो सम्मेलन में स्वामीजी के ओजस्वी भाषण का ज़िक्र किया है. लेकिन पहली लाइन “मेरे अमरीकी भाइयो और बहनो” के बाद की लाइनें बताने वाला कोई नहीं मिला. भाषण तो निश्चय ही इसके बाद भी चला होगा. मैं आपको बताऊँ स्वामी विवेकानंद जी ने उसके बाद जो कहा उसका सार क्या है –
उन्हों ने कहा कि –
“हम भारतीय लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते वरन समस्त धर्मों को सच्चा मान कर स्वीकार करते हैं ”
“मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है”
“रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥
अर्थात जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले विभिन्न धर्मावलम्बी अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं.”
“ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥
अर्थात जो कोई मेरी ओर आता है-चाहे किसी प्रकार से हो-मैं उसको प्राप्त होता हूँ”
अंत में उन्होंने कहा –
“साम्प्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुन्दर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी है. वह पृथ्वी को हिंसा से भरती रही है व उसको बारम्बार मानवता के रक्त से नहलाती रही है, सभ्यताओं को ध्वस्त करती हुई पूरे के पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही है . यदि ये वीभत्स दानवी शक्तियाँ न होतीं तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता. पर अब उनका समय आ गया हैं और मैं आन्तरिक रूप से आशा करता हूँ कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घण्टा ध्वनि हुई है वह समस्त धर्मान्धता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होनेवाले सभी उत्पीड़नों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्पारिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो .”

दुःखद है कि आज हम जिनके जन्मदिवस का जश्न माना रहे हैं, उनके जीवन का दुःख 125 सालों के बाद भी उसी रूप में अभी तक जिंदा है, बल्कि और भी वीभत्स रूप धारण कर चुका है . स्वामी विवेकानन्द पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे. उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था. उनको हिन्दू धर्म का अटपटा, लिजलिजा और हवाई रूप स्वीकार नहीं था. इसीलिए उन्होंने यह आह्वान किया कि इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मन्दिरों में स्थापित कर दिया जाये और मन्दिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाये.

इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के अन्त में किया गया उनका यह विद्रोही और कालजयी आह्वान, अभी तक एक बड़ा प्रश्नवाचक चिन्ह बन कर खड़ा हुआ है. उस समय इस आह्वान को सुनकर पूरे पुरोहित वर्ग की घिग्घी बँध गई थी लेकिन अभी तक कोई दूसरा तो क्या सरकारी मशीनरी भी किसी अवैध मन्दिर की मूर्ति को हटाने का जोखिम नहीं उठा सकती .
उनका यह कहना कि “तुमको कार्य के सभी क्षेत्रों में व्यावहारिक बनना पड़ेगा.सिद्धान्तों के ढेरों ने सम्पूर्ण देश का विनाश कर दिया है” , अभी तक कहीं भी माना नहीं जाता है. आज भी हमारे देश में कोरे सिद्धांत ही सिद्धांत भरे पड़े हैं जिनको व्यवहारिक रूप से लागू करने की जहमत कोई उठाना नहीं चाहता. कौन जानता है कि उन्होंने “भारत को धर्म नहीं रोटी चाहिए ” जैसी बातें कही थीं. जानने की ज़रूरत भी क्या है. भाषणों में नाम याद रखना, यहाँ इतना ही काफी है.
हाँ, लेकिन एक अति-महत्वपूर्ण बात जान लीजिये. सोशल मीडिया पर विगत 3-4 सालों से स्वामी विवेकानंद के शिकागो-सम्मेलन वाले भाषण की जो ऑडियो-क्लिप चल रही है वो दरअसल स्वामी विवेकानंद की नहीं बल्कि “सुबीर घोष” की आवाज़ में उनके भाषण का सस्वर-पाठ है. मेरा काम था बताना सो मैं ने बता दिया. आप चाहें तो अपनी तरफ से जाँच-पड़ताल कर सकते हैं.

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