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वैवाहिक जीवन में तूफान ला सकता है बॉस का व्यवहार

Posted On: 15 Dec, 2011 Common Man Issues में

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वैवाहिक संबंध में छोटी-मोटी नोक-झोंक होना एक आम बात है. प्राय: देखा जाता है कि एक-दूसरे से नाराज दंपत्ति जब अपने बीच के मनमुटाव को सुलझा लेते हैं तो ऐसे में वे एक-दूसरे के और निकट तो आते ही हैं साथ ही उनकी आपसी समझ और सहयोग की भावना को भी बढ़ावा मिलता है.


आमतौर पर देखा जाता है कि विवाहित दंपत्ति भी अपने बीच पनपते उन्हीं मनमुटावों या मतभेदों को हल करने की कोशिश करते हैं जिसमें गलती उन्हीं में से किसी एक की हो. वह आपसी झगड़े को कोई इतना बड़ा मसला नहीं मानते जिसे हल ना किया जा सके. लेकिन वहीं अगर परिवार या फिर किसी बाहरी व्यक्ति की किसी हरकत द्वारा विवाद उत्पन्न होता है तो एक-दूसरे से बेहद प्यार और लगाव रखने वाला विवाहित जोड़ा भी उस समस्या को सुलझाने में दिलचस्पी नहीं लेता, जिसका सीधा प्रभाव उनके वैवाहिक संबंध पर पड़ता है.


परिवार में सास-ससुर और अन्य लोगों द्वारा विवाहित दंपत्ति के निजी जीवन को प्रभावित करना लगभग हर परिवार की कहानी है. माता-पिता अपनी संतान के जीवन में हस्तक्षेप करना अपना अधिकार समझते हैं जो कभी-कभार जरूरत से ज्यादा हो जाता है, जो स्वाभाविक रूप से अधिक पसंद नहीं किया जाता.


लेकिन अगर आप यह सोच रहे हैं कि विवाहित दंपत्ति के खुशहाल जीवन को सिर्फ ससुराल वाले ही प्रभावित करते हैं तो आपको अपनी इस मानसिकता को थोड़ा विस्तार देने की जरूरत है.


rude bossएक नए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि ऑफिस कर्मचारियों के प्रति उनके बॉस का रवैया भी दंपत्ति के बीच खुशहाली या मनमुटाव का कारण बनता है.


अमरीका की बेलर यूनिवर्सिटी द्वारा संपन्न इस सर्वेक्षण में यह स्थापित किया गया है कि अगर बॉस ऑफिस में आपको नखरे दिखाता है, कठोर व्यवहार करता है या सार्वजनिक तौर पर आपकी आलोचना करता है तो पीड़ित कर्मचारी चाहे वह महिला हो या पुरुष, अपने जीवनसाथी के साथ रुक्ष और उग्र बर्ताव करने लगता है. उसका ऐसा स्वभाव पहले साथी और फिर धीरे-धीरे पूरे परिवार की खुशियों पर प्रश्नचिंह लगा देता है. ऑफिस में बॉस के गलत व्यवहार से परेशान कर्मचारी अपने साथी की हर छोटी गलती पर फट पड़ता है और कभी कभार गलती ना होने पर भी उसे ताना मारने लगता है.


इस शोध की अन्य स्थापनाओं के अनुसार घर में संतान का होना कर्मचारी के रुक्ष व्यवहार को नियंत्रित रख सकता है. संतान की खुशी के लिए व्यक्ति अपने बॉस के गलत व्यवहार को भी भुला सकता है.


इस स्टडी के मुख्य शोधकर्ता डॉन कार्लसन का कहना है कि यह स्थापनाएं सभी संस्थानों और उनके प्रबंधकों के लिए एक चेतावनी और निर्देश हैं. जिसे अगर नजरअंदाज किया गया तो सामाजिक और पारिवारिक के अलावा कंपनी मसलों पर भी इसका गलत प्रभाव पड़ सकता है. इसके अलावा यह शोध अस्पष्ट तौर पर ही सही यह प्रमाणित कर रहा है कि ऐसा प्रतिकूल और हानिकारक बर्ताव अधिक दिनों तक सहन नहीं किया जाने वाला.


सह शोधकर्ता मेरिदेथ फर्ग्यूसन का कहना है कि अधिकारियों का ऐसा व्यवहार जहां निजी संबंधों में समस्या और चिंताओं का कारण बनता है वहीं कर्मचारियों को हतोत्साहित और निराश कर देता है. उनके लिए ऑफिस जाना कष्टदायक बन जाता है.


इस सर्वेक्षण में 280 कर्मचारियों और उनके साथियों को शामिल किया गया. पहले कर्मचारियों से यह पूछा गया कि कितनी बार उन्हें ऑफिस में यह कहा जाता है कि उनके विचार किसी काम के नहीं हैं? अगर बॉस किसी और वजह से क्रोधित है तो क्या वह सारा गुस्सा आप पर उतार देता है? क्या ऑफिस में तनाव के कारण आप घर पर अपने साथी के साथ झग़ड़ा करते और विवाद के हालात विकसित करते हैं?


कर्मचारियों के बाद उनके साथियों से प्रश्न पूछे गए. दोनों का आंकलन और समीक्षा करने के बाद यह नतीजा निकाला गया कि ऑफिस के वातावरण और अपने साथ होते दुर्व्यवहार के कारण कर्मचारी इतना ज्यादा निराश और चिड़चिड़ा हो जाता है कि वह या तो हर बात पर खुद को निम्न समझने लगता है और या घर में अपनी बात मनवाने के लिए वह क्रोध का सहारा लेता है.


भले ही यह अध्ययन एक विदेशी संस्थान द्वारा अपने नागरिकों के जीवन और उसमें घटने वाली परेशानियों को उजागर करने के लिए संपन्न किया गया हो. लेकिन इस अध्ययन द्वारा यह तथ्य भी सामने आ जाता है कि भारतीय लोग जो अब नौकरी करने में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे हैं उन्हें और उनके परिवार पर ऑफिस बॉस की क्रूरता और नकारात्मक बर्ताव से किन परेशानियों का सामना करना पड़ता है.


ऑफिस में होते ऐसे मानसिक शोषण और प्रताड़ना को समाप्त करने के लिए निर्देश या कानून प्रभावकारी नहीं हो सकते क्योंकि यह स्वभाव की बात है. अपने नीचे काम करने वाले लोगों को सम्मान देना सभी का स्वभाव नहीं होता. एक अच्छे और ऊंचे ओहदे पर पहुंचने के बाद नीचे देखना मुश्किल हो जाता है. ऐसे स्वभाव पर नियंत्रण रखना और कर्मचारियों को सम्मान देना जितना कर्मचारियों के हित में है उतना ही कंपनी और स्वयं अधिकारियों के लिए भी फायदेमंद है.


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