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कब तक टूटती रहेंगी कलियां

Posted On: 31 Aug, 2010 Common Man Issues में

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राजेश जिसके उम्र 12 वर्ष है केरल के एक छोटे से गांव में रहता है. गरीबी के कारण एक दिन उसके पिता उसे एक होटल पर काम के लिए छोड आते है. शाम के समय होटल का मालिक उसे अपने साथ गोवा ले जाता है, यह कह कर कि वहां के होटल में ज्यादा पैसे मिलेंगे. गोवा पहुंच कर होटल मालिक तीन विदेशियों के साथ आकर उन्हें राजेश से मिलवाता है और राजेश को उनके साथ जाने को कहता है. राजेश उनके साथ चला जाता है. लेकिन जब राजेश उनके पास से वापस आता है तो उसकी हालत बड़ी खराब लगती है, जिसकी वजह होती है उन विदेशियों द्वारा राजेश का यौन शोषण. हालांकि इस दर्द और पीड़ा को भूलाने के लिए राजेश को बहुत पैसे भी मिलते हैं जो वह गांव भेजता है लेकिन उस एक रात के वजह से वह एचआईवी ग्रस्त हो जाता है.

SexualAbuse2यह तो थी राजेश की कहानी, इस कहानी में वह पीड़ा तो नाम-मात्र थी जो देश के 53 प्रतिशत बच्चों के साथ होती है. बच्चों को भारत में भगवान कृष्ण का रुप माना जाता है, लेकिन यह शायद हमारे समाज का दो तरफा रवैया ही है जो बच्चों पर अत्याचार की सारी सीमाएं पार कर जाता है. आज भारत के कुछ शहरों की छवि विदेशों में बाल सेक्स हब के रुप में उभर रही है. खासकर गोवा, केरल, कोवलम जैसे स्थलों पर तो सरेआम बच्चों का उपयोग विदेशियों के मनोरंजन के लिए करवाया जाता है. पर ऐसा नहीं है कि बाहर वाले ही हमारे बगीचों की कलियां तोड़ रहे हैं, भारत में आज कई बच्चे अपने ही घर में सुरक्षित नहीं, हवश और नशे की धुन में न जाने कितनी कलियों को प्रतिदिन तोड़ दिया जाता है. एक सर्वे के मुताबिक भारत में 53% बच्चे शोषण का शिकार होते है जो दोनों प्रकार के होते है यानी शारीरिक और मानसिक दोनों. इनमें से कई तो यौन शोषण का शिकार होते हैं और ज्यादातर इसकी जानकारी पुलिस को देते ही नहीं हैं.

untitled_cyWDH_21851कौन होते हैं सबसे ज्यादा शिकार

सड़कों और रेल की पटरियों पर रहने वाले आवारा बच्चे जिनका या तो कोई होता नहीं है या फिर जो अपने घर-परिवार से बिछड़े होते हैं, वह यौन शोषण का शिकार सबसे ज्यादा होते हैं. ऐसे बच्चों का ध्यान रखने वाला कोई होता नहीं है इसलिए जब कभी इनके साथ यौन-दुराचार होता है तो इन्हें न सहानुभूति का कंधा मिलता है न दवा देने वाले हाथ. भगवान और अपनी किस्मत पर रोते इस वर्ग को हवश के भूखे अपना सबसे आसान शिकार मानते हैं.

गरीबी जो न करवाए

पेट की आग इंसान से सब करवा देती है, यह आग ममता को इतना कठोर बना देती है कि एक मां अपनी अबोध बच्ची को किसी पराए को  बेच देती है और खरीदने वाले इन मासूमों को देह-व्यापार के गंदे नाले में रख देते हैं. केरल, उड़ीसा, झारखंड, बिहार, राजस्थान सबकी एक ही कहानी होती है कि घरवालों ने मात्र कुछ हजार के लिए परिवार को बचाने की खातिर अपनी बच्ची को बेच दिया. लड़कों को तो चलना सीखने के बाद ही काम पर लगा दिया जाता है. अक्सर छोटे-छोटे ढाबों पर काम करने वाले इन बच्चों पर देह-व्यापारियों की नजर रहती है और इन्हें बहला-फुसलाकर बड़े शहरों में भेज दिया जाता है जहां यह रईसजादों के देह की भूख शांत करते हैं.

Dir-2-33-Abuse2-483-091124जब अपने ही बन जाए भक्षक

जो पक्ष अब हम रखने जा रहे हैं वह सबसे ज्यादा दर्दनाक है. भारत में यौन शोषण के अधिकतर मामलों में दोषी परिवार से ही होता है. यहां तक की कई मामलों में बेटियों का यौन-शोषण कोई और नहीं बल्कि बाप ही करता हुई नजर आया. आज हर बच्चा अपने घर में यौन न सही लेकिन मानसिक शोषण का तो शिकार है ही.

राष्ट्रमंडल खेल..बच्चों बच कर

ऐसा अनुमान है कि अक्टूबर से शुरु होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान बच्चों का उपयोग बतौर सेक्स वर्कर की तरह होगा. दिल्ली और आसपास से गुम होने वाले बच्चों की संख्या में वृद्धि इस बात को और भी हवा देती है.

snn2920a280_396449aबाल सेक्स टूरिज्म

आज गोवा और केरल जैसे शहरों में बाल सेक्स पर्यटन जोरों से चल रहा है. जिसकी वजह है विदेशियों का इस काम के लिए ज्यादा पैसे देना. यहां के बच्चों से की गई पूछताछ में साफ हो गया कि विदेशी पर्यटकों ने नगद राशि या उपहारों का प्रस्ताव देकर उनका यौन शोषण किया. जिस तेजी से विदेशों में गे-समुदाय की वृद्धि हुई है उससे भारत में आने वाले विदेशियों में 10 से 16 साल तक के लड़कों की मांग में बढ़ोतरी हुई है.

बाल यौन शोषण का सबसे घिनौना चेहरा सामने आता है वेश्यालयों में. महज 14 साल की रुक्साना(बदला हुआ नाम) को हाल ही दिल्ली के रेड लाइट इलाके से मुक्त कराया गया. पूछ्ताछ पर पता चला कि वह पिछले 2 सालों से इस धंधे में लिप्त है. यानि 12 साल की उम्र से प्रतिदिन उसके साथ यौन शोषण हो रहा था. यही हाल सड़कों पर रहने वाले ज्यादातर बच्चों का है जिनके साथ प्राकृतिक और अप्राकृतिक दोनों तरह का यौन-शोषण होता है.

देश के विभिन्न थानों में हर महीने लगभग सात हजार के लगभग बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई जाती है इनमें से हर साल करीब तेईस हजार बच्चों का कोई अता-पता नहीं चल पाता है जिन्हें अमूमन मृत ही समझा जाता है. भारत में सही तौर पर बाल यौन व्यापार में धकेले जा रहे बच्चों की कोई सही संख्या उपलब्ध नहीं है, जबकि भारत सबसे बड़ा केंद्र है बाल यौन व्यापार का.

जरा सोच कर देखिए, आप बचपन में किसी के द्वारा अगवा कर लिए जाते और किसी अरब देश के शेख को बेच दिए जाते जो आपके साथ अश्लील हरकतें करता. सोच कर ही रुह कांप जाती है न.

आज बड़े पैमाने पर भारत में बच्चों से देह-व्यापार करवाया जा रहा है और इन्हें विदेशों में भी भेजा जा रहा है. कल जिनके चेहरों में हम उम्मीद की किरण देखते हैं वह आज ही क्षीण होते जा रहे हैं. आइए मिलकर आवाज उठाएं और बचाए इस सुनहरे बचपन को.

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