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वैवाहिक जीवन में सामंजस्य

Posted On: 12 Jul, 2011 Common Man Issues में

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happy coupleभारतीय परिवेश में विवाह को केवल एक सामाजिक संस्था का दर्जा ना देकर धर्म और धर्म ग्रंथों का एक मजबूत आधार प्रदान किया गया है. यहॉ विवाह सिर्फ एक महिला और पुरुष को ही आपस में नहीं जोड़ता बल्कि दो परिवारों में भी आपसी सहयोग और प्रेम की भावना का विकास करता है. इसके परिणामस्वरूप विवाह संबंध केवल महिला और पुरुष तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि एक ऐसी पारिवारिक व्यवस्था बन जाता है, जिसके घटनाक्रम समान रूप से पारिवारिक सदस्यों को भी प्रभावित करते हैं. भले ही आज के आधुनिक दौर में युवा पीढ़ी लिव-इन रिलशनशिप जैसे नए संबंधों की ओर आकर्षित हो रहे हों, लेकिन भारत के संदर्भ में विवाह जैसी सदियों पुरानी चली आ रही अवधारणा में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं आया है.


पहले अभिभावक या परिवार के बड़े ही आपसी समझ से अपने बच्चों के विवाह से संबंधित सभी निर्णय ले लेते थे, जिनमें स्वयं विवाह योग्य युवक-युवतियों की रजामंदी मायने नहीं रखती थी. बच्चों का कर्तव्य होता था केवल अपने माता-पिता के कहे अनुसार चलना. हां, ऐसी व्यवस्था का एकमात्र फायदा ये था कि अपने संबंध को अभिभावकों की इच्छा मानते हुए पति-पत्नी हर परिस्थिति में एक-दूसरे के साथ रहने के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार कर लेते थे.


लेकिन अब परिस्थितियां पहले जैसे नहीं रहीं. पहले जहां केवल पति ही बाहर जाकर आजीविका कमा कर लाता था और उसकी पत्नी घर में ही रहकर उसके परिवार का पालन-पोषण करती थी वहॉ आपसी कार्यक्षेत्र निर्धारित होने के कारण उनके वैवाहिक जीवन में सामंजस्य बना ही रहता था.


वहीं आजकल की भागती दौड़ती और प्रतिस्पर्धा प्रधान जीवनशैली में पति-पत्नी दोनों ही आर्थिक रूप से स्वतंत्र जीवन जीने के पक्ष में हैं. स्वावलंबन की यही बढ़ती चाहत उनके जीवन को और अधिक जटिल बनाती जा रही है, जिसके चलते उनके पास एक-दूसरे को देने के लिए भी समय नहीं बचता. जिसके कारण दोनों के बीच मनमुटाव, मतभेद, आपसी विवाद जैसी गंभीर और चिंताजनक परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं. और अंत में आपसी समझ और परस्पर सहयोग की भावना की कमी के चलते दोनों में संबंध-विच्छेद तक की नौबत आ जाती है.


जैसा की पहले ही कहा गया है कि विवाह जैसे संबंध का महत्व केवल दो व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि ये दो परिवारों से भी संबंधित हो जाता है. अब ऐसे संबंध के टूटने से जितना महिला और पुरुष प्रभावित होते हैं, उतने ही या उससे कहीं अधिक इसका नकारात्मक प्रभाव दोनों के परिवारों खासतौर पर उनके बच्चों पर पड़ता है. माता-पिता का अलग होना बच्चों को भावनात्मक नुकसान पहुंचाने के अलावा उन्हें उद्दंड और गुस्सैल भी बना देता है.


विवाह के उपरांत महिला और पुरुष एक-दूसरे के प्रति उत्तरदायी हो जाते हैं. उनका प्रथम कर्तव्य परस्पर सहयोग की भावना को बढ़ाना और अपने परिवार की खुशी का ख्याल रखना होता है. और वर्तमान परिदृश्य में जब महिलाएं भी अपने परिवार को आर्थिक सहायता देने के लिए बाहर काम करने जाती हैं, तो ऐसे में आपसी सहयोग की भावना और सहनशीलता का महत्व और अधिक बढ़ जाता है. उनका पूरा जीवन इस बात पर ही निर्भर करता है कि वे किस प्रकार अपने वैवाहिक जीवन में सामंजस्य स्थापित करते हैं.


वैश्वीकरण और उदारीकरण जैसी नीतियों के कारण भारतीय लोगों के जीवन में अवसरों की अधिकता तो आई है, लेकिन साथ ही उन्हें कई अप्रत्याशित परेशानियों का सामना भी करना पड़ रहा है. खासतौर पर बीपीओ आदि में काम करने वाले लोगों, जिनके काम के घंटे और शिफ़्ट स्थायी नहीं होते, ऐसे विवाहित जोड़ों को कई तरह की समस्यायों से रूबरू होना पड-अता है. समय की कमी और विपरीत समय में काम करने की वजह से वे दोनों एक-दूसरे को पर्याप्त समय नहीं दे पाते. और आपसी संवाद की कमीं दोनों के संबंध में गलतफहमियों को जन्म देती है.


प्राय: यह देखा गया है कि सामंजस्य की कमी केवल उन विवाहित जोड़ों में ही नहीं होती जिसमें महिला और पुरुष दोनों काम करते हैं, बल्कि वे परिवार जो थोड़े रूढ़ प्रकृति के होते हैं, महिलाओं को बाहर काम करने की इजाजत नहीं देते, ऐसे विवाहित जोड़ों में भी हित टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है. जिसके चलते भले ही वे पारिवारिक दबाव में एक-दूसरे के साथ रहने के लिए विवश हो जाएं, लेकिन भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ पाते. और यह कभी कभार नहीं बल्कि महानगरों में अकसर दिखने वाली स्थिति है.


विवाह एक ऐसा कदम है जो मनुष्य को नई परिस्थितियों और नए लोगों से जोड़ देता है. इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता कि व्यक्तिगत जीवन में इसकी उपयोगिता और महत्ता जानते हुए भी, कभी पारिवारिक दबाव या कभी किसी और विवशता के चलते लोग आपसी समझ विकसित हुए बिना ही विवाह कर लेते हैं. इसका खामियाजा उन्हें और उनके परिवार को बाद में भुगतना पड़ता है. विवाहित जीवन में सामंजस्य बनाए रखना और विवाहोपरांत एक-दूसरे को समझना विवाहित जोड़ों के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती बनकर सामने आती है.


वैवाहिक जीवन में मनमुटाव पैदा होना या दो लोगों के बीच विवाद होना कोई नई बात नहीं है. क्योंकि जब दो लोग एक-दूसरे के साथ रहते हैं तो स्वाभाविक रूप से उनके गुण-दोष सामने आने लगते हैं. ऐसे में वैवाहिक संबंधों को और मजबूत बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे की बातों, अपेक्षाओं को समझें, उसे महत्व दें, साथ ही दोषों को मिटाने की भी कोशिश करें. दो लोगों की प्राथमिकताएं और परिस्थितियों को देखने का नजरिया हमेशा एक-दूसरे से भिन्न होता है इसलिए अपने विवाह को एक सफल संबंध बनाने के लिए आपको अपने साथी के दृष्टिकोण का भी सम्मान करना चाहिए. जिस समस्या को आपसी प्रेम-भावना से हल किया जा सकता है, उसे बेवजह ना बढ़ाना ही बेहतर रणनीति है.


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