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देश के उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं पद से हटाने की प्रक्रिया

Posted On: 28 Apr, 2018 Politics में

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वरिष्ठ वकील इंदु मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मल्होत्रा ने  शुक्रवार 27 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पद की शपथ दिलाई। वे पहली महिला वकील हैं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया गया एवं 25 वीं न्यायाधीश हैं। उनकी नियुक्ति को लेकर विवाद भी कम नहीं था सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के 100 वकीलों ने याचिका दायर कर नियुक्ति पर रोक लगाने की कोशिश की उनको इंदू मल्होत्रा की नियुक्ति पर एतराज नही था वह चाहते थे क्लोजियम द्वारा प्रस्तावित दूसरा नाम जस्टिस के एम जोजफ को भी सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया जाये वह उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट नें श्री जोजफ का नाम वापिस भेज दिया कानून मंत्रालय को  एतराज था जस्टिस जोजफ का वरीयता में 44 वाँ स्थान है उनसे भी सीनियर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस मौजूद हैं जबकि पहले कई बार नियुक्ति में वरीयता का ध्यान नहीं रखा गया दूसरा सुप्रीम कोर्ट में केरल का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है।  नियमानुसार यदि क्लोजियम दुबारा श्री जोजफ का नाम भेजेगा सरकार उनकी नियुक्ति पर एतराज नहीं कर सकेगी, नियुक्ति पर राजनीतिक विवाद थम नहीं रहा। विपक्ष ने सरकार पर इल्जाम लगाया जस्टिस जोजफ उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के खिलाफ फैसला दिया था इस लिए उनकी सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति रोकी गयी विपक्ष का काम सरकार की आलोचना का अवसर ढूंढना है।

 

संघात्मक व्यवस्था में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका का अपना महत्व है भारतीय संविधान निर्माताओं की कोशिश थी न्यायपालिका पर विधायिका और कार्यपालिका हावी न होने पायें। संविधान द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को अन्य देशों की तुलना में विस्तृत शक्तियाँ प्रदान की गयी है। अमेरिकन संविधान में चेक एंड बैलेंस सिद्धांत द्वारा शक्ति संतुलन बनाये रखने की कोशिश की गयी है वहाँ भी न्यायाधीशों की नियुक्ति सीनेट की स्वीकृति से की जाती है पहले न्यायाधीश के रूप में प्रस्तावित नामों को सार्वजनिक कर दिया जाता जिससे देश के आम एवं प्रमुख नागरिकों से उनकी जानकारी मिल सके न्यायाधीशों की ईमानदारी पर किसी को संदेह न रहे। क्या हमें अमेरिका के अनुभव से सीख नहीं लेनी चाहिए जिससे नियुक्ति में विवाद न उठे ? भारत में अमेरिका के समान संघीय व्यवस्था है लेकिन वहाँ का संविधान आधे घंटे में पढ़ा जा सकता है क्योकि राज्यों का अलग अलग संविधान है लेकिन भारत में  न्यायिक व्यवस्था में सबसे ऊपर सर्वोच्च न्यायालय है उसके नीचे प्रत्येक राज्य में उच्चन्यायालय हैं, उच्चन्यायालय के  आधीन जिला एवं अधीनस्थ न्यायालय हैं (दीवानी एवं फौजदारी )देश के सभी न्यायालय एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

न्यायपालिका स्वतंत्र रह कर सुचारू रूप से कार्य कर सके इसके लिए संविधान के  अनुच्छेद 124 एवं 217 के अनुसार चीफ जस्टिस की नियुक्ति का अधिकार राष्ट्रपति को दिया गया था राष्ट्रपति महोदय न्यायाधीशों की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश की सलाह से करते रहे हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं उनके तबादले के मामले में न्यायपालिका की राय को प्रमुखता देने के लिए 1993 में क्लोजियम व्यवस्था लागू की गयी अत : न्यायालय के जजों की नियुक्ति के लिए सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं चार वरिष्ट न्यायाधीशों के नेतृत्व में बनी समिति जजों के नाम और नियुक्ति का फैसला करेगी इससे सुप्रीम कोर्ट एवं उच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति का निर्णय स्वयं किया जाएगा जजों के स्थानान्तरण एवं पदोन्नत होकर सुप्रीम कोर्ट में कौन से जज जायेंगें इसकी व्यवस्था भी क्लोजियम करता है। नियुक्ति की सिफारिश कर राष्ट्रपति के पास भेजी जाती है स्वीकृति के बाद नियुक्ति हो जाती है यदि राष्ट्रपति किसी न्यायाधीश की नियुक्ति पर सहमत नहीं है क्लोजियम व्यवस्था में दुबारा नियुक्ति मान्य होती है।

 

इस व्यवस्था पर भी विवाद होने लगा नियुक्ति में अनेक व्यवहारिक दिक्क्तें थीं पक्षपात पूर्ण निर्णयों की सम्भावना बढ़ी। क्लोजियम  व्यवस्था का वर्णन मूल संविधान में भी नहीं है न संविधान में संशोधन किया गया है संशोधन की प्रक्रिया आसान नहीं है संसद के दोनों सदन के सांसद एवं आधे से अधिक राज्य विधान सभा के विधायक संविधान संशोधन प्रक्रिया में हिस्सा लेते हैं। व्यवस्था में अनेक कमियां थी न्यायधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर संसद में आम सहमती नहीं थी जब न्यायपालिका की सत्यनिष्ठा पर गंभीर आरोप लग रहे हैं तो उस पर पुनर्विचार क्यों न किया जाए। ऐसी परिस्थिति में संविधान में संशोधन करके राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की स्थापना को हरी झंडी दी गई, जिसे न्यायाधीशों की नियुक्ति, स्थानांतरण और अन्य प्रशासनिक मामलों को निपटाने का अधिकार दिया गया। अत: संविधान में 121 वाँ विधेयक एवं राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक दोनों विधेयक लोकसभा एवं राज्यसभा में बहस के बाद सर्व सम्मति से पास हुए आधे से अधिक राज्य विधान सभाओं ने भी पास किया  जिन्हें राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद  विधेयक का रूप दे दिया गया।

 

इस आयोग का प्रमुख कार्य सुप्रीम कोर्ट एवं 24 उच्चन्यायालय के जजों की नियुक्ति करना था। इस आयोग में कुल छह सदस्य होते हैं 1.चीफ जस्टिस आफ इंडिया 2.सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ न्यायाधीश 3.दो प्रबुद्ध नागरिक इनमे एक अनुसूचित जाति ,अनुसूचित जन जाति ,पिछड़ा वर्ग अल्पसंख्यक वर्ग या महिला होनी चाहिए इनका चयन प्रधान मंत्री ,चीफ जस्टिस और लोकसभा के नेता विपक्ष यदि लोक सभा के नेता विपक्ष कोई नहीं है ऐसी स्थिति में (इस समय लोक सभा में नेता विपक्ष का पद संख्या बल की कमी के कारण किसी को नहीं दिया गया) ऐसे में लोकसभा के सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता अर्थात तीन सदस्यों वाली समिति करेगी 4.केन्द्रीय कानून मंत्री को भी सदस्य बनाया जा सकता है |यदि आयोग के दो सदस्य किसी नियुक्ति पर सहमत नहीं हैं ऐसे में आयोग उस व्यक्ति की नियुक्ति की सिफारिश नहीं करेगा | हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया।सैद्धांतिक रूप से क्लोजियम व्यवस्था अब तक कायम है।

 

सर्वोच्च न्यायालय  संविधान की व्याख्या करता है संविधान द्वारा प्रदत्त जनता के मौलिक अधिकारों का रक्षक है। दीवानी एवं फोजदारी सम्बन्धित अपीलों का अंतिम न्यायालय है ,राष्ट्रपति को विधि सम्बन्धित विषयों में परामर्श देता है लेकिन इनको मानने के लिए राष्ट्रपति विवश नहीं हैं। इनके निर्णयों के रिकार्ड रखें जाते हैं निर्णय नजीर बनते हैं जिनका प्रयोग समान विषयों में साक्ष्य  के रूप में किया जाता है।  सुप्रीम कोर्ट केंद्र और राज्यों एवं राज्यों के आपसी विवादों को भी सुलझाते हें। आजादी के बाद से देश के इतिहास में पहली बार चार सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायाधीशों ने प्रेस कांफ्रेंस बुला कर मीडिया के सामने चीफ जस्टिस आफ इंडिया के खिलाफ मोर्चा खोला था | उनके अनुसार सात पन्नों का पत्र लिख  कर चीफ जस्टिस के सामने अपना पक्ष रक्खा था लेकिन उनकी कोशिश बेकार रही मजबूर होकर मीडिया के सामने अपनी बात रक्खी।  प्रेस कॉन्फ्रेंस में जस्टिस चेलामेश्वर, मुख्य न्यायाधीश के बाद सबसे सीनियर हैं प्रेस कांफ्रेंस में चेलामेश्वर बात रख रहे थे वाकी जज जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन  लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसफ उनसे सहमत थे। चारों जजों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की कार्यशैली और केस के बंटवारे पर असंतोष जाहिर किया है। उनके अनुसार एपेक्स कोर्ट का प्रशासन व्यवस्थित नहीं है ,सर्वोच्च न्यायालय की अंदरूनी हालत ऐसी है जिससे  प्रजातंत्र को खतरा है।

 

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को पदच्युत करना -124 (4) में न्यायाधीशों को उनके पद से हटाया जा सकता है परन्तु इसकी प्रक्रिया आसान नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ सात दलों के  64 सांसदों ने राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू को महाभियोग का नोटिस दिया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया जटिल है संसद के निचले सदन में 100 सासदों की मंजूरी सहित हस्ताक्षर, राज्य सभा में 50 सांसद प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करें। सभापति या स्पीकर यदि प्रस्ताव को मंजूर कर लेते हैं आरोपों की जाँच के लिए तीन सदस्यों की समिति का गठन किया जाता है जिसके सदस्य एक सुप्रीम कोर्ट का जज एक उच्चन्यायालय का जज एक कानून का विशेषज्ञ मिल कर जांच करते हैं यदि न्यायाधीश को दोषी पाया जाता है सदन में रिपोर्ट पेश की जाती है दोनों सदनों में महाभियोग प्रक्रिया में सदन के दो तिहाई सदस्यों का बहुमत आवश्यक है दोनों सदनों में प्रस्ताव पास हो जाने के बाद राष्ट्रपति महोदय के हस्ताक्षर के बाद जज अपने पद से हटाया जा सकता है। व्यवस्थापिका और कार्यपालिका को सुप्रीम कोर्ट के जज पर हावी नहीं होने दिया गया  दीपक मिश्रा पहले मुख्य न्यायाधीश हैं जिनके खिलाफ प्रस्ताव लाया गया था प्रस्ताव पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित था उन्हें कई विषयों पर महत्वपूर्ण निर्णय देने से रोकना था। प्रस्ताव पर कांग्रेस के सदस्य एक मत नहीं थे सलमान खुर्शीद ने तो खुले आम प्रस्ताव का विरोध किया। उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने बिना समय गवाये विधि विशेषज्ञों से सलाह लेकर प्रस्ताव पर असहमति प्रगट की उनके दस पृष्ठों के निर्णय में असहमति के 22 कारण दिए गये। मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ प्रक्रिया पूरी तरह राजनीति से प्रेरित थी श्री दीपक मिश्रा बिना विचलित हुए अपना काम करते रहे।

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