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परदेस में ईद मुबारक

Posted On: 18 Jul, 2015 Others में

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परदेस में ईद मुबारक ईद का अर्थ है ख़ुशी अर्थात खुशियों का पर्व | जब भी ईद आती है मेरी स्मृति में कुछ यादें उभर जाती हैं| हम कई वर्ष परिवार सहित ईरान में रहे हैं यहाँ की अधिकाँश आबादी शिया है| हम ईरान के खुर्दिस्तान में रहते थे यहाँ सुन्नी मुस्लिम का बाहुल्य था | तीस दिन तक रमजान के महीने में रोजे रखने के बाद ईद आती हैं जिस धूम धाम से हमारे यहां ईद मनाई जाती है वैसे मैने वहाँ नहीं देखा | हमारे यहां कई दिनों पहले बाजार सज जाते हैं नए नए डिजाईनर कपड़े खूबसूरत जूते चप्पलें असली और नकली डिजाईनर जेवर मन को मोह लेते हैं |हर मुस्लिम अपनी हैसियत से बढ़ कर खर्च करते हैं | तरह – तरह की मिठाईयाँ भुनी बारीक सेवइयां हरेक का ध्यान खींचती हैं |ख़ास कर रमजान के दिनों में रात को लगने वाले खाने के बाजार यहाँ क्या नहीं बिकता खाने की महक दूर- दूर तक फैली रहती हैं |शौकीन लोग खाने का लुत्फ़ उठाते हैं ख़ास कर मांसाहार के शौकीनों के लियें नायाब किस्म –किस्म के गोश्त की वैराईटी बिकती हैं | रमजान ईद के चाँद के साथ खत्म होते हैं और फिर आता है ईद का दिन |नये-नये कपड़ों में सजे लोग एक दूसरे को ईद मुबारक कहते हैं और हमारे घरों में भी इंतजार होता हैं ईद की लजीज सेवईयों का जो बड़े प्यार से बनाई जाती हैं और हर मिलने वालों के घरों में भेजी जाती हैं |
– शाम को कहीं – कहीं कव्वालियों के प्रोग्राम होते हैं और ,हर सिनेमा घर में नई फिल्म लगती है | ईरान में रमजान के दिनों में लगभग सभी रोजे रखते थे सिवाय बिमार को छोड़ कर रोजे दारों के ओंठ सूख जाते थे चेहरे पर रोजे का साफ़ असर नजर आता था | ईद के दिन ईद की मुबारक बाद दी जाती थी| अच्छा गोश्त पकता था शीरींन और केक भी लाया जाता है पर सेवइयां नदारद थी |हम लोगों के लिए ईद का मतलब टेलीविजन पर मजेदार प्रोग्राम और पूरी एक कार्टून फिल्म दिखाई जाती थी जिसे बच्चे क्या बड़े भी बड़े भी शौक से देखते थे शाम को कभी – कभी हिंदी में डब की फिल्म भी दिखाते थे|
ईद की सुबह मेरे पति के प्रिय पठान दोस्त डॉ हुनरगुल ने हमें ईद के मौके पर अपने घर बुलाया | हुनर गुल हम सबको खुदा हाफिज कह कर अपने शहर पेशावर पाकिस्तान लौट गये थे वहाँ उनकी सरकारी नौकरी भी थी | अब दुबारा उनसे मिल पायेंगे ऐसी उम्मीद नहीं थी |ईद के दिन लोग अपने घर जाते हैं वह लौट कर फिर परदेस कुछ माह और नौकरी करने के लिए वापिस आ गये | पाकिस्तान के सभी डाक्टर परिवार मिल कर ईद मनाते थे हम उस एरिया के अकेले नार्थ इंडियन (उत्तरभारतीय) थे | पकिस्तान के पंजाब प्रांत के निवासी ,पठानों और कराची निवासी सिन्धी और मुहाज्रर( भारत से गये मुस्लिम समुदाय ) आपस में मिलजुल कर रहते हैं यदि भारतीय पंजाब प्रांत का परिवार हैं ,पंजाबी पाकिस्तानी उनसे इतने घुलमिल कर भाई या बहन का रिश्ता गाँठ लेते थे | हम मथुरा वासी उन्हें दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा पर बुलाते थे मैं भगवान के भोग के लिए बहुत कुछ बनाती थी बिना प्याज का विशुद्ध शाकाहारी भोजन जिसमें सबसे अधिक दूध दही के पदार्थ होते थे क्योंकि बाल गोपाल कन्हैया को यह बहुत भाते हैं | वह भगवान कृष्ण को लौर्ड कृष्णा गीता को अल्लाह की जुबान कहते थे | मीठी ईद के दिन सब अपने घर से कुछ न कुछ बना कर लाते थे | मैं ज्यादातर खीर बना कर ले जाती थी | ईद के दिन मिल कर खाना खाते थे और फिर बातों का क्रम चलता था उसमें ज्यादातर वह अपने परिवार के साथ मनाई गई ईद या ईद से सम्बन्धित संसमरण सुनाते थे |
डॉ हुनरगुल और उनकी पत्नी सूफिया इस ईद पर बहुत भावुक थे डाक्टर साहब ख़ास कर डॉ हुनर गुल| उनके पिता नौर्थ वेस्ट फ्रंटियर में गरीब किसान थे उनके आठ बेटे और एक बेटी थी बड़ी गरीबी से दिन गुजरते थे |उन भाई बहनों को ईद के दिन कपड़ों में कमीज मिल जाये बहुत बड़ी बात थी छोटे बच्चों को सलवार भी नसीब नही हो पाती थी सलवार पुरानी फटी ही पहननी पडती थी या वह भी नहीं | कुछ बड़ा होने पर ईद के लिए वह सब छोटा मोटा काम कर थोड़े से पैसे जमा कर तब जाकर मेला देखने जाते थे परन्तु पैसे इतने कम होते थे कुछ भी खरीद नहीं सकते थे | उनके बड़े भाई को वहाँ के सरकारी अस्पताल में कम्पाउंडर की नौकरी मिल गई उसकी तनखा से घर चलता था वह घर-घर जा कर सुई पट्टी जैसे कुछ काम कर लेते थे जिसके बदले में लोग सौगात में अंडे या मुर्गी देते थे |हुनरगुल और उनसे दूसरे नम्बर का भाई पढने में बहुत अच्छे थे | इनका एडमीशन डाक्टरी में हो गया छोटे भाई का इंजीनियरिंग में लेकिन एडमिशन के पैसे नहीं थे अत: वह फ़ीस जमा करने के लिए कराची बन्दरगाह पर मजदूरी करने के लिए गये जहाँ वह लोडर का काम कर इतने पैसे ला सके जिससे एडमिशन हो सके लेकिन आगे का खर्चा उनका बड़ा भाई उठाने को तैयार था |इसके लिए भी वह बहुत मेहनत करते थे रात रात दूर दराज गावों में सुई पट्टी करने जाता थे लम्बे काम करने पर जैसे आपरेशन के बाद की पट्टियाँ ,खाते पीते लोग उन्हें साल छमाही दुम्बा दे देते थे उसे भी बेच कर वह भाईयों की किताबों का खर्चा उठाते थे | उन्होंने बताया हम ईद पर कभी घर नहीं जा पाये |बचपन में भी लगभग आधी अधूरी ईद होती थी इतनी गरीबी ऊपर से इतने बच्चे |हर छुट्टी में उन्हें आगे की पढाई चलाने के लिए कराची बन्दरगाह मजदूरी करने जाना पड़ता था | मैने कहा आप ट्यूशन कर खर्चा उठा सकते थे उन्होंने कहा हम अफरीदी पठान हैं हमारी कौम जाहिलों से भरी हैं उन्हें अपने एरिया में विकास भी नहीं चाहिए न बिजली न सड़क पढ़ने का सवाल ही नहीं बहुत कम लोगों के बच्चे पढ़ते थे ज्यादतर लोग अफीम की खेती करते हैं अत: वह सेना या पुलिस को उधर जाने नहीं देते | यदि लड़ाई हो जाए एक दूसरे पर बंदूके तान देते हैं “ मुझ पर कहूँ सवार है या तू मुझे मार दे नहीं तो मैं तुझे मार दूंगा |” शिक्षा ने मुझे समझदार और बुजदिल बना दिया बना दिया | इस कष्ट से उनकी पढाई पूरी हुई| भाई की इंजीनियरिग पहले खत्म हुई उसे सरकारी नौकरी मिल गई समझ लीजिये होश में पहली ईद थी जो बड़ी धूमधाम से मनाई गई परन्तु अभी ईदी देने की हैसियत नहीं थी | जब मेरी नौकरी लगी अम्मी जान ने सबको ईदी दी उस दिन अम्मी सारा दिन अल्लाह का शुक्र अदा कर रोटी रही अब्बा पहले ही फौत कर गये थे | हम सबकी आँखों में पानी आ गया |हुनर गुल जिस परिवार में ज्यादा बच्चे देखते थे दुखी हो जाते थे |
और सुफिया मेरी प्यारी सहेली उसकी एक ही इच्छा थी एक ऐसा बेड़े ( आंगन) वाला घर जिसमें एक तरफ भाभी रहती हो दूसरी तरफ वह ,दिन भर अपने अपने छज्जे पर बैठ कर गप्पें मारें | उसके पिता और डॉ हुनरगुल के पिता दोनों बचपन के दोस्त थे वह फौज में भरती हो गये लेकिन हुनरगुल के अब्बा ने गाँव नहीं छोड़ा लेकिन अपनी दोस्ती को और मजबूत करने के लिए सूफिया और हुनर गुल को बचपन मे नाम जद ( रिश्ता पक्का ) कर दिया जब नन्हें हुनर गुल ने स्कूल जाना शुरू ही किया था उनके तन पर कमीज थी सलवार के पैसे अब्बा के पास नहीं थे | सुफिया दो भाई बहन थे उसके बड़े भाई पाकिस्तान आर्मी में कर्नल थे वह काफी समय तक सऊदिया की मिलिट्री सर्विस में रहे और सूफिया एक टीचर थी | मैंने एक दिन सूफिया से पूछा यदि हुनरगुल डाक्टर नहीं होते तो क्या आपकी शादी होती? सुफिया ने बताया न करने पर इतना खूनखराबा होता आप सोच नहीं सकती पठान अपनी जुबान से नहीं फिर सकते | सुफिया की अच्छी तकदीर ,बहुत ही शानदार जोड़ा था दोनों लम्बे छरहरे, जहीन थे | डॉ हुनरगुल ने बताया सूफिया के काबिल बनने के लिए कराची के बन्दरगाह में बोझा ढोया हैं |
जब वह फिर से पाकिस्तान जा रहे थे हमारे एरिया में जम कर बर्फ पड़ रही थी सूफिया ने अपने शौहर से कहा हुनर गुल तुमसे जीवन में कुछ नहीं मांगूगी बस ईरान को गुडबाय करते समय भाभी और डाक्टर साहब से मिला दो| हुनर गुल मजबूत गाड़ी के पहियों में जंजीर लपेट कर सुफिया को मुझसे मिलाने लाये | रात भर रह कर जब वह लौटे सुफिया ने कहा मेरी कब्र में सोयी रूह भी आपको याद करेगी |गाड़ी धीरे धीरे बर्फीली पहाड़ी पर चढ़ती रही हम परिवार सहित उनको जाते देखते रहे बच्चे अपने चाचा चाची के लिए रो रहे थे | हमारे अपने लगने वाले दुश्मन देश के बाशिंदे , उनके और हमारे बीच में लम्बी सरहद है जहाँ गोलियाँ और गोले चलते रहते हैं सरहद की हिफाजत के लिए जान हथेली पर रख कर सैनिक तत्पर रहते हैं | हजारों आतंकी हमारी सीमा में घुसने के लिए तैयार खड़े हैं |कई आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया गया हैं| पाकिस्तानी हकूमत ,आर्मी वहाँ का नेतृत्व और हाफिज सईद जैसे सिरफिरे रोज धमकियाँ देते रहते हैं हिन्दुस्तान जैसे विशाल परमाणु शक्ति से सम्पन्न देश को अपनी परमाणु शक्ति होने का भय दिखाया जाता है| अब हमसे सब कितने दूर हैं |

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