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क्यों स्वीकार्य नहीं हैं ऑफिस में महिला बॉस?

Posted On: 23 Nov, 2011 Common Man Issues में

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female bossपुरुष प्रधान इस समाज में महिलाओं को हमेशा अधीन रखने जैसी अवधारणा को ही अपनाया गया है. महिलाओं को कमजोर आंकने वाले लोगों का यह मानना है कि एक अकेली महिला कभी सफल नहीं हो सकती, उसे हर कदम पर एक पुरुष के साथ की आवश्यकता पड़ती ही है. फिर चाहे घर की जिम्मेदारियां हों या फिर ऑफिस का काम बिना किसी पुरुष के वह अपनी जिम्मेदारियां पूरी नहीं कर सकती. एक समय था जब ऐसी संकुचित मानसिकता को मजबूत आधार प्राप्त था. उस समय महिलाएं आत्म-निर्भर और शिक्षित नहीं थीं इसीलिए विवाह से पहले पिता या भाई पर और विवाह के पश्चात पति के संरक्षण में रहकर ही स्वयं को सुरक्षित समझती थीं. उस समय हालात भी कुछ ऐसे ही थे जो उसे ऐसा सोचने के लिए विवश करते थे.


वर्तमान समय के मद्देनजर आज भले ही पुरुषों को शासक समझने वाले लोगों की मानसिकता में किसी प्रकार की कोई भी तब्दीली ना देखी जा सकती हो, लेकिन बदलते समय के साथ-साथ अब महिलाओं की यह दयनीय दशा भी परिवर्तित हो रही है. आज वह स्वतंत्र, आत्म-निर्भर और शिक्षित हैं. आज वह अकेले अपनी समझ के आधार पर किसी भी प्रकार का निर्णय लेने की क्षमता रखती हैं. ऐसी कई महिलाएं हैं जो आज केवल अपनी आय के बल पर परिवार और बच्चों की देखभाल कर रही हैं. वे ना सिर्फ एक सफल गृहणी हैं बल्कि कार्यक्षेत्र में भी अपने लिए सम्मानजनक और विशिष्ट स्थान प्राप्त किए हुए हैं.


गुजरते समय के साथ महिलाओं को अधीन रखने जैसी मानसिकता भी अब निरर्थक प्रमाणित होती जा रही है. आज महिलाएं केवल कर्मचारी की भांति ही नहीं बल्कि कंपनी की मुखिया या बॉस के पद पर भी अपनी जिम्मेदारियां निभा रही हैं. पुरुष साम्राज्य को चुनौती दे वह अपना एक अलग मुकाम स्थापित करती जा रही हैं. अब वह अधीन रहने में नहीं अधीन रखने में विश्वास रखती हैं. ऐसा नहीं है कि उच्च पद पर पहुंचने के बाद वह अपने कर्तव्यों से पल्ला झाड़ लेती हैं, आंकड़ों की मानें तो महिला बॉस ज्यादा गंभीर और अपने दायित्वों के प्रति समर्पित होती हैं.


किसी जमाने में आश्रित और कमजोर समझी जाने वाली महिलाओं के अधीन आज जब पुरुषों को एक कर्मचारी के तौर पर कार्य करना पड़ता है तो ऐसे में उनके अहम और मानसिक आवेगों पर चोट लगना स्वाभाविक ही है. यही वजह हैं कि अधिकांश पुरुष कर्मचारी महिला बॉस के साथ काम कर खुश नहीं होते. फिर भले ही उन्हें नौकरी में पदोन्नति और आय में वृद्धि क्यों ना मिल रही हो, वह महिला बॉस को सहर्ष स्वीकार करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेते.


कुछेक पुरुषों को छोड़, महिला बॉस के प्रति अधिकांश पुरुषों की यही राय होती है कि महिलाएं कभी भी ऑफिस के काम पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर सकतीं. उन्हें हमेशा घर के कामों और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों की चिंता सताती रहती है. वह तभी तक सफल हो सकती हैं जब ऑफिस में वह किसी के अधीन रहती हैं. पुरुष बॉस के साथ अन्य कर्मचारी हलका-फुलका मजाक भी कर सकते हैं लेकिन महिला बॉस हमेशा शिष्टाचार की उम्मीद रखती हैं जिससे कार्यक्षेत्र का वातावरण उबाऊ बन पड़ता है. पुरुष इस बात से भी परेशान रहते हैं कि महिलाएं अपने मूड के आधार पर व्यवहार करती हैं. अगर वह क्रोधित हैं तो वह आपके साथ रुक्ष व्यवहार करेंगी. इतना ही नहीं आप कभी यह जान ही नहीं सकते कि महिलाओं का स्वभाव कैसा है और वह किस मसले पर कैसी प्रतिक्रिया देंगी.


हालांकि उपरोक्त मानसिकता को गलत करार नहीं दिया जा सकता. लेकिन अगर हम हमेशा इसी सोच को आदर्श मानकर चलते रहेंगे तो निश्चित ही ऐसी मानसिकता के कारण महिलाओं के आत्म-विश्वास में कमी आएगी.


आज महिलाएं अपने परिवार और कार्यक्षेत्र में संतुलन बनाए रखने की पूरी कोशिश कर रही हैं. अगर उन्हें कोई जिम्मेदारी दी जाती है तो एक परिपक्व महिला कभी भी उससे बचने या कोताही बरतने की कोशिश नहीं करेगी. लेकिन जैसा कि हम हमेशा से सुनते आए हैं कि जब तक व्यक्ति अपने निजी जीवन से संतुष्ट नहीं होगा तब तक वह कभी भी व्यवसायिक क्षेत्र में सफलता हासिल नहीं कर सकता. आज के समय में महिलाएं समान रूप से महत्वाकांक्षी हैं, लेकिन फिर भी वह अपने परिवार के प्रति किसी अन्य की अपेक्षा ज्यादा उत्तरदायी हैं. अगर उनके लिए अपनी सफलता प्रिय है तो परिवार और बच्चे भी. अगर परिवार और समाज की ओर से उन्हें थोड़ा समर्थन मिलेगा तो वह अपने जीवन में आगे बढ़ने की सोच सकती हैं.


निःसंदेह महिलाएं भावुक होती हैं. वह अपने व्यक्तिगत जीवन में चल रहीं परेशानियों का प्रभाव कार्यक्षेत्र और कार्य कुशलता पर पड़ने से नहीं रोक पातीं, लेकिन एक सत्य यह भी है कि महिलाएं किसी भी समस्या का हल पुरुष से कहीं बेहतर तरीके और कम अवधि में निकाल सकती हैं.


इस लेख का उद्देश्य महिलाओं को पुरुषों से बेहतर साबित करना नहीं है और ना ही इस पर होने वाली बहस का कोई अंत है. इसका उद्देश्य यह बताना है कि महिलाएं भी पुरुषों के समान काबिल और विश्वसनीय होती हैं, उनमें भी निर्णय लेने की क्षमता होती है. यहां तक की वैज्ञानिक तौर भी यह प्रमाणित किया जा चुका है कि तनाव के समय महिलाएं ज्यादा संवेदनशीलता और संजीदगी से निर्णय ले सकती हैं. उन्हें सम्मान देने और उन्हें समझने के लिए बस जरूरत है कि हम अपनी मानसिकता को थोड़ा विस्तारित करें.


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